
पाकिस्तान और अफगानिस्तान एक बार फिर आमने-सामने हैं. अफगान के तालिबानी लड़ाके डूरंड लाइन क्रॉस कर पाकिस्तान में दाखिल हो चुके हैं और पाकिस्तान फौज की चौकियों को निशाना बना रहे हैं. चौकियों पर गोले बरसाए जा रहे हैं. ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि यह डूरंड बॉर्डर क्या है और इसे लेकर दोनों मुल्कों में विवाद क्यों रहा है?
अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता खोवारजामी ने डूरंड लाइन को लेकर कहा है कि हम इसे पाकिस्तानी क्षेत्र नहीं मानते हैं. इसे अफगानिस्तान हाइपोथेटिकल लाइन (Hypothetical Line) भी कहता है, जो 1947 से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की सीमा है. हालांकि, अफगानिस्तान ने आधिकारिक तौर पर कभी भी डूरंड लाइन को मान्यता नहीं दी.
क्या है डूरंड लाइन?
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच 2640 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा का नाम डूरंड रेखा है. यह रेखा पश्तून जनजातीय इलाके से होकर दक्षिण में बलूचिस्तान के बीच से होकर गुजरती है. इस तरह यह पश्तूनों और बलूचों को दो देशों में बांटते हुए निकलती है. इसे दुनिया की सबसे खतरनाक सीमा भी माना जाता है.
ब्रिटिशों ने दक्षिण एशिया में अपने हितों की रक्षा के लिए डूरंड लाइन बनाई थी. इसे 1893 में ब्रिटिश इंडिया और एमिरेट्स ऑफ अफगानिस्तान के बीच बनाया गया था. इस बॉर्डर का नाम सर हेनरी डूरंड के नाम पर रखा गया है, जो उस समय गुलाम भारत के विदेश सचिव थे. इसे ब्रिटिशों ने तत्कालीन अफगान शासक अब्दुर रहमान के साथ मिलकर खींचा था. रहमान को ब्रिटेन ने अपने हितों को साधने के लिए अफगानिस्तान की हुकूमत सौंपी थी. डूरंड रेखा का बड़ा हिस्सा पीओके से होकर गुजरता है.
डूरंड लाइन की क्या जरूरत थी?
इस रेखा को उस समय भारत और अफगानिस्तान के बीच सीमा तय करने के लिए बनाया गया था. उस समय पाकिस्तान भी भारत में ही शामिल था. साथ ही उस समय पूर्व में रूस की विस्तारवादी नीति से बचने के लिए ब्रिटिश साम्राज्य ने अफगानिस्तान का बफर जोन के रूप में इस्तेमाल किया था. इस रेखा को खींचते समय स्थानीय जनजातियों और भौगोलिक परिस्थितियों को पूरी तरह से ध्यान में नहीं रखा गया था, जिसके कारण यह विवादों में रही है.
डूरंड लाइन के पास दो प्रमुख जनजातीय समूह रहते हैं. ये समूह पंजाबी और पश्तून हैं. ज्यादातार पंजाबी और पश्तून सुन्नी मुस्लिम हैं. पंजाबी पाकिस्तान में सबसे बड़ा एथनिक समूह है जबकि पश्तून अफगानिस्तान का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान सीमा के पास रहने वाले पश्तूनों का आरोप है कि इस बॉर्डर ने उनके घरों कों बांट दिया है. वे दशकों से उस इलाके में अपने परिवार और कबीले के साथ रहते थे, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने प्लानिंग के तहत पश्तून बहुल इलाकों के बीच रेखा खींच दी, जिससे पश्तून दो देशों के बीच बंट गए.
बता दें कि अफगानिस्तान में तालिबान का सत्ता में आने के बाद से डूरंड रेखा पर तनाव बढ़ा है. तालिबान इस रेखा को अफगानिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन मानता है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों पक्ष अपनी-अपनी सीमाओं को लेकर दावा करते हैं. यहीं से तालिबान द्वारा समर्थित आतंकवादी संगठन पाकिस्तान में हमले करते रहते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ जाता है.
साल 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से पाकिस्तान ने काबुल में मैत्रीपूर्ण सरकार की उम्मीद की थी, जो डूरंड लाइन को मान्यता दे.
अफगान और तालिबान की सैन्य ताकत कितनी?
तालिबान की ताकत कितनी है कि वह अफगानिस्तान की सेना पर भारी पड़ रहा? अफगानिस्तान के फर्स्ट वाइस प्रेसिडेंट कहते हैं- 'तालिबान का जल्द खात्मा होगा. उनके पास 80 हजार के करीब लड़ाके हैं और अफगानिस्तान की सेना के पास 5 से 6 लाख के बीच सैनिक. इसके अलावा अफगानिस्तान के पास वायु सेना है जो तालिबान पर भारी पड़ेगी.' हालांकि, इस दावे के बावजूद कई ऐसे फैक्ट हैं जो जमीनी स्तर पर तालिबान को मजबूत साबित कर रहे हैं.
तालिबान का मैनपावर सोर्स कबाइली इलाकों में बसे कबीले और उनके लड़ाके हैं. इसके अलावा कट्टर धार्मिक संस्थाएं, मदरसे भी उनके विचार को सपोर्ट कर रहे हैं. लेकिन इन सबसे ज्यादा पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की सीक्रेट मदद तालिबान के लिए मददगार साबित हो रही है. अमेरिकी खुफिया आकलन भी जमीनी हालात को साफ करते हैं जिसमें कहा गया है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के 6 महीने के भीतर अफगानिस्तान सरकार का प्रभुत्व खत्म हो जाएगा और तालिबान का शासन आ सकता है.