
रूस और फिनलैंड 1300 किलोमीटर से ज्यादा की सीमा शेयर करते हैं, जो कि यूरोपियन यूनियन में शामिल देशों में सबसे लंबी है. इसी सीमा के एक छोटे हिस्से पर फिनलैंड ने फेसिंग खड़ी करने को मंजूरी दे दी है. फिनलैंड बॉर्डर गार्ड के मुताबिक फेंसिंग 10 फीट लंबी होगी, जिसमें ऊपर की तरफ कंटीले तार भी लगे होंगे.
माना जा रहा है कि अगले दो सालों तक चलने वाले इस प्रोजेक्ट में लगभग 393 मिलियन डॉलर का खर्च आएगा और दोनों देशों की सीमाओं का 15 प्रतिशत हिस्सा कवर हो जाएगा. इसके अलावा कैमरे और बॉर्डर पेट्रोलिंग भी बढ़ जाएगी. फिलहाल दोनों देशों की सीमाओं पर लकड़ी की हल्की बाड़ है, जो सिर्फ इसलिए है कि पशुओं की आवाजाही रुक सके.
अचानक इतने बड़े खर्च की क्या जरूरत?
रूस और फिनलैंड के बीच कोई तनाव नहीं, तब ये देश एकदम से इतने पैसे खर्च करने पर क्यों उतारू है, इसका जवाब रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ा है. सालभर पहले जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन से जंग का एलान किया, इसके बाद से इस नॉर्डिक देश में एकदम से रूसी लोग दिखने लगे. ये अपने देश से भागकर अवैध तरीके से रूस में पनाह ले रहे थे.
रूसी आबादी के फिनिश लोगों से ज्यादा होने का डर बढ़ा
वैसे तो शरणार्थियों या इमिग्रेंट्स के मामले में फिनलैंड काफी उदार रहा, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में बाहरी लोगों का होना खतरा था. अंदर-अंदर ये डर भी बढ़ने लगा कि रूसी लोगों की आबादी फिनिश आबादी से ज्यादा हो जाएगी, जिसका असर इकनॉमी से लेकर राजनीति पर भी पड़ेगा. इसी को रोकने के लिए उन सारे हिस्सों को कंटीली फेंसिंग से कवर किया जा रहा है, जहां से सबसे ज्यादा माइग्रेशन होता है.
तेजी से बढ़ी बॉर्डर फेंसिंग
सीमाएं शेयर करने वाले दुनिया के बहुत से देश धीरे-धीरे दीवार या कंटीली बाड़ें बनवा रहे हैं. लेकिन शुरुआत में ये चलन नहीं था. दूसरे विश्व युद्ध के आखिर तक सिर्फ 7 देशों ने दीवारें बनवा रखी थीं. अब ये बढ़कर 75 से ज्यादा हो चुकी हैं. इसमें अमेरिकी वॉल सबसे विवादित है, जिसे ट्रंप वॉल भी कहा गया. तत्कालीन राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने इसे बनवाने की पहल की थी, लेकिन फिर विवाद होने लगा.
अमेरिकी वॉल पर विवाद
असल में अमेरिका मैक्सिको से 3 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा की सीमा साझा करता है. यहां से लगातार अवैध घुसपैठ तो होती ही है, साथ ही ड्रग्स का कारोबार भी खूब चलता है. इसे ही रोकने के लिए ट्रंप ने दीवार बनाने की बात की, लेकिन पेच यहां आया कि इसका कुछ खर्च मैक्सिको से भी मांगा गया. मैक्सिको ने इससे इनकार कर दिया. दूसरी तरफ विपक्षी दल ट्रंप को निशाने पर लेने लगा कि दीवार बनाने से पर्यावरण को बड़ा भारी नुकसान होगा. तो इस तरह से दीवार आधी-अधूरी ही बन सकी, और ट्रंप का कार्यकाल खत्म हो गया.
चीन की दीवार का जिक्र अक्सर आता रहा. ग्रेट वॉल ऑफ चाइना नाम से ये फेसिंग 21 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी है. दुनिया की सबसे लंबी दीवार आज-कल में नहीं, बल्कि 2 हजार साल पहले बनी थी, जिसका मकसद था बाहरी लोगों को चीन में घुसने से रोकना. अब ये दीवार टूरिस्ट अट्रैक्शन है, जिसे प्राचीन चीन की संस्कृति की तरह भी दिखाया जाता है.
राइज एंड फॉल ऑफ बर्लिन वॉल
बर्लिन की दीवार को शीत युद्ध के प्रतीक की तरह देखा जाता है, जिसमें पूर्वी जर्मनी को पश्चिमी हिस्से से काट दिया. दरअसल विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में भयंकर गैर-बराबरी आ चुकी थी. प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पढ़े-लिखे लोग ईस्ट को छोड़कर वेस्ट की तरफ जा रहे थे. उन्हें रोकने के लिए सत्ताधारी कम्युनिस्ट दल ने दीवार बनानी शुरू कर दी ताकि लोगों को वेस्ट की तरफ भागकर जमा होने से रोका जाए. साठ के दशक की शुरुआत में बनी ये दीवार लोगों को रोक नहीं सकी, बल्कि लोग बाड़ और दीवार दोनों ही तोड़ने लगे. नब्बे के अक्टूबर में दीवार ढहा दी गई और सांकेतिक तौर पर ही मौजूद रही. इसे फॉल ऑफ बर्लिन वॉल भी कहते हैं. ये अपनी तरह का अलग मामला है.
भारत-बांग्लादेश के बीच भी लंबी-चौड़ी फेंसिंग
लगभग ढाई हजार मील की सीमा साझा करने वाले इन देशों के बीच भारत 17 सौ मील लंबी कंटीली बाड़ बनाने की प्रक्रिया में है. वैसे बांग्लादेश से भारत की तरफ अवैध माइग्रेशन भी काफी होता है. ऐसे में फेंसिंग और पेट्रोलिंग से इसपर कुछ हद तक कंट्रोल की बात होती रही. इनके अलावा भी कई देश हैं, जिन्होंने दूसरे देशों के साथ अपनी शेयर्ड सीमा को कंटीले तारों और सीसीटीवी से घेर रखा है.
क्या इससे अवैध माइग्रेशन रूक सकता है?
अमेरिका और यूरोपियन देशों में बॉर्डर वॉल का चलन बढ़ा है. आर्थिक तौर पर कमजोर देशों से लोग भाग-भागकर मौकों की तलाश में बड़े देशों में आ रहे हैं. शरणार्थियों और घुसपैठियों को रोकने का ये एक बढ़िया तरीका माना जा रहा है. लेकिन क्या वाकई में इससे घुसपैठ रुकती है.
जान का खतरा बढ़ा
मर्केटर डायलॉग ऑन असाइलम एंड माइग्रेशन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि माइग्रेशन इसके बाद भी कम नहीं होता, बल्कि रास्ते बदल जाते हैं. माइग्रेनशन पैटर्न बदलना लोगों के लिए बहुत खतरनाक भी होता है. जैसे जमीन के रास्ते दूसरे देश में घुसने वाले लोग समुद्री रास्तों से निकल पड़ते हैं. इस दौरान तूफान में जान जाने के बहुतेरे मामले आ रहे हैं. कई बार लोग एक्सट्रीम मौसम में ऐसी कोशिश करते हैं. ये भी जानलेवा है. कई ह्यूमन राइट्स संस्थाओं का भी मानना है कि दीवार खड़ी करने की बजाए कोई कानून बनाना चाहिए ताकि कम से कम जान बची रहे.