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क्या छिड़ेगी नई जंग? पुतिन की धमकियों को नजरअंदाज कर NATO में शामिल हुआ रूस का ये पड़ोसी

2008 में जॉर्जिया और 2022 में यूक्रेन. दोनों ही देश नाटो में शामिल होना चाहते थे, लेकिन रूस ऐसा नहीं चाहता था. नतीजा ये हुआ कि जॉर्जिया और यूक्रेन दोनों को ही रूस के हमलों का सामना करना पड़ा. इसके बावजूद रूस का पड़ोसी देश फिनलैंड आज नाटो में शामिल हो गया. ऐसे में जानते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है? पुतिन नाटो से चिढ़ते क्यों हैं? और क्या अब एक नई जंग शुरू होने वाली है?

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन. (फाइल फोटो- AP/PTI) रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन. (फाइल फोटो- AP/PTI)
Priyank Dwivedi
  • नई दिल्ली,
  • 04 अप्रैल 2023,
  • अपडेटेड 8:22 PM IST

'अभी हम जब बॉर्डर के उस तरफ देखते हैं तो हमें फिनलैंड दिखता है. लेकिन अगर फिनलैंड नाटो में शामिल हो जाता है तो हम उसे दुश्मन की तरह देखेंगे.'

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2016 में ये बात कही थी. फरवरी 2022 से पहले तक फिनलैंड के कभी नाटो में शामिल होने की चर्चा भी नहीं होती थी. लेकिन पिछले साल जब पुतिन ने यूक्रेन के खिलाफ जंग का ऐलान किया तो फिनलैंड ने नाटो से जुड़ने की कोशिश तेज कर दी.

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अब फिनलैंड नाटो का सदस्य बन गया है. फिनलैंड एक ऐसा देश था जिसने किसी एक तरफ जाने की बजाय न्यूट्रल होने का रास्ता चुना था. लेकिन यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद उसका इरादा बदल गया. 

नाटो में फिनलैंड का शामिल होना रूस के लिए एक बड़ा झटका है. वो इसलिए क्योंकि फिनलैंड के शामिल होने का मतलब है कि नाटो रूस की सीमा के और करीब पहुंच गया है. और पुतिन की नाटो से चिढ़ की भी यही वजह है.

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नाटो मतलब क्या...?

NATO यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन. ये एक सैन्य गठबंधन है, जिसका मकसद साझा सुरक्षा नीति पर काम करना है. अगर कोई बाहरी देश किसी नाटो देश पर हमला करता है, तो उसे बाकी सदस्य देशों पर हुआ हमला माना जाएगा और उसकी रक्षा के लिए सभी देश मदद करेंगे.

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नाटो का गठन 1949 में हुआ था. लेकिन इसकी नींव दूसरे विश्व युद्ध के समय ही पड़ गई थी. दरअसल, दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ ने पूर्वी यूरोप के इलाकों से सेनाएं हटाने से इनकार कर दिया था. 1948 में बर्लिन को भी घेर लिया. इसके बाद अमेरिका ने सोवियत संघ की विस्तारवादी नीति को रोकने के लिए 1949 में नाटो की शुरुआत की.

जब नाटो का गठन हुआ था, तब उसमें 12 सदस्य थे. इनमें अमेरिका के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, इटली, नीदरलैंड, आइसलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, नॉर्वे, पुर्तगाल और डेनमार्क शामिल थे. फिनलैंड के शामिल होते ही अब इसमें 31 सदस्य हो गए हैं.

ये देश हैं- अल्बानिया, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक, एस्टोनिया, जर्मनी, ग्रीस, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, मोंटेनेग्रो, नॉर्थ मेसेडोनिया, पोलैंड, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की और फिनलैंड.

फिनलैंड नाटो का 31वां सदस्य होगा. (फाइल फोटो- Getty Images)

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क्यों मजबूर हुआ फिनलैंड?

6 दिसंबर 1917 को फिनलैंड आजाद हुआ. उस पर सैकड़ों सालों तक रूसी साम्राज्य का शासन था. आजादी के 22 साल बाद ही 1939 में सोवियत ने फिनलैंड पर हमला कर दिया. बाद में फिनलैंड की नाजी जर्मनी के साथ भी जंग हुई. आखिरकार, फिनलैंड का 10 फीसदी इलाका चला गया. हालांकि, वो आजाद ही रहा.

