
पढ़ने-सुनने में बेहद आधुनिक और अलग लगता ये तबका खैबर पख्तूनख्वा की चित्राल घाटी में फैला हुआ है, जो चारों तरफ हिंदू-कुश की पहाड़ियों से घिरा है. अनुमान है कि दुर्गम पहाड़ों से घिरा होने के कारण ही लगभग 4 हजार की आबादी वाले कलाशा समुदाय की सभ्यता-मान्यताएं अब तक सुरक्षित हैं, वरना कब की पाकिस्तानी सख्ती का शिकार हो जातीं.
हिंदु कुश की भी हैं ढेरों कहानियां
सिकंदर जब दुनिया जीतने निकला तो इस इलाके में भी ठहरा और जीतकर आगे निकल गया. तब इसे कौकासोश इन्दिकौश कहा जाने लगा, यूनानी में जिसका मतलब है हिंदुस्तानी पर्वत. कलाशा जनजाति को कई इतिहासकार सिकंदर का वंशज मानते हैं, जबकि कई हिंदुस्तानी मूल का.
11वीं सदी के अंत में इन हिंदुओं को काफिर कहते हुए खूब मारकाट मचाई गई. ज्यादातर समुदायों ने धर्म बदल लिया. यही वो समय था, जब इन पहाड़ों को हिंदु-कुश नाम मिला, यानी हिंदुओं की हत्या करने वाला. सबसे पहले ये नाम मुस्लिम घुमक्कड़ इब्न बतूता ने दिया, जिसके बाद यही चलन में आ गया.
अलग हैं मान्यताएं
धर्म परिवर्तन के दबाव के बीच भी कलाशा जनजाति के कुछ लोग बचे रह गए और लगभग उन्हीं देवी-देवताओं और रीति-रिवाजों को मानते रहे, जो उनके पूर्वजों से उन्हें मिला था. जैसे पाकिस्तान में रहने के बाद भी ये लोग खुलकर मूर्तिपूजा करते हैं. शिव और इंद्र को मानते हैं. साथ ही यहां यम देव की पूजा भी होती है. कबीलाई मान्यता के मुताबिक जान लेने वाले यही देवता प्राण भी फूंकते हैं. तो किसी की मौत को भी कलाशा उत्सव की तरह देखते हैं और रोने की बजाए नाचते-गाते हैं.
अभी चल रहा है सबसे बड़ा पर्व
दिसंबर का यही समय कलाशा समुदाय के सबसे बड़े त्योहार चाओमास का समय है. इस दौरान लोग अपने शरीर और आत्मा की शुद्धि करते हैं. ये शुद्धि मुश्किल व्रत से नहीं, बल्कि नाच-गाने और बढ़िया भोजन से आती है. पहाड़ों पर आग जलाई जाती है, जिसके चारों ओर इकट्ठे होकर लोग नाचते और ऊपरवाले से खुद को शुद्ध करने की प्रार्थना भी करते हैं. इस दौरान मेला भी लगता है और भेड़-बकरियों की बलि भी दी जाती है, लेकिन त्योहार का सबसे अहम हिस्सा संगीत और मेल-मुलाकातें हैं.
इस तरह होगी मेल-मुलाकात
लगभग दो हफ्ते तक चलने वाले पर्व में महिलाएं नाचेंगी-गाएंगी, शराब से मिलता-जुलता पेय भी लेंगी और अगर कोई दूसरा पुरुष पसंद आ जाए तो त्योहार खत्म होते ही पति से कहकर उसके साथ चली जाएंगी. ये भी हो सकता है कि कुछ दिनों बाद मेल न बैठने पर दोबारा लौट आएं. तब पति बिना ना-नुकर उसे स्वीकार कर लेगा. या अगर वो दूसरी शादी कर लेता है तो पूर्व-पत्नी अगले साल त्योहार का इंतजार करेगी ताकि नया साथी खोजा जा सके.
ऐसे होता है नई दुल्हन का स्वागत
बेहद कम आबादी होने के बावजूद दूर-दूर तक बिखरे होने के कारण लोग साल के ज्यादातर समय आपस में मिल नहीं पाते. त्योहार इन्हें वो मौका देता है. बोनफायर के चारों ओर नाचते हुए अक्सर दो लोग एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. त्योहार खत्म होने के बाद महिला अपने मनपसंद साथी के घर चली जाती है, जहां आटे की माला पहनाकर उसे स्वीकार कर लिया जाता है. इसके बाद एक छोटी-सी पार्टी होती है, जिसमें अंगूर की शराब परोसकर एक तरह से एलान किया जाता है कि फलां औरत अब इस घर की सदस्य है.
