
हिटलर तो 8 मई 1945 को सरेंडर कर चुका था, लेकिन धुरी राष्ट्रों (Axis powers) की एक और ताकतवर शक्ति जापान के ऊपर से जंग की खुमारी अभी भी नहीं उतरी थी. हिटलर की नाजी सेना के हथियार डालने के साथ ही यूरोपियन थियेटर से गन पाउडर की गंध आनी बंद हो गई. लेकिन पैसिफिक रीजन में ज्वार अभी बाकी था. यहां जापान ने जल, थल और नभ में अमेरिका की हवा टाइट कर रखी थी. मुकाबला बराबरी का था.
1 अगस्त 1945 को अगर पैसिफिक वार जोन के नक्शे पर नजर डालें तो कोरिया, ताइवान, दक्षिण पूर्व एशिया और चीन के कई शहरों पर जापान का कब्जा था. 8 मई के बाद अगले लगभग 90 दिनों तक जापान की सेना का जंगी अभियान बेरोक टोक जारी रहा.
हिटलर को धूल चटा चुके दुनिया के तीन चौधरियों ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और सोवियत तनाशाह जोसेफ स्टालिन और अमेरिका के नए राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन, को जापान का ये अड़ियल रुख अखर रहा था.
पोट्सडैम का मंच और दुनिया की किस्मत लिखने वाले The Big three
द्वितीय विश्व युद्ध के दस्तावेजों में जापान का इतिहास कैसे दर्ज होगा? हार से कराह रही जर्मनी की जनता के साथ कैसा सलूक किया जाए? ये तय करने के लिए 17 जुलाई 1945 को पराजित जर्मनी के पोट्सडैम शहर में द बिग थ्री (The Big three) ट्रूमैन, चर्चिल और स्टालिन की मीटिंग हुई.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान द बिग थ्री मित्र राष्ट्रों ब्रिटेन, अमेरिका और रूस के राष्ट्राध्यक्षों ट्रूमैन, चर्चिल और स्टालिन को कहा जाता था. ये वो तीन शख्सियतें थीं जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नियति ने इस दुनिया के भाग्य की लकीरें तय करने की जिम्मेदारी दी थी.
अपने रॉयल और ऑपनिवेशिक माइंडसेट के मुताबिक ही विंस्टन चर्चिल को इस वीवीआईपी और सबसे शक्तिशाली क्लब का सदस्य होने पर बड़ा गुमान था. 1945 के ही फरवरी में जब रूस के याल्टा में ऐसी ही एक मीटिंग हुई थी तब चर्चिल ने इस जमावड़े को लेकर कहा था- 'This is a very exclusive club. The entrance fee being five million soldiers or the equivalent'. यानी कि ये एक बेहद एक्सक्लूसिव क्लब है जिसकी एंट्री फी 50 लाख सैनिक या उसके आस-पास है.
16 जुलाई को दुनिया देखी सहांरक और चमत्कारी मशरूम क्लाउड
पोट्सडैम में 17 जुलाई 1945 से शुरू हुई इस मीटिंग की तारीख कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 16 जुलाई 1945 को ही अमेरिका की एक प्रयोगशाला में वो हुआ जो वर्ल्ड की साइंस बिरादरी अबतक नहीं कर सकी थी.
16 जुलाई को ही न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में स्थित लॉस एलामोस सीक्रेट लैब में परमाणु वैज्ञानिक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर के नेतृत्व में अमेरिका ने विश्व का पहला परमाणु बम बनाने में कामयाबी हासिल की थी. इस सक्सेसफुल टेस्ट के साथ ही अमेरिका परमाणु बमों की रेस में नाजी जर्मनी से आगे निकल चुका था.
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अमेरिका की इस गोपनीय टास्क के साथ कई सारे कोड नेम जुड़े हुए थे. मसलन- 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट', ट्रिनिटी, द गैजेट. मैनहट्टन इस पूरे प्रोजेक्ट का नाम था, ट्रिनिटी (त्रिदेव) उस टेस्ट का कोड नेम था और इस टेस्ट में जिस बम का परीक्षण किया गया था उसका नाम था द गैजेट. इस प्रोजेक्ट के चीफ कर्ता-धर्ता थे कम्युनिज्म से प्रभावित और फिजिक्स से दीवानगी रखने वाले वैज्ञानिक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर. ये वही ओपेनहाइमर हैं जिनकी जीवनी पर बनी फिल्म आजकल भारत में सिल्वर स्क्रीन पर लोगों को लुभा रही है.