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1948 में फिनलैंड और सोवियत संघ के बीच इस समझौता हुआ. इस समझौते के बाद फिनलैंड आधिकारिक रूप से 'न्यूट्रल देश' बन गया. 

ये हालात तब बदल गए जब 1991 में सोवियत संघ टूटा. सोवियत संघ के टूटने के चार साल बाद ही 1995 में फिनलैंड यूरोपियन यूनियन का सदस्य बन गया. 

इसके बाद 2014 में रूस ने फिर हमला कर क्रीमिया पर कब्जा कर लिया. क्रीमिया यूक्रेन का हिस्सा हुआ करता था. फिर 2022 में रूस ने यूक्रेन के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया. इन सबने फिनलैंड को नाटो में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया.

रूस और यूक्रेन की जंग के बाद फिनलैंड में एक सर्वे हुआ था. इस सर्वे में सामने आया कि 76 फीसदी लोग नाटो से जुड़ने के पक्ष में थे.

इससे नाटो और फिनलैंड को क्या फायदा?

फिनलैंड के नाटो में शामिल होने से दोनों को ही फायदा होगा. फिनलैंड के शामिल होने की दो वजहें हैं. पहला ये कि उसकी 1,340 किलोमीटर लंबी सीमा रूस से लगती है. दूसरी वजह कि अगर भविष्य में रूस उस पर हमला करता है तो अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश उसके पीछे खुलकर खड़े होंगे.

वहीं, नाटो को भी इससे फायदा है. फिनलैंड के नाटो में आने के कारण अब ये सैन्य गठबंधन रूसी सीमा के और करीब पहुंच गया है. 

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एक और वजह ये भी है कि फिनलैंड के पास आधुनिक सेनाएं और सक्षम सशस्त्र बल हैं, जो उत्तरी यूरोप में नाटो की ताकत बढ़ाएंगे. नाटो के प्रमुख स्टोल्टेनबर्ग का कहना है कि कुछ सालों में फिनलैंड ने अपनी सेना को और ज्यादा मजबूत और ज्यादा बेहतर तरीके से ट्रेन्ड किया है. 

नाटो के किए एक देश पर हमला सभी पर माना जाता है. (फाइल फोटो-PTI)

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लेकिन इससे पुतिन को दिक्कत क्या है?

ये समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद दुनिया दो खेमों में बंट गई थी. दो सुपरपावर बन चुके थे. एक था- अमेरिका और दूसरा- सोवियत संघ.

लेकिन 25 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ भी टूट गया. टूटकर 15 नए देश बने. ये देश थे- आर्मेनिया, अजरबैजान, बेलारूस, एस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, कीर्गिस्तान, लातविया, लिथुआनिया, मालदोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान.

सोवियत संघ के बिखरने के बाद अमेरिका ही एकमात्र सुपरपावर बन गया. अमेरिका के नेतृत्व वाला नाटो अपना विस्तार करते चला गया. सोवियत संघ से टूटकर बने देश भी नाटो से जुड़ते गए. 2004 में एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया नाटो में शामिल हो गए. 2008 में जॉर्जिया और यूक्रेन को भी नाटो में शामिल होने का न्योता मिला था, लेकिन उस समय दोनों देश सदस्य नहीं बन सके.

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दिसंबर 2021 में पुतिन ने नाटो के विस्तार पर आपत्ति जताई थी. पुतिन ने कहा था, 'हमने साफ कर दिया है कि पूरब में नाटो का विस्तार मंजूर नहीं है. अमेरिका हमारे दरवाजे पर मिसाइलों के साथ खड़ा है. अगर कनाडा या मेक्सिको की सीमा पर मिसाइलें तैनात कर दी जाएं तो अमेरिका को कैसा लगेगा?'

