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फिलिस्तीनी कवि और यहूदी लड़की का वो सीक्रेट इश्क, जो इजरायल के कारण नहीं हो सका मुकम्मल

फिलिस्तीन के मशहूर कवि महमूद दरवेश की कविताओं में प्यार और फिर अलगाव अक्सर देखने को मिला. उन्होंने एक बार लिखा कि मेरे धर्म, मेरे शहर और रीति-रिवाजों की बेड़ियों के बावजूद मैं तुमसे प्यार करता हूं. लेकिन मुझे डर है कि अगर सबकुछ बेच दूंगा तो तुम मुझे बेच दोगी और मेरे पास निराशा के अलावा कुछ नहीं बचेगा

महमूद दरवेश और तमर बेन अमी महमूद दरवेश और तमर बेन अमी
Ritu Tomar
  • नई दिल्ली,
  • 07 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 11:01 AM IST

एक दिन युद्ध खत्म होगा

सियासतदार एक बार फिर हाथ मिलाएंगे

बूढ़ी मां शहीद बेटे का इंतजार करती रहेगी

अनाथ हो चुके बच्चे पिता के लौटने की आस में होंगे

नहीं पता किसने हमारी सरजमीं बेची

लेकिन मैंने देखा उसकी कीमत किसने चुकाई...

ये पंक्तियां फिलिस्तीन के मशहूर कवि महमूद दरवेश की एक कविता की हैं, जिनमें युद्ध और उसके बाद की त्रासदी का पूरा निचोड़ सिमटा हुआ है. श्रेष्ठता के नशे और जमीन के टुकड़ों के लिए लड़े जाने वाले युद्धों की असल कीमत ऐसे लोगों को अधिक चुकानी पड़ती है, जिनका इससे कोई राब्ता नहीं होता. इजरायल और फिलिस्तीन के बीच दशकों की नफरत के इन्हीं गलियारों में कभी कविताओं में बुनी हुई थी एक खूबसूरत प्रेम कहानी. इस प्रेम कहानी के नायक महमूद दरवेश थे, जिन्हें तमर बेन अमी नाम की यहूदी लड़की से इश्क हो गया था.

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कहा जाता है कि प्रेम को मजहबी दीवारों में कैद नहीं किया जा सकता. 1948 में जब अरब-इजरायल युद्ध शुरू हुआ, उस समय दरवेश की उम्र सात साल थी. इस हमले में तमाम फिलिस्तीनी दरबदर हो गए थे. जंग की वजह से दरवेश के परिवार को लेबनान जाना पड़ा. जुल्म का यह दौर 1948 में इजरायल के गठन के बाद भी बदस्तूर जारी रहा. लेकिन उनका परिवार अगले साल इजरायल शिफ्ट हो गया और हेफा शहर में गुजर-बसर करने लगा. पर अपनी जमीं से दूर रहना दरवेश को हमेशा कचोटता रहा. इसी निराशा और बेबसी से उनकी लेखनी को धार मिली.

तमाम फिलिस्तीनियों की तरह अपने राष्ट्र की मुक्ति की इच्छा का सपना संजोते हुए दरवेश बड़े हुए. वैसे तो उन्होंने काफी कम उम्र में ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था. लेकिन अब उनकी कविताओं में फिलिस्तीन के लोगों के संघर्ष की झलक साफ दिखने लगी थी. शायद यही कारण था कि वह सियासी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे और इजरायली कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए. उन्हें फिलिस्तीन ही नहीं बल्कि दुनियाभर में प्रतिरोध के कवि के रूप में प्रसिद्धि मिली.

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दरवेश का पहला काव्य संग्रह Wingless Birds 19 साल की उम्र में प्रकाशित हुआ. उनकी कविताओं में देश, युद्ध और महिलाएं मुख्य भूमिकाओं में रहे. Write Down ने उन्हें सिर्फ अरब देशों में नहीं बल्कि दुनियाभर में शोहरत दिलाई. उनकी कविता Identity Card  दुनियाभर में प्रतिरोध की आवाज बन गई, दुनिया में उस समय जहां कहीं भी प्रदर्शन हुए, उनकी इस कविता को प्रोटेस्ट सॉन्ग के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा.