तारीखों के सिलसिले में छिपे इतिहास
तारीखों का सिलसिला इतिहास के बनने की कहानी है. 1945 के जुलाई-अगस्त की कुछ तारीखों पर अगर आप नजर डालें तो कई घटनाएं आपको स्वत: ही समझ में आ जाएंगी. 16 जुलाई 1945 को ओपेनहाइमर ने एटम बम की संहारक शक्ति को सच कर दिखाया. अमेरिका अब दुनिया का एकमात्र ऐसा देश था जिसके पास परमाणु बम था. इस खोज ने सेकेंड वर्ल्ड वार में शक्ति के संतुलन को व्यापक रूप से अमेरिका के पक्ष में कर दिया. जापान के खिलाफ भी और मित्र राष्ट्रों के बीच में भी. इसके अगले ही दिन 17 जुलाई को जर्मनी के पोट्सडैम में तत्कालीन विश्व के बड़े नेताओं का जमावड़ा हुआ. 17 जुलाई से शुरू होकर ये सम्मेलन 2 अगस्त 1945 तक चला.
पोट्सडैम कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद पोट्सडैम घोषणापत्र जारी किया गया और जापान से बिन शर्त सरेंडर को कहा गया. इस घोषणा को करके चर्चिल, क्लेमेंट एटली, ट्रूमैन, स्टालिन और चीनी नेता च्यांग काई शेक फिर से वार रूम में चले गए. इस जंग को आखिरी मुकाम तक पहुंचाने के लिए.
तब साम्राज्यवाद के शिखर पर सवार जापान ने मित्र राष्ट्रों के इस अल्टीमेटम को तवज्जो नहीं दी. इसी के साथ उसके संपूर्ण विनाश के ऑर्डर पर अमेरिकी प्रशासन ने मुहर लगा दी.
इस कॉन्फ्रेंस के खत्म होने के मात्र 4 दिन बाद यानी कि 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर लिटिल ब्वॉय नाम का वो ब्रह्मास्त्र गिरा दिया जिसकी झलक संस्कृत का अध्ययन करने वाले ओपेनहाइमर ने भगवद गीता में देखी थी. ये घटना आज से ठीक 78 साल पहले की है.
ट्रूमैन ने बम का ताव दिया, स्टालिन ने भाव नहीं दिया
जब ट्रूमैन को ट्रिनिटी टेस्ट के कामयाब होने की जानकारी मिली तो वे पोट्सडैम में ही थे. यहां कूटनीति और विश्व की दो बड़ी शक्तियों के बीच जलन और प्रतिस्पर्द्धा का रोमांचक वाकया देखने को मिलता है. राष्ट्रपति ट्रूमैन को जानकारी मिलती है कि ट्रिनिटी टेस्ट सफल हो गया है, इसके साथ ही अमेरिका अब विश्व का पहला परमाणु संपन्न देश था.
पोट्सडैम ही वो जगह थी जहां से शीत युद्ध के बीज पड़ने शुरू हो गए थे. ट्रूमैन ने अमेरिका की ये उपलब्धि सोवियत रूस के डिक्टेटर जोसेफ स्टालिन को बतानी चाही. डिप्लोमेसी की भाषा में बात करें तो अमेरिकी वैज्ञानिकों की ये कामयाबी सोवियत के लिए स्वभाविक ईर्ष्या और डाह की बात थी. अपने शब्दों को थोड़ा अहंकार और थोड़ा कूटनीतिक शिष्टाचार की चाशनी में लपेटे ट्रूमैन ने स्टालिन से कहा, "अब अमेरिका के पास एक ऐसा हथियार जिसकी विध्वंसक क्षमता अभूतपूर्व रूप से असामान्य है."
स्टालिन ने अपने गुप्तचरों से पहले ही पता लिया था कि अमेरिका परमाणु बम बनाने के करीब पहुंच गया है. घनी मूंछों वाले स्टालिन ने ट्रूमैन की बातों को ज्यादा भाव दिए बिना, कोई उत्साह न दिखाते हुए सयंमित होकर कहा कि उन्हें उम्मीद है कि ट्रूमैन 'इस हथियार का जापानियों के खिलाफ उचित इस्तेमाल करेंगे.' स्टालिन ने बात यही खत्म कर दी. जब ट्रूमैन स्टालिन के सामने अपने देश की साइंटिफिक उपलब्धि का बखान कर रहे थे तो उन्हें शायद ये पता नहीं था कि नये नये बने इस न्यूक्लियर क्लब पर अमेरिका की मोनोपॉली कुछ ही सालों तक रहने वाली है.
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चार साल बाद सितंबर 1949 में सोवियत रूस ने परमाणु बम बनाकर अमेरिका का एटम एकाधिकार हमेशा के लिए खत्म कर दिया.
पोट्सडैम में एक दूसरे के लिए इन दो दिग्गजों का व्यवहार प्रेस की नजरों में सामान्य था. लेकिन इनके बीच शंका और अविश्वास का साया हमेशा बना रहा. 17 जुलाई का जिक्र करते हुए ट्रूमैन स्टालिन के बारे में कहते हैं- "I can deal with Stalin. He is honest — but smart as hell". यानि कि 'मैं स्टालिन से निपट लूंगा, वह ईमानदार है लेकिन गजब का चतुर है.'
सरेंडर करो अथवा सर्वनाश के लिए रहो तैयार
एक बार फिर से रुख जापान की ओर करते हैं. पोट्सडैम में 17 जुलाई से 26 जुलाई तक कई राउंड की बैठक हुई. इस दौरान जर्मनी के पुनर्निर्माण, युद्ध के बाद यूरोप का सीमांकन और विश्व में शांति और सुरक्षा की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र के भूमिका पर चर्चा हुई. लेकिन इस सम्मेलन के दौरान दुनिया के नेताओं के सामने जो सबसे बड़ा सवाल था वो था युद्ध को तत्काल समाप्त करना और इसके लिए जापान को राजी करना.
अमेरिका ने जापान को काबू में करने के लिए पहले ही परमाणु हमले के विकल्प पर विचार कर लिया था. इसके लिए ट्रूमैन ने ग्रीन सिग्नल भी दे दिया था. 16 जुलाई को एटॉमिक टेस्ट के बाद अमेरिका विश्व के पहले आणविक हथियार के प्रयोग को सच करने के लिए गंभीर रूप से सोचने लगा. ये कदम अमेरिका की चौधराहट पर मुहर लगाने वाली थी साथ ही साथ जापान को जंग में पस्त करने वाला था. 26 जुलाई 1945 को अमेरिका के राष्ट्रपति हेनरी एस ट्रूमैन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और चीन के चेयरमैन च्यांग काई शेक जो इस सम्मेलन में मौजूद थे, ने पोट्सडैम घोषणा पत्र जारी किया.
पोट्सडैम घोषणापत्र में जापान को शर्तों के साथ सरेंडर करने को कहा गया. इसमें धमकी दी गई थी कि यदि जापान ने यह समर्पण स्वीकार नहीं किया, तो वह 'Prompt and utter destruction' अर्थात "त्वरित और संपूर्ण विनाश" का सामना करेगा. ये जापान के समूल विनाश की चेतावनी थी. हालांकि इस घोषणा पत्र में एटम बमों के इस्तेमाल के बारे में कुछ नहीं कहा गया था. लेकिन जापान दो टूक और धमकी भरे कूटनीतिक शब्दों में सरेंडर करने को कह दिया गया था.
इस घोषणा पत्र में मित्र राष्ट्रों ने यह भी कहा था कि एक राष्ट्र के रूप में जापान को खत्म कर देना अथवा जापानियों को एक नस्ल के रूप में गुलाम बनाने की उनकी कोई इरादा नहीं है लेकिन युद्ध अपराधियों के खिलाफ बेहद सख्ती से निपटा जाएगा और युद्ध बंदियों के साथ अपराध करने वालों को सजा दी जाएगी. ये एक ऐसी शर्त थी जिसने जापान सरकार और साम्राज्य में सनसनी फैला दी. सरेंडर की स्थिति में जापान का शीर्ष नेतृत्व खुद को जेल में देखने लगा.
यहां ये बताना जरूरी है कि पोट्सडैम कॉन्फ्रेंस का हिस्सा होने के बावजूद सोवियत रूस इस घोषणापत्र में शामिल नहीं था क्योंकि सोवियत रूस अबतक जापान के खिलाफ जंग में तटस्थ बना हुआ था.
अब प्रधानमंत्री नहीं रह गए थे चर्चिल
पोट्सडैम कॉन्फ्रेंस में एक और रोचक बात हुई. इस सम्मलेन में विंस्टन चर्चिल आए तो थे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की हैसियत से, लेकिन जब वे सम्मेलन से लौट रहे थे तो उनका पीएम का पद जा चुका था. पोट्सडैम कॉन्फ्रेंस से पहले ब्रिटेन में आम चुनाव हुए थे. इस चुनाव की काउंटिंग तब हुई जब पोट्सडैम में बड़े नेताओं का जुटान था.
चर्चिल को इस चुनाव में हार मिली. लिहाजा पोट्सडैम कॉन्फ्रेंस के बीच में ही वे ब्रिटेन के पीएम नहीं रह गए थे. पोट्सडैम में 26 से 28 जुलाई का समय ब्रिटेन के इलेक्शन रिजल्ट पर ही फोकस रहा. बाद में क्लेमेंट एटली चर्चिल के उत्तराधिकारी के रूप में इस सम्मेलन में शामिल हुए.
पर्ल हॉर्बर की टीस अमेरिका को याद थी
दिसंबर 1941 में पर्ल हॉर्बर की लड़ाई में जापान से बुरी तरह शिकस्त खा चुका अमेरिका जापान को हराने के लिए हर तरह से आमदा था. इसके लिए परमाणु विकल्प पर गौर तो किया ही जा रहा था लेकिन अमेरिकी सरकार सीधे जापानी द्वीपों पर अपनी सेना उतारने पर विचार कर रही थी. इसे ऑपरेशन डाउनफॉल (Operation downfall) नाम दिया गया था. ये ऑपरेशन अक्टूबर-नवंबर 1945 में शुरू होने वाला था और इसके लिए 10 लाख सैनिकों की जरूरत थी. आशंका थी कि आमने-सामने की ये जंग कई महीनों तक चलेगी और इसमें लाखों लोगों की मौतें होने वाली थी.
दो हिस्सों में बंटे ऑपरेशन डाउनफॉल की योजना इस प्रकार थी.
-अमेरिका के सैनिकों को जापान के मुख्य द्वीपों पर कई स्थानों पर उतारा जाएगा.
-यूएस आर्मी जापानी सेना के खिलाफ लड़ेगी और शहरों-द्वीपों पर कब्जा करेंगे.
-ये जंग ऐसी होगी कि जापानी सरकार को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना होगा.
-अमेरिका इसके लिए जैविक हथियार, रसायनिक गैस भी इस्तेमाल करने की सोच रहा था.
निश्चित रूप से ऑपरेशन डाउनफॉल एक बहुत ही खतरनाक और कठिन अभियान होने वाला था. जापानी भी कम शक्तिशाली न थे. वे किसी भी कीमत पर आत्मसमर्पण के लिए तैयार नहीं थे. इस अभियान के अलग-अलग पहलुओं पर अमेरिकी जनरल विचार कर ही रहे थे. पैसिफिक में जंग भयावह हो चली थी. तभी परमाणु परीक्षण की कामयाबी ने इस जंग को न्यूक्लियर हथियारों के लैंस से देखने को नया नजरिया यूएस को दिया.
इधर अमेरिका का परमाणु बम बनने से पहले ही वहां की सैन्य कमेटी ने परमाणु हमले के लिए टारगेट की पहचान पूरी कर ली थी. ये टारगेट थे- कोकुरा, हिरोशिमा, योकोहोमा, निगाटा और क्योटो.
जापान ने सरेंडर ठुकराया- कहा अंत तक लड़ेंगे
पोट्सडैम घोषणापत्र से जापानी नेतृत्व में झुरझुरी दौड़ गई. जापान के सम्राट हिरोहितो सैद्धांतिक रूप से सरेंडर के पक्ष में थे. लेकिन जापान की सरकार इसके पक्ष में नहीं थी. जापानी मीडिया में सरेंडर की शर्तों पर जोर-शोर से चर्चा हो रही थी. जापान को उम्मीद थी कि सोवियत रूस मध्यस्थ बनकर आएगा और ये संकट टल जाएगा, लेकिन जोसेफ स्टालिन तो पोट्सडैम में अपनी तात्कालिक वफादारी की घोषणा मित्र राष्ट्रों के साथ कर चुके थे.
