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कोरोना, भ्रष्टाचार और महंगाई... श्रीलंका से ज्यादा पीछे नहीं है नेपाल!

नेपाल में एक बड़े आर्थिक तूफान की सुगबुगाहट तेज हो गई है. कोरोना काल की तबाही, बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार की दीमक ने वहां की अर्थव्यवस्था को खोखला करने का काम कर दिया है.

नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा
सुधांशु माहेश्वरी
  • नई दिल्ली,
  • 13 जुलाई 2022,
  • अपडेटेड 7:01 AM IST
  • नेपाल में 45 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जा सकती है
  • विदेशी मुद्रा भंडार में 16.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई

श्रीलंका में हालात एक बार फिर विस्फोटक बन गए हैं. राष्ट्रपति गायब हैं, प्रधानमंत्री का इस्तीफा हो चुका है और सड़कों पर आम जनता अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है. खाने के लाले पड़ रहे हैं, ईंधन की कमी ने काम ठप कर दिया है और महंगाई के बोझ तले दबी अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है. जो हाल इस समय श्रीलंका में देखने को मिल रहा है, जैसी त्रासदी वहां के लोगों को सहन करनी पड़ रही है, उसका ट्रेलर भारत के एक और पड़ोसी मुल्क में शुरू हो गया है. हम बात कर रहे हैं नेपाल की जो इस समय कर्ज से परेशान है, महंगाई से बेबस है और भ्रष्टाचार की दीमक ने उसकी अर्थव्यवस्था को खोखला करना शुरू कर दिया है.

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नेपाल में महंगाई ने कर दिया बेड़ा गर्क

सोमवार को नेपाल की खुदरा महंगाई दर का आंकड़ा जारी किया गया था. अब नेपाल में खुदरा महंगाई दर 8.56% तक पहुंच चुकी है, ये पिछले 6 सालों में सर्वधिक है. चिंता वाला ट्रेंड ये है कि पिछले कई महीनों से लगातार नेपाल में महंगाई दर इसी तरह बढ़ रही है. पिछले महीने ये आंकड़ा 7.87% चल रहा था, वहीं पिछले साल तक तो जून महीने में महंगाई दर 4.19% दर्ज की गई थी. लेकिन कोरोना और फिर रूस-यूक्रेन युद्ध ने जमीन पर समीकरण ऐसे बदले कि नेपाल में लोगों की जेब खाली हो रही है, फल-सब्जी-तेल सब महंगे हो रहे हैं और फुल स्पीड से बड़ी संख्या में लोग एक बार फिर गरीबी रेखा के नीचे जा रहे हैं.

45 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे चली जाएगी?

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हाल ही में वर्ल्ड बैंक ने एक आंकड़ा जारी किया था. अनुमान लगाया गया था कि नेपाल की 45 फीसदी आबादी ऐसी है जो 'लो इनकम ग्रुप' में आती है. ये लोग गरीबी रेखा से जरूर ऊपर हैं, लेकिन इनकी स्थिति कुछ खास नहीं. इसी वजह से अब जब फिर महंगाई तेजी से बढ़ रही है, कहा जा रहा है कि ये 45 फीसदी आबादी कभी भी फिर गरीबी रेखा से नीचे जा सकती है. नेपाल के लिए ये महंगाई इसलिए ज्यादा बड़ी सिरदर्दी है क्योंकि यहां का गरीब अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा सिर्फ खाने-पीने की चीजे खरीदने पर खर्च करता है. साल 2017 में Household Survey हुआ था. उस सर्वे में ये पाया गया कि नेपाल के 10 फीसदी गरीब ऐसे हैं जो अपनी कुल कमाई का दो तिहाई हिस्सा सिर्फ दो वक्त की रोटी पर खर्च कर देते हैं. वहीं जो 10 फीसदी अमीर लोग हैं, उनका खाने पर सिर्फ एक चौथाई खर्च होता है. ऐसे में आने वाले समय में बढ़ती महंगाई के साथ नेपाल में गरीबी भी बड़ी चुनौती बनने वाली है. नेशनल प्लानिंग कमीशन की एक रिपोर्ट में तो दावा भी हो चुका है कि नेपाल में अगर खाने का का सामान 10 फीसदी तक महंगा होगा तो देश में चार प्रतिशत तक गरीबी भी बढ़ जाएगी.

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विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव, 16.3 फीसदी की गिरावट

अब नेपाल में महंगाई की मार तो है ही, लेकिन इसके साथ-साथ विदेशी मुद्रा भंडार भी दबाव में है. अभी श्रीलंका जैसी हालत तो नहीं हुई है लेकिन जानकार बताते हैं कि  वर्तमान स्थिति को देखते हुए नेपाल द्वारा सिर्फ छह से सात महीनों तक के आयात का बिल चुकाया जा सकता है. ऐसा कहा जाता है कि ये क्षमता कम से कम सात महीने तो होनी ही चाहिए, ऐसे में आने वाले समय में इस मोर्चे पर नेपाल फंस सकता है. आंकड़ों में बात करें तो पिछले आठ महीनों के अंदर नेपाल के विदेशी मुद्रा भंडार में 16.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.

बड़ी बात ये भी है कि नेपाल का 90 फीसदी अंतरराष्ट्रीय कारोबार आयात के रूप में होता है. ऐसे में अगर दूसरे देशों में महंगाई बढ़ेगी, तो वहां पर सामान महंगा होगा और जब नेपाल  उन वस्तुओं का अपने देश में आयात करेगा, उसे सीधे-सीधे ज्यादा खर्च करना पड़ेगा. आईएमएफ के सांख्यिकी प्रभाग के पूर्व प्रमुख माणिक लाल श्रेष्ठ के मुताबिक इस साल की शुरुआत से नेपाल के आयात बिलों में 20 फीसदी तक का इजाफा हो चुका है.

विदेश में रह रहे नेपालियों की कमाई पर सबकुछ निर्भर

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यहां ये जानना जरूरी हो जाता है कि नेपाल का विदेशी मुद्रा भंडार विदेश में रह रहे नेपालियों की कमाई पर काफी निर्भर है. 30 लाख के करीब नेपाली कई देशों में नौकरी कर रहे हैं. ऐसा देखा गया है कि दूसरे देशों में रह रहे नेपाली अपने परिवार के लिए पैसे नियमित रूप से भेजते रहते हैं. पिछले पांच सालों में तो विदेशी मुद्रा में नेपालियों की भेजी गई कमाई का हिस्सा 54.6 प्रतिशत के करीब रहा है. इसी के दम पर अब तक व्यापार घाटे को भी पाट दिया जाता था.  श्रीलंका जैसी स्थिति भी नेपाल में अभी सिर्फ इसलिए नहीं आई है क्योंकि विदेश में रह रहे नेपालियों की कमाई की वजह से विदेशी मुद्रा भंडार सुचारू रूप से चल रहा है. लेकिन बढ़ती महंगाई ने स्थिति को बदला है. जब से कोरोना काबू में आया है, विदेशों में बैठे लोग अपने घर ज्यादा पैसे नहीं भेज रहे हैं. इसके अलावा कोरोना काल में जो आयात काफी कम कर दिया गया था, पिछले साल फरवरी महीने के बाद से उसमें भी बढ़ोतरी देखी गई. ऐसे में विदेशी मुद्रा भंडार पर ज्यादा जोर पड़ा है.

कोरोना ने पर्यटन इंडस्ट्री को कर दिया चौपट

वैसे महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार की वजह से तो नेपाल की मुसीबत बढ़ी ही है, इसके अलावा कोरोना काल में पर्यटन पर जो असर पड़ा है, उसने सीधे-सीधे नेपाल को बड़ी चपत लगाई है. नेपाल घूमने के लिए सबसे ज्यादा भारत और चीन से ही लोग आते हैं. पश्चिमी देशों से भी लोग काठमांडू की खूबसूरती देखने के लिए आते रहते हैं. लेकिन कोरोना के दो सालों ने इस ट्रेंड को तोड़ दिया है. काठमांडू पोस्ट में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक 2018-19 में टूरिज़्म से नेपाल को 75 बिलियन नेपाली रुपया की कमाई हुई थी, लेकिन 2020-21 में वो कमाई सिर्फ 7 बिलियन नेपाली रुपया में सिमट गई है. ऐसे में सीधे-सीधे पर्यटन में 90 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है. यहां ये याद रखना चाहिए कि श्रीलंका की अर्थव्यवस्था भी बहुत हद तक पर्यटन पर निर्भर है, लेकिन कोरोना और राजनीतिक अस्थिरता ने वहां के पर्यटन को चौपट कर दिया और विदेशी मुद्रा भंडार को इसका नुकसान उठाना पड़ा.

