Advertisement

अफगानिस्तानः सबकुछ होकर भी सरकार बनाने में तारीख पर तारीख क्यों दे रहा है तालिबान?

तालिबान के सामने चुनौतियों का अंबार है. कई कबीले के सरदारों ने अभी से ही तालिबान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. अलग-अलग कबीलों के सरदारों में कुछ तालिबान के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक चुके हैं और कुछ तैयारी में हैं. इस लिस्ट में कई नाम शामिल हैं. 

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का गठन फिर टल गया है (फोटो-ट्विटर से) अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का गठन फिर टल गया है (फोटो-ट्विटर से)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2021,
  • अपडेटेड 2:35 PM IST
  • अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का गठन फिर टला
  • तालिबान का दावा- 2 से 3 दिनों में होगा सरकार का ऐलान

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का गठन फिर टल गया है. इसको लेकर तालिबान का अधिकारिक बयान आया है, जिसमें कहा गया है कि नई सरकार का गठन 2 से 3 दिन बाद होगा. ये देरी तब हो रही है जबकि तालिबान की तरफ से दावा किया गया है कि उसने पंजशीर पर भी कब्जा कर लिया और इस तरह पूरा अफगानिस्तान उसके नियंत्रण में आ गया.

Advertisement

वहीं, सरकार में शामिल लोगों के नामों का खुलासा भी उसी वक्त किया जाएगा. इससे पहले 3 सितंबर को नई सरकार के ऐलान का दावा किया गया था. ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि तालिबान सबकुछ होकर भी सरकार बनाने में तारीख पर तारीख क्यों दे रहा है ?

दरअसल, सत्ता हासिल करने के बाद भी तालिबान के सामने चुनौतियों का अंबार है. कई कबीले के सरदारों ने अभी से ही तालिबान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. अलग-अलग कबीलों के सरदारों में कुछ तालिबान के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक चुके हैं और कुछ तैयारी में हैं. इस लिस्ट में कई नाम शामिल हैं. 

1- मोहम्मद अता नूरः अता नूर तालिबान विरोधी हैं और भारत को दोस्त और सहयोगी मानते हैं. नूर का मानना है कि भारत को काबुल-तालिबान बातचीत में बड़ा रोल निभाना चाहिए.

Advertisement

2- अब्दुल रशीद दोस्तमः दोस्तम टर्की के राष्ट्रपति के करीबी माने जाते हैं. उज्बेक कबीले से आने वाले दोस्तम अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति रहे हैं. रूस के दोस्त माने जाते हैं जबकि पाकिस्तान को पसंद नहीं करते हैं.

3- इस्माइल खानः पश्चिमी अफगानिस्तान के प्रभावशाली नेता के तौर पर जाने जाते हैं. फिलहाल काबुल में हैं. तालिबान और गनी सरकार के मुखर विरोधी माने जाते हैं. भारत के साथ अच्छे रिश्तों के पक्षधर हैं.

4- अब्दुल राब सैयफः तालिबान के खिलाफ पंजशीर की जंग में नॉर्दर्न अलायंक के साथ हैं. पाकिस्तान के साथ करीबी, लेकिन भारत को दोस्त मानते हैं. 

5- नाम गुल आगा शेरजईः अफगानिस्तान के नांगरहार के पूर्व गवर्नर रहे हैं. अब तालिबान की सरकार में जगह चाहते है. अगर जगह नहीं मिलती है तो पूर्वी अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का विरोध करेंगे.

6- अहमद मसूदः तालिबान के खिलाफ पंजशीर में चल रही जंग के कमांडर हैं. नॉर्दर्न अलायंस की अगुवाई कर रहे हैं. पंजशीर पर कब्जे के दावे को अहमद मसूद ने खारिज किया है.

7- अब्दुल गनी अलीपुरः हजारा समुदाय से आने वाले गनी अफगानिस्तान के बड़े शिया नेता हैं और तालिबान के विरोधी हैं. 

8- मोहम्मद युसूफः अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और बुरहानुद्दीन रब्बानी की सरकार में आंतरिक मामलों के मंत्री रह चुके हैं. 

Advertisement

9- करीम खलीलीः इनकी पहचान अफगानिस्तान के बड़े शिया नेता की है. हजारा समुदाय से जुड़े खलील अभी पाकिस्तान में मौजूद हैं. 

पंजशीर पर कब्जे का दावा, सालेह ने किया खारिज 

तालिबान ने अफगानिस्तान पर पूरी तरह कब्जा करने का दावा किया है. न्यूज एजेंसी रायटर्स ने तालिबान के सूत्रों के हवाले से बताया था कि तालिबान ने अब पंजशीर पर भी नियंत्रण हासिल कर लिया. यहां अब तक तालिबान विरोधी गुट का कब्जा था. हालांकि इस दावे को पूर्व उप-राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि  लड़ाई जारी है और जारी रहेगी. मैं अपनी मिट्टी के साथ हूं और इसकी गरिमा की रक्षा कर रहा हूं. वहीं, पंजशीर से जुड़े एक ट्विटर अकाउंट में कहा गया कि पाकिस्तानी, रूस और चीन पंजशीर रेजिस्टेंस के खिलाफ प्रोपेगेंडा चला रहे हैं.

विभागों को लेकर मतभेद, नामों पर अटकलें 

अफगानिस्तान में नई तालिबान सरकार के गठन को लेकर जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक शेर अब्बास स्तानकजई को विदेश मंत्री बनाया जा सकता है. नई सरकार में बाकी नेताओं की क्या भूमिका होगी इस पर भी लगातार मंथन जारी है. देखना ये भी होगा कि क्या पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और पूर्व मुख्य कार्यकारी डॉ अब्दुल्ला अब्दुल्ला जैसे नेताओं को सरकार में शामिल किया जाता है या नहीं.

Advertisement

वहीं, तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मुल्ला याकूब और सिराजुद्दीन हक्कानी के बीच सैनिकों और हथियारों के नियंत्रण को लेकर अनबन की खबरें हैं. खुफिया अधिकारियों के मुताबिक न्याय, धार्मिक मामलों और आंतरिक सुरक्षा विभागों को लेकर दोनों में मतभेद है. इन तमाम चुनौतियों के अंबार के बीच तालिबान की राह आसान नहीं दिख रही है. हालांकि दावा है कि मुल्ला बरादर की अगुवाई में दो से तीन दिन के अंदर सरकार का गठन हो जाएगा. 


 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement