
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस में हैं और यहां उनकी मुलाकात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होने वाली है. चीनी मीडिया में भी इस मुलाकात की खासा चर्चा है. कहा जा रहा है कि भारत-चीन में रूस की वजह से ये करीबी आ रही है. दोनों देशों में सीमा पर कुछ अहम समझौते हुए हैं और चीनी सोशल मीडिया और मीडिया की मानें तो इसके बाद हो रही इस मुलाकात ने कई उम्मीदें पैदा की हैं. इनमें भारत, चीन और रूस के बीच ट्राइलेटरल सहयोग का मुद्दा काफी अहम है.
चीनी इंटरनेट पर भारत-चीन के बीच संबंधों में खासतौर पर रूस की भूमिका को लेकर बहस चल रही है और कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दोनों देशों के संबंधों को सुगम बनाने में अहम भूमिका निभाई. चूंकि, शी जिनपिंग और पीएम मोदी के रिश्ते राष्ट्रपति पुतिन के साथ अच्छे हैं, इस मुद्दे को चीनी मीडिया काफी तरजीह दे रही है.
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रूस के विदेश मंत्री के बयान की चर्चा
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने पहले इस बात की उम्मीद जताई थी कि चीन, रूस और भारत के बीच ट्राइलेटरल बैठक हो सकती है. हालांकि, उनकी चिंता इस बात को लेकर थी कि भारत-चीन के बीच चल रहा सीमा विवाद इसमें रोड़ा बन रहा है.
भारत-चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर हुआ समझौता, इस ओर इशारा करता है कि भारत, चीन और रूस के बीच रूसी विजन के तहत ट्राइलेटरल सहयोग स्थापित किए जा सकते हैं. इसको लेकर भारत की रजामंदी ब्रिक्स की एकता, सहयोग और पवित्रता को बनाए रखने के लिए हो सकती है. चीन-भारत विवाद ने ब्रिक्स की प्रभावशीलता पर नकारात्मक प्रभाव डाला है.
चीन मीडिया में भारत-चीन संबंधों पर बहस
यह कहना मुश्किल है कि अगर चीन के साथ कोई समझौता हो भी जाता है तो वह कब तक टिकेगा. चीन और भारत के बीच संबंध अत्यधिक जटिल हैं. क्षेत्रीय विवाद, जल संसाधन का आवंटन, क्षेत्रीय प्रभाव के लिए कंपटीशन जैसी वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
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ब्रिक्स के भीतर भी चीन और भारत के बीच मुद्दे बने हुए हैं जैसे कि युआन को ब्रिक्स बेस्ड करेंसी बनाना और रुपये को भी इसमें शामिल करने का मुद्दा शामिल है. सितंबर में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान जारी करने में विफल रही क्योंकि भारत को ब्राजील, और दक्षिण अफ्रीका द्वारा सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता को लेकर भी असहमति देखी गई है.