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जर्मनी में चप्पे-चप्पे पर अमेरिकी सैनिक... क्या दूसरे विश्व युद्ध के बाद चुपके से अमेरिका ने इस मुल्क को गुलाम बना लिया?

रूस-अमेरिका में गहराते तनाव के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चौंकाने वाला बयान दे दिया. उन्होंने कहा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जर्मनी अमेरिका के कब्जे में है. ये सच है कि सेकंड वर्ल्ड वॉर के आखिर में रूस (तब सोवियत संघ) और ब्रिटेन के साथ अमेरिकी सेना भी जर्मनी में थी. इसके बाद क्या हुआ होगा! क्या पुतिन के आरोप में कोई सच्चाई है?

पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा अमेरिकी सैनिक जर्मनी में हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay) पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा अमेरिकी सैनिक जर्मनी में हैं. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 16 मार्च 2023,
  • अपडेटेड 12:43 PM IST

दूसरे विश्व युद्ध में हिटलर की खुदकुशी के साथ ही जर्मनी ने हथियार डाल दिए. इसके बाद कई विजेता देशों की सेनाएं धीरे-धीरे देश छोड़ने लगीं, लेकिन अमेरिका रुका रहा. उसने फेडरल रिपब्लिक ऑफ जर्मनी के साथ करार कर लिया था, जिसके तहत शांति बनाने के लिए वो अगले 10 सालों तक जर्मनी में रहा. इस दौरान लाखों की संख्या में सैनिक वहां रहे और लोकल नीतियों से जुड़ते रहे. 

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सबसे ज्यादा अमेरिकी सैनिक यहीं पर तैनात
आगे चलकर सेना घटी तो लेकिन अब भी जर्मनी में 33 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक हैं. ये पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा हैं. इसके अलावा साढ़े 9 हजार से ज्यादा एयरफोर्स अफसर हैं जो जर्मनी की अलग-अलग जगहों पर तैनात हैं. 

आर्मी बेस ले चुका शहर की शक्ल
जर्मनी में अमेरिका की ताकत का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि वहां के स्टटगार्ट शहर में अमेरिका का बेस है, जिससे वो यूरोप के सभी देशों में काम करता है. लंबे समय से पोस्टेड सैनिक और अधिकारी वहां अपने परिवारों को लेकर आते हैं. अमेरिकी फौज को परेशानी न हो, इसके लिए जर्मनी में कई आर्मी बेस छोटे-मोटे शहर में बदल चुके. जैसे रेम्सटाइन शहर में स्कूल और शॉपिंग मॉल अमेरिकी तर्ज पर हैं और डॉलर करेंसी चलती है. 

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जर्मनी खुद को आजाद देश कहता है और दावा करता है कि उसके फैसलों पर किसी का असर नहीं. ये बात सही भी होगी लेकिन अमेरिकी ट्रुप्स की भारी उपस्थिति को लेकर कई बार कई देशों ने आरोप लगाया कि जर्मनी में अब भी अमेरिकी दबदबा है. 

अमेरिका पर पहले भी जर्मनी में दखलंदाजी का आरोप लगता रहा है. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

जापान ने पुर्तगाल के असर को खत्म कर दिया
दुनिया में ज्यादातर देश हैं, जिनपर किसी न किसी देश ने राज किया. कई देशों पर कई-कई मुल्कों ने शासन किया. वहीं कुछ ऐसे भी देश हैं, जो कभी गुलाम नहीं रहे. इस लिस्ट में सबसे ऊपर आता है जापान का नाम. इस देश पर कभी भी किसी पश्चिमी देश का कब्जा नहीं रहा, लेकिन इस देश ने खुद कई जगहों पर शासन किया. 16वीं सदी में पुर्तगाली जापान पहुंचे और वहां घुलने-मिलने लगे. उनके ही जरिए जापानियों को पता लगा कि क्रिश्चिएनिटी भी एक आस्था है. इसके अलावा तकनीकी चीजों, जैसे गन और गनपाउडर की भी पहचान जापान से पुर्तगालियों ने ही कराई.

धीरे-धीरे उनका असर बढ़ने लगा. तब जापान की समुराई सरकार को समझ आया कि यही हाल रहा तो जापान भी पुर्तगालियों की कॉलोनी बनकर रह जाएगा. फटाफट जापान में क्रिश्चिएनिटी पर बैन लगा दिया और पश्चिम के साथ सारे नाते तोड़ लिए गए. वक्त के साथ जापान खुद ही इतना ताकतवर हो गया कि आसपास के देशों को जीतने लगा. दूसरे विश्व युद्ध में जापान को सारे देशों को छोड़ना पड़ा. 