अविवाहित महिलाओं के साथ थोड़ी बंदिश है
अगर उसे कोई पसंद आ जाए, लेकिन उसके परिवार को एतराज हो तो त्योहार ही उन्हें मौका देता है कि वे रिश्ते को नाम दे सकें. जब सारे लोग बोनफायर के पास नाचने-गाने में व्यस्त होते हैं, लड़की अपने मनपसंद साथी के साथ भागकर एकाध दिन के लिए गायब हो जाती है. लौटने पर उसे स्वीकार कर लिया जाता है.
समुदाय के गहने-कपड़े भी उतने ही रंगारंग
यहां महिलाएं कांच और पत्थर से बनी लंबी-छोटी मालाएं पहनती हैं और सिर पर रंगीन टोपी होती है. आमतौर पर वे ढीले-ढाले काले कपड़े पहनती हैं, जिनके किनारों पर रंगीन धागों का काम होता है. त्योहार के मौके पर ये कपड़े ज्यादा कलरफुल हो जाते हैं. नई शादीशुदा और संतान की इच्छा रखने वाली महिलाएं सीप के गहने भी पहनती हैं, जो फर्टिलिटी के लिए होता है. सबसे खास बात ये है कि कलाशा महिला कभी चेहरा नहीं ढंकती और अपनी खूबसूरती के लिए पूरे पाकिस्तान में जानी जाती हैं.
सैलानियों के चलते आ रहा बदलाव
आमतौर पर हरी-भूरी आंखों और खुले दिल-दिमाग वाली कलाशा औरतों पर भी धीरे-धीरे बाकी पाकिस्तान की छाया पड़ रही है. दरअसल कलाशाओं के अनोखेपन के चलते यहां सैलानी आने लगे. खासकर दिसंबर के इस पर्व को देखने पाकिस्तान के दूर-दराज से पुरुष आते हैं. वे यहां की महिलाओं से जुड़ते और उन्हें अपने साथ ले जाते हैं. हालांकि खुले और बराबरी के माहौल में पली-बढ़ी महिलाएं बाहर की बंदिशें झेल नहीं पातीं, और टूट जाती हैं.
पाक सरकार ने नहीं दी कोई सुविधा
ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान का कहना है कि अक्सर शादी के बाद पाकिस्तान के दूसरे हिस्से में गई महिलाएं मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाती हैं. इस बारे में कई दूसरी मानवाधिकार संस्थाएं भी बात कर रही हैं ताकि कलाशा समुदाय का अनूठापन बाकी रहे, हालांकि पाकिस्तान में किसी भी सरकार ने उन्हें बचाने के लिए कोई काम नहीं किया. यहां तक कि साल 2018 से पहले तक इन्हें पाकिस्तानी जनगणना तक में शामिल नहीं किया गया था, यानी न तो वे सरकार चुन सकते थे, न ही सरकारी नौकरी पाने के हकदार थे.
हमारे यहां भी ट्राइब्स में है ऐसा ही चलन
कलाशा महिलाओं की तरह ही हमारे यहां भी कुछ आदिवासी समुदाय ऐसे हैं, जहां औरतें मनपसंद साथी चुनती हैं. बल्कि एक उम्र के बाद युवक-युवती दोनों ही अलग-अलग लोगों से मिलते और साथ वक्त बिताते हैं ताकि पसंदीदा लाइफ पार्टनर चुन सकें. छत्तीसगढ़ के बस्तर में गोंड समुदाय के आदिवासी युवक-युवती जहां मेलजोल करते हैं, उसे घोटुल कहते हैं.
बेरोक-टोक मिलते हैं युवा लड़के-लड़कियां
आसान भाषा में कहें तो ये एक तरह का यूथ क्लब है, जहां अविवाहित युवक-युवतियां आते-रहते और कई चीजें सीखते हैं, जैसे शादी के बाद परिवार चलाना, खान-पान, रिश्तेदारी निभाना. घोटुल गांव की सीमा पर बांस और मिट्टी से बना घर होता है. यहां डॉर्मेट्री की तरह खुला हुआ हॉल होता है, जहां लोग सोते हैं. यहां आने वाली लड़कियों को मुटियारिन और लड़कों को चेलिक कहते हैं. शाम ढलते ही घोटुल में लोग आने लगते हैं. युवा खाते-पीते, बातचीत करते हैं और इसी दौरान अगर कोई पसंद आए तो शादी कर लेते हैं. इसपर किसी को कोई एतराज नहीं होता.
कलाशा समुदाय के चाओमास पर्व की तरह ही मध्यप्रदेश के झाबुआ में भी भगोरिया फेस्टिवल होता है, जहां युवा भागकर शादी करते हैं.