28 जुलाई को, जापानी अखबारों ने बताया कि मित्र राष्ट्रों के सरेंडर के अनुरोध को जापानी सरकार ने अस्वीकार कर दिया था. उस दोपहर, प्रधानमंत्री कांतारो सुज़ुकी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि पोट्सडैम घोषणा काहिरा घोषणा की पुनरावृत्ति अधिक कुछ नहीं थी. जापान की सरकार का इरादा इसे अनदेखा करना है और जापानी अंत तक लड़ेंगे.
अमेरिका के लिए अब रुकने की कोई वजह नहीं थी. अमेरिकी सेना के फोर स्टार जनरल और एक्टिंग चीफ ऑफ स्टाफ थॉमस टी हैन्डी के हस्ताक्षर से परमाणु हमले के आदेश 25 जुलाई 1945 को जारी किए गए. ये आदेश अमेरिकी जनरल कार्ल स्पाट्ज को जारी किए गए थे. इसमें कहा गया था कि 3 अगस्त 1945 के बाद जैसे ही मौसम खुलता है टारगेट पर हमला किया जाएगा.
बम गिराने आदेश देकर राष्ट्रपति ने अपनी डायरी में ये लिखा
इस दिन के बारे में राष्ट्रपति ट्रूमैन ने अपनी डायरी में लिखा है, "इस हथियार का इस्तेमाल अब से 10 अगस्त के बीच जापान के खिलाफ किया जाना है. मैंने युद्ध मंत्री स्टिमसन को कहा है कि इसका उपयोग करें ताकि सैन्य उद्देश्य और सैनिक निशाने पर हों, न कि महिलाएं और बच्चे. भले ही जापानी क्रूर, निर्दयी, और कट्टर हों, हम दुनिया के नेता के रूप में पुरानी राजधानी (क्योटो) या नई (टोक्यो) पर उस भयानक बम को नहीं गिरा सकते."
लिटिल ब्वॉय और फैटमैन की डिलीवरी
अमेरिका ने जापान पर हमले के लिए टिनियन आईलैंड को चुना था. टिनियन आईलैंड प्रशांत महासागर में स्थित एक छोटा सा द्वीप है. जापान के मुख्य शहरों से इसकी दूरी 2400 किलोमीटर है. टिनियन से हिरोशिमा की दूरी 2500 किलोमीटर है. 2010 में इस द्वीप की आवादी 3136 थी. सेकेंड वर्ल्ड वार के समय इस पर जापान का कब्जा था. लेकिन 1944 में 24 जुलाई से 1 अगस्त के बीच की लड़ाई में मित्र राष्ट्रों ने इस पर कब्जा कर लिया. बाद में अमेरिका ने इसे वॉर रनवे के रूप में विकसित किया.
जापान पर हमले के लिए परमाणु बम लिटिल ब्वॉय के कुछ हिस्से को इस द्वीप पर 26 जुलाई को लाया गया जबकि कुछ हिस्से को 30 जुलाई को पहुंचाया गया. जबकि दूसरे बम फैटमैन को यहां 2 अगस्त को लाया गया.
तबाही की वो बरसात... जिसे पृथ्वी ने अबतक नहीं देखा
अमेरिका ने 6 अगस्त को हिरोशिमा पर लिटिल ब्वॉय जबकि 9 अगस्त को नागासाकी पर फैटमैन बम को गिराया और विश्व को विज्ञान सर्वाधिक दानवीय इस्तेमाल से परिचित करवाया. इस बीच 7 अगस्त को ट्रूमैन ने जापान को फिर धमकी दी और कहा- यदि वे हमारी शर्तें नहीं मानते हैं तो वे आसमान से तबाही की बरसात देख सकते हैं, ऐसी तबाही जिसे पृथ्वी ने अबतक नहीं देखा है.
जापान की कमर टूट चुकी थी. अमेरिकी विज्ञान का विध्वंस देखकर जिंदा बची जापानी की जनता जमीन पर पड़ी विलाप कर रही थी. कुछ बौखलाये जनरल अभी भी सम्राट को जंग जारी रखने की सलाह दे रहे थे. लेकिन सम्राट ने 15 अगस्त को 1945 को सरेंडर की घोषणा कर दी.