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बिहार से 4 गुना छोटा देश है इजरायल, कैसे 22 मुल्कों वाली अरब लीग के लिए बना मुसीबत

यहूदियों का इतिहास वैसे भी जुल्म और खून से सना हुआ है. ऐसे में दुनिया के एकमात्र यहूदी देश इजरायल का सफर आसान नहीं था. आज इजरायल जिस मजबूती और ताकत के साथ दुनिया के नक्शे में अपनी अलग जगह बना चुका है. उसके लिए उसे एक लंबे शोषण के दौर से गुजरना पड़ा है. 

इजरायल बनाम इजरायल बनाम
Ritu Tomar
  • नई दिल्ली,
  • 09 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 7:14 PM IST

साल 1948 में दुनिया के नक्शे पर एक नए मुल्क की सरहदें खीचीं गईं. यह नया राष्ट्र कहलाया इजरायल. लेकिन यहूदियों के इस मुल्क के अस्तित्व को मिस्र, इराक, लेबनान, सऊदी अरब और जॉर्डन जैसे अरब मुल्क नकारते रहे. क्षेत्रफल के लिहाज से बिहार से भी चार गुना छोटे इजरायल को अरब वर्ल्ड अपने गले की फांस समझता है. यही वजह है कि इजरायल के अस्तित्व में आने से पहले ही अरब मुल्कों ने उस पर बहिष्कारों की बौछार करनी शुरू कर दी थी. लेकिन दशकों के शोषण और उपेक्षा सहने के बाद भी आज इजरायल सीना ताने खड़ा है. 

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यहूदियों का इतिहास वैसे भी जुल्म और खून से सना हुआ है. ऐसे में दुनिया के एकमात्र यहूदी देश इजरायल का सफर आसान नहीं था. आज इजरायल जिस मजबूती और ताकत के साथ दुनिया के नक्शे में अपनी अलग जगह बना चुका है. उसके लिए उसे एक लंबे शोषण के दौर से गुजरना पड़ा है. 

अरब लीग कैसे बना?

इजरायल के गठन से पहले फिलिस्तीन में अलग राष्ट्र का समर्थन करने वाले यहूदी समुदाय को Yishuv कहा जाता था. इन यहूदियों का विरोध ही अरब लीग के जन्म का कारण बना. दो दिसंबर 1945 को छह देशों ने मिलकर अरब लीग (Arab League) की स्थापना की थी. आज 22145 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इजरायल के खिलाफ 22 देशों का यह गुट कई दशकों से मोर्चा खोले हुए है. इसी दिशा में अरब लीग ने बायकॉट इजरायल (Boycott Israel) स्ट्रैटेजी शुरू की. इसका मकसद अरब मुल्कों और इजरायल के बीच आर्थिक और अन्य संबंधों को पनपने नहीं देना था. इजरायल के साथ सभी तरह के व्यापारिक संबंधों पर रोक लगाई गई. 

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अरब लीग में 22 देश हैं, जिनमें अल्जीरिया, बहरीन, मिस्र, इराक, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, लीबिया, मॉरिशियाना, मोरक्को, ओमान, फिलिस्तीन, कतर, सऊदी अरब, सोमालिया, सूडान, ट्यूनीशिया, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, जिबूती, कोमोरस और सीरिया है. सीरिया को फिलहाल अरब लीग से सस्पेंड कर दिया गया है.

इजरायल के खिलाफ अरब वर्ल्ड की बायकॉट स्ट्रैटेजी

अरब लीग ने इस संबंध में एक घोषणापत्र जारी किया, जिसमें सभी अरब मुल्कों से आग्रह किया गया कि वे फिलिस्तीन में यहूदियों द्वारा बनाए गए सामान का इस्तेमाल नहीं करें. 1946 में अरब लीग ने मिस्र की राजधानी काहिरा में एक स्थाई बहिष्कार समिति का गठन किया. यहूदियों के बहिष्कार का यह प्रस्ताव 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद भी जारी रहा. इसका मकसद फिलिस्तीन में यहूदी इंडस्ट्री को कमजोर करना और क्षेत्र में यहूदियों के इमिग्रेशन को रोकना था. संयुक्त राष्ट्र के 'टू स्टेट सॉल्यूशन' के प्रस्ताव के बाद यह बायकॉट स्ट्रैटेजी ज्यादा तेज हुई. लेकिन इसका नतीजा मनमाफिक साबित नहीं हुआ.

अरब देशों को जब यह लगा कि इजरायल के बहिष्कार की यह नीति उतनी कारगर साबित नहीं हो रही है, जितना उन्हें अंदाजा था. इसके बाद दूसरे बायकॉट की स्ट्रैटेजी लाई गई. इसके तहत गैर इजरायली कंपनियों को इजरायल के साथ कारोबार करने से रोका गया. था. जो कंपनियां इसका पालन नहीं कर रही थीं, उन्हें अरब वर्ल्ड बड़ी फुर्ती से ब्लैकलिस्ट करने लगा. अरब लीग के बायकॉट का इजरायल की अर्थव्यवस्था और विकास पर नकारात्मक असर पड़ा. लेकिन साथ में अरब देशों की आर्थिक कल्याणकारी नीतियां भी प्रभावित हुई.