1973 में फिलिस्तीन लिबरेशन संगठन से जुड़ने की वजह से उन्हें निर्वासन में रहने को मजबूर होना पड़ा. वह 26 सालों तक बेरूत और पेरिस में रहे. 1996 में उन्हें वेस्ट बैंक के रामल्लाह में रहने की इजाजत दी गई थी. उनके करिअर में 30 काव्य संग्रह प्रकाशित हुए. 2008 में उनका निधन हुआ. लेकिन उनके इंतकाल के 16 साल बाद आज भी उनकी उस प्रेम कहानी की चर्चा होती है, जो भले ही मुकम्मल नहीं हो पाई हो लेकिन एक समय में जंग की विभीषिका के बीच कविताओं और चिट्ठियों से पिरोई गई थी.

युद्ध और प्रेम साथ-साथ चले...

दरवेश की कविताएं इजरायली शासन को लेकर फिलिस्तीनी प्रतिरोध का बिगुल भी थीं. इजरायल में उनके निवास के दौरान ही 1964 में उनका काव्य संग्रह Leaves of the Olive Tree, 1966 में A Lover from Palestine और 1967 में End of Night प्रकाशित हुआ. यह वह समय था, जब दरवेश इजरायल की एक कम्युनिस्ट पार्टी Rakah से जुड़े हुए थे. यह पार्टी इजरायल में फिलिस्तीन के अधिकारों की पैरोकार थी. दरवेश ने पार्टी के अखबार अल-इत्तिहाद के अरबी संस्करण का संपादन भी किया. उस समय इजरायल में रह रहे फिलिस्तीन खुलकर राष्ट्रवादी भावना व्यक्त नहीं कर सकते थे लेकिन दरवेश लगातार अपनी कविताओं में फिलीस्तीन के प्रति अपने प्रेम और इजरायली अत्याचार को लेकर खुलकर लिख रहे थे. इस वजह से वह कई बार जेल गए. कई मौकों पर उन्हें घर में नजरबंद भी कर दिया जाता था. दरवेश के लिए फिलिस्तीन का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भावनाओं का व्यक्त करने का प्रिज्म बन गया.

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महमूद दरवेश उस समय महज 17 साल के थे, जब उनकी मुलाकात 16 साल की तमर से हुई. वह यहूदी महिला थी. दोनों की मुलाकात राकाह की एक रैली के दौरान हुई थी. दरवेश के लिए यह पहली नजर का प्यार था, कहा जाता है कि He fell first but she fell harder... दरवेश सालों तक तमर को चिट्ठियां लिखते रहे. जंग की त्रासदियों के बीच दुश्मन ऱाष्ट्रों के बाशिंदों का यह प्रेम परवान चढ़ रहा था. दरवेश हिब्रू भाषा में तमर को चिट्ठियां लिखा करते थे. दोनों का रिश्ता लंबे समय तक सीक्रेट ही रहा.

प्यार और फिर अलगाव उनकी कविताओं का सार हुआ करता था. उन्होंने एक बार लिखा कि- मेरे धर्म, मेरे शहर और रीति-रिवाजों की बेड़ियों के बावजूद मैं तुमसे प्यार करता हूं. लेकिन मुझे डर है कि अगर सबकुछ बेच दूंगा तो तुम मुझे बेच दोगी और मेरे पास निराशा के अलावा कुछ नहीं बचेगा. दरवेश अपनी कविताओं में रीटा नाम की महिला का जिक्र किया करते थे. उन्होंने अपनी कई कविताओं में रीटा को प्रतीकात्मक तौर पर व्यक्त किया. रीटा का जिक्र इजरायल और फिलिस्तीन के बीच शांति और सुलह की किसी भी तरह की संभावना नहीं होने का प्रतीक भी था.

दरवेश ने सालों बाद एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि वह अपनी कविताओं में जिस रीटा नाम की स्त्री का जिक्र करते हैं. वह असल में तमर ही है. तमर के लिए ही लिखी गई उनकी एक मशहूर कविता Rita and the Rifle को उनकी महानतम कृतियों में शुमार किया जाता है.