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छोटा-सा देश भूटान रहा आजाद
भारत के पड़ोसी देश भूटान पर भी ब्रिटेन, यूरोप या अमेरिका ने कब्जा नहीं किया. हालांकि एक दफे ब्रिटिश सेना से हारने के बाद भूटान की सत्ता ने इस बात पर सहमति दी कि उसके फॉरेन रिलेशन्स को ब्रिटिश सरकार ही देखेगी. ब्रिटिश सरकार से आजादी के बाद विरासत में ये पावर भारत को मिल गई. हालांकि भूटान लगभग सारी चीजें और फैसले खुद ही लेता है. भारत ने इसमें कोई दखल नहीं दिया. यहां तक कि अपनी संस्कृति को भी इस देश ने संजोकर रखा. ये अकेला देश है, जहां नब्बे के दशक के आखिर तक टेलीविजन पर बैन था. अब भी यहां दो ही चैनल चलते हैं. 

दूसरे विश्व युद्ध के बाद कई देश ब्रिटिश चंगुल से छूटे. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

चीन की भौगोलिक सीमाओं ने की मदद
जब यूरोपियन ताकतें पूरी दुनिया पर कब्जा जमा रही थीं, तभी उन्होंने चीन पर भी जोर-आजमाइश की. हालांकि ये आसान नहीं था. चीन काफी ताकतवर साम्राज्य था और काफी दूर तक फैला हुआ भी. ऐसे में खूब कोशिश करके भी ब्रिटेन और फ्रांस थोड़े समय के लिए चीन के इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पर ही अधिकार जमा सके. कुछ सालों में दोनों देशों को भारी फायदा हुआ. ये देखते हुए अमेरिका, रूस और इटली ने भी यही स्टेटस पाना चाहा, हालांकि किसी को कामयाबी नहीं मिल सकी. इस लड़ाई में चीन के तटीय इलाके देश से कट गए. हॉन्गकॉन्ग और मकाऊ वही हिस्से हैं. 

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इस लिस्ट में ईरान, अफगानिस्तान, इथियोपिया, टोंगा और नेपाल जैसे देश भी शामिल हैं. भौगोलिक स्थिति और समृद्धि के चलते बहुत से यूरोपियन देशों ने इनपर कब्जा करना चाहा, लेकिन इस कोशिश में हो सिर्फ इतना सका कि देश के कुछ हिस्से देश से अलग हो गए. बाद में वे आजाद देश बन गए. नॉर्डिक और स्कैंडिनेवियाई देश, जैसे स्विटजरलैंड, डेनमार्क, फिनलैंड और नॉर्वे भी आमतौर पर आजाद मुल्क रहे. आमतौर पर इसलिए कि बीच-बीच में किसी दूसरे देश ने थोड़े समय के लिए इनपर कब्जा किया. 

सेकंड वर्ल्ड वॉर ने किया बड़ा उलटफेर

दूसरा विश्व युद्ध बहुत से देशों के नया सवेरा बनकर आया. इस दौरान तबाही तो भयंकर मची, लेकिन इसके बाद कई देश आजाद हो गए. आने वाले कई सालों के भीतर कई मुल्कों ने एकसाथ ही ब्रिटिश राज से छुटकारा पाया. हम भी उनमें शामिल हैं. 

कई बेहद विकसित दिखने वाले देश अब भी ब्रिटिश राजशाही को अपना राष्ट्र प्रमुख मानते हैं. कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जमैका, एंटीगुआ एंड बारबुडा, बहामास, बेलीज और सेंट ल्युसिया ऐसे ही देश हैं. ऐसे लगभग दर्जनभर देश हैं, जो कुछ समय पहले तक महारानी एलिजाबेथ को अपना राष्ट्र प्रमुख मानते थे. उनके निधन के बाद किंग चार्ल्स उनकी जगह आ चुके. महारानी की मौत के बाद कई देशों में एक बार फिर इसपर बहस छिड़ चुकी है कि उन्हें ब्रिटिश राजघराने को अपना प्रमुख क्यों मानना चाहिए. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बीनेज ने कहा था कि ऑस्ट्रेलियाई गणराज्य की नींव जल्द ही रखी जाएगी. कुछ ऐसा ही बयान न्यूजीलैंड से भी आया था.

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