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अरब मुल्कों ने आगे चलकर इजरायल के खिलाफ परमानेंट बायकॉट समिति का गठन भी किया, जिसका नतीजा यह निकला कि इजरायल और अरब मुल्कों के बीच युद्ध शुरू हो गया. अरब मुल्कों ने लगातार इजरायल के बहिष्कार की नीति को अपनाए रखा. अरब लीग ने इजरायल के साथ डाक, टेलीफोन और रेडियो कम्युनिकेशन बंद कर दिया और समुद्र, जमीन और वायु तीनों माध्यमों से इजरायल को ब्लॉक करके रखा. 

मिस्र से सीरिया पहुंचा एंटी इजरायल एजेंडा

इजरायल के बहिष्कार के लिए बनाई गई बायकॉट कमेटी ने मिस्र से निकलकर सीरिया के दमिश्क में डेरा डाल लिया. इजरायल के ब्लॉकेज के लिए बकायदा बायकॉट ऑफिसेज बनाए गए. बायकॉट ऑफिस का हेडक्वार्टर दमिश्क में था जबकि इसकी शाखाएं अरब लीग से जुड़े हर देश में थी. इन ऑफिसेज का काम बायकॉट स्ट्रैटेजी के पालन पर नजर रखना था. 

ये भी पढ़ें: अंग्रेजों की एक 'चिट्ठी', हिटलर की नाजी सेना का नरसंहार... यहूदियों के अलग मुल्क इजरायल के बनने की कहानी
 

दुश्मनों से घिरा इजरायल होता गया ताकतवर

इजरायल का क्षेत्रफल 22145 वर्ग किलोमीटर है. यह बिहार के 94164 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल से बहुत छोटा है. छोटा और दुश्मनों से घिरा होने के बावजूद भी इजरायल के हौंसले पस्त नहीं हुए. हर युद्ध के साथ इजरायल खुद को और मजबूत करता चला गया.

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एक अकेला देश हर बार 22 देशों के गुट पर भारी पड़ता रहा. इजरायल ने 1948 के बाद से अब तक हर दशक में कई कई युद्ध लड़े हैं. फिर चाहे वह 1956 हो, 1964, 1967, 1973, 1978, 1987, 1991, 1993, 1994, 1995, 2000, 2002, 2006, 2008, 2014, 2015, 2017, 2018 या फिर 2021. इजरायल ने या तो इन बीते सालों में फिलिस्तीन से अकेले टक्कर ली है या फिर अरब लीग के गुट से लोहा लिया है.

इजरायल की ताकत उसकी सेना

इजरायल की ताकत उसकी सेना में बसती है. इसकी मिलिट्री स्ट्रेंथ की ताकत के कई फैक्टर है, जिनमें सैन्य नीतियां, अत्याधुनिक हथियार और अमेरिका से लगातार मिलती मदद शामिल है. इजरायल हथियारों और जवानों की ट्रेनिंग पर काफी पैसा खर्च करता है. यही वजह है कि वह अकेला होकर भी कई देशों पर भारी पड़ता नजर आता है. 

इजरायल की सेना को दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में गिना जाता है. वह अपनी सैन्य मजबूती के लिए जाना जाता है. इजरायल को उसके अत्याधुनिक हथियार और मजबूत बनाते हैं. इजरायल सबसे ज्यादा आधुनिक हथियार बेचता है. लेकिन इजरायल का एक हथियार ऐसा है, जो दुश्मनों के पसीने छुटा देता है. वह है आयरन डोम.

इजरायल का डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' दुश्मनों के हर रॉकेट और मिसाइल को निष्क्रिय कर देता है. कोई भी देश, किसी भी समय, किसी भी दिशा से अगर इजरायल पर रॉकेट दागता है तो यह आयरन डोम उसे निष्क्रिय कर  देता है. कोई भी देश अभी तक आयरन डोम का तोड़ नहीं निकाल पाया है.

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अमेरिका से इजरायल की दोस्ती डराती है अरब लीग को

1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से ही उसे अमेरिका का समर्थन मिलता रहा है. अमेरिकी सरकार हथियारों की बिक्री से लेकर आर्थिक सहायता तक हर तरह की मदद मुहैया कराते हैं. आंकड़ें गवाह हैं कि 2020 में अमेरिका ने इजरायल को 3.2 अरब डॉलर के हथियार बेचे हैं. अमेरिका इस साल इजरायल को 1.9 करोड़ डॉलर की सैन्य मदद भी दे चुका है. 

अमेरिका ने 2014 में इजरायल के साथ एक डील की थी, जिसके तहत वह इजरायल को सैन्य मदद देगा. इस समझौते को अमेरिका-इजरायल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप कहा जाता है. 

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