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1964 में दरवेश ने अपनी बेहद लोकप्रिय कविता Write down I'm an Arab लिखी, जिस वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा. इसी नाम से बाद में दोनों के रिश्तों पर एक डॉक्यूमेंट्री भी रिलीज हुई. 1973 में प्रकाशित Journal of an Ordinary Grief में दरवेश लिखते हैं कि रेत और पानी के बीच उसने कहा, आई लव यू. इच्छा और प्रताड़ना के बीच मैंने भी कहा, आई लव यू.

रोचक बात ये है कि इसी संग्रह में दरवेश लिखते हैं कि जब वह जेल में मुझसे मिलने आई तो जेल अधिकारी ने उससे पूछा कि तुम कौन हो और यहां क्या करने आई हो? इस पर उसने कहा कि मैं इनकी माशूका हूं और इन्हें अलविदा कहने आई हूं. उसने जेल अधिकारी को बताया कि वह भी अगले साल तक अधिकारी बन जाएगी. वह अपने साथ इजरायली सेना आईडीएफ में भर्ती होने का नियुक्ति पत्र लेकर आई थी. कहा जाता है कि तमर का आईडीएफ में भर्ती होना उनके इश्क का अंत था. बाद में दरवेश ने लिखा कि ऐसा लग रहा है कि एक बार फिर मेरे मुल्क पर किसी ने कब्जा कर लिया है.

बाद में ऐसी अटकलें भी लगीं कि दरवेश ने इश्क से ज्यादा अपने राष्ट्रप्रेम को तरजीह दी. अपनी जमीं के लिए दरवेश ने तमर से रिश्ता खत्म कर लिया. लेकिन उनके लिए देशप्रेम और तमर के लिए उनका इश्क साथ-साथ ही चला. जब भी वह रीटा के बारे में लिखते थे तो वास्तव में वह अपने वतन के बारे में लिख रहे होते थे. ठीक इसी तरह से जब भी उन्होंने अपने वतन के बारे में लिखा तो उसमें रीटा की मौजूदगी का अहसास भी था.

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वह एक जगह लिखते हैं कि हमने एक बार कहा था कि सिर्फ मौत ही हमें अलग कर सकती है... लेकिन मौत आने में देरी हो गई और हम अलग हो गए.

इजरायली सरकार गिरने की वजह बन सकते थे दरवेश

दरवेश ने 1971 में इजरायल छोड़ दिया और वह मॉस्को यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगे. वह 1987 में फिलिस्तीन लिबरेशन संगठन (पीएलओ) की कार्यकारी समिति के सदस्य बने और फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने वाले घोषणापत्र का मसौदा तैयार करने में मदद की. 1993 में इजरायल और पीएलओ के बीच ऑस्लो समझौता होने पर दरवेश ने पीएलओ की सदस्ता से इस्तीफा दे दिया. अपनी बीमार मां से मिलने वह 1995 में वापस इजरायल लौटे.

साल 2000 में इजरायल के शिक्षा मंत्रालय ने उनके काव्य संग्रह को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव भी रखा था, जिसका व्यापक स्तर पर विरोध भी हुआ, जिस वजह से उस समय के इजरायली प्रधानमंत्री एहुद बराक ने कहा कि अभी मुल्क इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं है.

फिलिस्तीन के नेशनलिस्ट मूवमेंट में दरवेश की भूमिका की वजह से उन्हें राष्ट्रवादी कवि का दर्जा मिला. उनकी कविताओं में प्रेम, युद्ध, शांति के साथ फिलिस्तीनी जनता का दुख और संघर्ष मुखर होकर बोलता है. 2000 में जब इजरायल के उस समय के शिक्षा मंत्री योसी सारिड ने इजरायली स्कूलों में दरवेश की कविताओं को शामिल करने का सुझाव दिया तो सरकार में शामिल दक्षिणपंथी नेताओं ने विश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार गिराने की धमकी दे डाली. बाद में दरवेश ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था कि इजरायली अपने छात्रों को यह पढ़ाना नहीं चाहते कि कभी एक अरबी कवि और उनकी सरजमीं के बीच भी एक प्रेम कहानी रही है. मैं तो बस इतना चाहता हूं कि कविताओं का लुत्फ उठाने के लिए मेरा काव्य पढ़ा जाए ना कि मुझे दुश्मन देश के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाए..

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