
पाकिस्तान (Pakistan) के नारोवाल से विधायक और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (PML-N) के नेता रमेश सिंह अरोड़ा ने बुधवार को पंजाब प्रांत के मंत्री पद की शपथ ली. इसके साथ ही वो बंटवारे के बाद पंजाब में मंत्री पद संभालने वाले पहले सिख बन गए हैं. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के नेतृत्व वाली पार्टी से संबंधित, अरोड़ा 8 फरवरी के चुनाव में जीतकर तीसरे कार्यकाल के लिए लाहौर प्रांतीय विधानसभा के लिए चुने गए.
49 वर्षीय रमेश सिंह अरोड़ा को हाल ही में पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक समिति का प्रधान (अध्यक्ष) और करतारपुर कॉरिडोर के एंबेसडर के रूप में भी चुना गया. अरोड़ा को पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज के मंत्रिमंडल में प्रांत के अल्पसंख्यकों का विभाग दिया गया है.
एजेंसी के मुताबिक पंजाब के ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले एक अन्य सदस्य खलील ताहिर सिंधु ने बताया कि रमेश सिंह के भाई करतारपुर कॉरिडोर के मामलों को देख रहे हैं.
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रमेश सिंह अरोड़ा कौन हैं?
11 अक्टूबर 1974 को ननकाना साहिब में जन्मे और नारोवाल जिले के रहने वाले रमेश सिंह अरोड़ा 2013 में शपथ लेने वाले पंजाब प्रांतीय विधानसभा के पहले सिख सदस्य थे. उन्होंने सोशल एंटरप्राइज में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. इसके अलावा उन्होंने लाहौर स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी के गवर्नमेंट कॉलेज और अमेरिका में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की है. सरदार रमेश, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य, वाणिज्य और निवेश पर स्थायी समिति के अध्यक्ष और पाकिस्तान सिख काउंसिल के संरक्षक-प्रमुख के रूप में भी काम किया है.
पंजाब प्रांतीय विधानसभा की ऑफिसियल वेबसाइट के मुताबिक रमेश सिंह अरोड़ा एक मशहूर ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट और सोशल वर्कर भी हैं. उन्होंने पाकिस्तान में सिख समुदाय के अधिकारों की रक्षा में अहम भूमिका निभाई और उन्हें ''द पंजाब सिख आनंद कारज विवाह अधिनियम 2018' को पारित करवाने का क्रेडिट दिया जाता है. उनकी कोशिशों की वजह से ही पाकिस्तान ऐसा पहला देश बन गया है, जहां सिख विवाह पंजीकरण अधिनियम लागू किया गया है.
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रमेश सिंह अरोड़ा ने पंजाब सरकार के इवेक्यू ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) के सदस्य के रूप में भी काम किया है. इसके अलावा वो साल 2011-13 तक राष्ट्रीय सद्भाव मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य रहे और 2009-13 के दौरान पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के महासचिव भी रहे. उन्हें 2016 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार पुरस्कार से नवाजा गया था.