... पहले जॉर्जिया, फिर यूक्रेन

यही वजह है कि 2008 में जब जॉर्जिया ने नाटो से जुड़ने की कोशिशें तेज कीं तो इससे पुतिन भड़क गए. उस समय पुतिन ने कहा था, 'रूस की सीमा तक नाटो के विस्तार को हमारे देश पर सीधा हमला माना जाएगा.'

अगस्त 2008 में पुतिन ने जॉर्जिया में अपनी सेना भेज दी. पांच दिन में ही जॉर्जिया के दो इलाके- साउथ ओसेशिया और अबकाजिया को अलग स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता दे दी. इन दोनों को अभी तक संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता नहीं दी है.

इसी तरह बीते साल जब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने नाटो में शामिल होने की कोशिशें कीं तो पुतिन ने फिर चेतावनी दी. और आखिरकार 24 फरवरी 2022 को जंग छेड़ दी. जंग का ऐलान करते समय पुतिन ने कहा, 'रूस और हमारे लोगों की रक्षा करने के लिए उन्होंने हमारे पास कोई और विकल्प नहीं छोड़ा, सिवाय उस विकल्प के जिसे हम आज इस्तेमाल करने को मजबूर हैं.'

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इन दो देशों की हालत से समझ सकते हैं कि राष्ट्रपति पुतिन नाटो से किस हद तक चिढ़ते हैं. जॉर्जिया टुकड़ों में बंट गया और कभी नाटो में शामिल नहीं हो सका. यूक्रेन के साथ जंग शुरू होने से पहले ही पुतिन ने उसके डोनेत्स्क और लुहांस्क को अलग देश घोषित कर दिया था. 

यूक्रेन जंग को लेकर पुतिन के खिलाफ इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने अरेस्ट वारंट जारी किया है. (फाइल फोटो- AP/PTI)

तो क्या अब नई जंग शुरू होने वाली है?

पिछले साल मई में फिनलैंड ने जब नाटो में शामिल होने का ऐलान किया था, तो इससे रूस भड़क गया था. रूस के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा था, 'अगर फिनलैंड नाटो का सदस्य बनता है तो इससे रूस-फिनलैंड के रिश्तों के साथ-साथ उत्तरी यूरोप में स्थिरता और सुरक्षा को गंभीर नुकसान होगा.'

इस बयान में रूस ने धमकाते हुए कहा था, 'रूस को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उभरते हुए खतरों का मुकाबला करने के लिए सैन्य और तकनीकी जैसे जवाबी कदम उठाने के लिए मजबूर किया जाएगा. इतिहास तय करेगा कि फिनलैंड को रूस के साथ सैन्य टकराव करने की जरूरत क्यों थी?'

सोमवार को जब नाटो चीफ स्टोल्टेनबर्ग ने फिनलैंड के सदस्य बनने का ऐलान करते हुए कहा, 'राष्ट्रपति पुतिन का यूक्रेन से जंग छेड़ने का मकसद नाटो को कम करना था, लेकिन उसके ठीक उलट हो रहा है.'

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हालांकि, किसी तरह का टकराव न हो, इसलिए उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल फिनलैंड में नाटो का अपनी मौजूदगी बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है. 

वहीं, इस मसले पर रूस के डिप्टी विदेश मंत्री अलेक्जेंडर गुरुश्को ने रूसी न्यूज वेबसाइट से कहा कि अगर फिनलैंड में नाटो की तैनाती बढ़ती है तो फिर रूस भी अपनी तैनाती बढ़ाएगा. उन्होंने कहा, 'अगर फिनलैंड में नाटो की सेना तैनात होती है तो हम भी अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त कदम उठाएंगे.' उन्होंने कहा कि हम पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी सीमा पर अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करेंगे.

फिलहाल, अभी तो कोई ऐसी टकराव की स्थिति नजर नहीं आ रही है. लेकिन फिनलैंड के अलावा स्वीडन भी नाटो का सदस्य बनने की रेस में है. फिनलैंड के साथ ही स्वीडन ने भी नाटो की सदस्यता के लिए आवेदन किया था. अगर स्वीडन भी नाटो में शामिल होता है तो हो सकता है कि रूस और पश्चिमी देशों में नया टकराव देखने को मिले.

 

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