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विदेशी निवेश के वादे बड़े, कितना आ रहा?

एक और पहलू जहां पर नेपाल कभी काफी आगे रहता था लेकिन अब पिछड़ने लगा है- वो है FDI यानी की विदेशी निवेश. आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो साल 2015 तक FDI के मामले में नेपाल काफी संतुलित चल रहा था. सबसे ज्यादा विदेशी निवेश उसे चीन से मिल रहा था. अभी भी चीन ही उसे सर्वधिक विदेशी निवेश दे रहा है, लेकिन उसमें कमी दर्ज की गई है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि 2019-20 में नेपाल के पास 95 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश आना था, यहां भी 88 मिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश तो अकेला चीन करने वाला था. लेकिन कोरोना और फिर राजनीतिक अस्थिरता ने देश की छवि को ऐसा धूमिल किया कि इसमें भारी गिरावट देखने को मिली. काठमांडू पोस्ट के मुताबिक भारत भी जो निवेश नेपाल में करता है, उसमें 80 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिल गई है.

Nepal Oil Corporation पर बड़ा कर्ज, किस पर संकट?

अब विदेशी निवेश घट रहा है, लेकिन Nepal Oil Corporation पर भारत का कर्ज बढ़ता जा रहा है. दूसरे देशों की तरह रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से नेपाल में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला था. इससे राहत देने के लिए सरकार की तरफ से पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले टैक्स में कटौती कर दी गई थी. उदेश्य तो जनता को राहत देना था, लेकिन उस छूट ने Nepal Oil Corporation को भारी नुकसान दिया. बताया जा रहा है कि 23 जून तक नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन पर Indian Oil Corporation का 22 अरब रुपये बकाया चल रहा है. चिंता इस बात की है कि अगर ये बकाया समय रहते नहीं दिया गया तो भारतीय सप्लायर्स को बकाए पर इंटरेस्ट भी देना पड़ेगा. Nepal Oil Corporation दावा कर रही है कि सरकार की तरफ से मदद का आश्वासन दिया गया था, उनके नुकसान की भरपाई की बात भी हुई थी, लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया. जानकार बताते हैं कि अगर स्थिति सुधारने के लिए जल्द कुछ नहीं किया गया तो Nepal Oil Corporation को साल के अंत तक 50-55 अरब रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है.

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भ्रष्टाचार की दीमक, कोरोना काल में मिस मैनेजमेंट

अब नेपाल में ये तमाम चुनौतियां अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने के लिए काफी हैं. लेकिन इन चुनौतियों के साथ-साथ नेपाल में भ्रष्टाचार की दीमक ऐसी लगी है कि खराब होती स्थिति और ज्यादा विकराल बन जाती है. नेपाल में दूसरे देशों द्वारा दिए गए फंड्स का सही तरीके से इस्तेमाल ना होना एक पुरानी बीमारी है. इसकी शुरुआत 2015 में आए नेपाल भूकंप से हो गई थी, कोरोना काल में भी इसकी झलक देखने को मिल गई.

नेपाल को कोरोना की पहली लहर के दौरान वर्ल्ड बैंक से 29 मिलियन अमेरिकी डॉलर की मदद मिली थी. यूरोपीय संघ ने भी 75 मिलियन यूरो की मदद की, IMF ने भी 214 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता की. लेकिन इस सब के बावजूद भी पहली लहर के दौरान नेपाल में लोग सामान्य सुविधाओं के लिए तरस गए. अस्पताल में बेड नहीं थे, ऑक्सीजन का इंतजाम नहीं था और जरूरी दवाइयां भी गायब रहीं. इस सब के ऊपर मेडिकल उपकरण खरीदने की प्रक्रिया भी कई बार सवालों के घेरे में आती रही. पारदर्शिता की कमी के कारण भी सरकार की नीयत पर संदेह किया गया.

अभी के लिए नेपाल में हालात चिंताजनक हैं, लेकिन पूरी तरह बेकाबू नहीं हुए हैं. जिन कारणों से श्रीलंका की हालत खस्ता हुई है, उसके शुरुआती लक्षण नेपाल में देखने को मिल रहे हैं. अगर समय रहते सरकार जरूरी कदम उठाए, खुद को ज्यादा कर्ज लेने वाली प्रवृति  से बचाए, ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था को फिर पटरी पर लाया जा सकता है.

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