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भारत-चीन को लेकर क्या भिड़ेंगे रूस और सऊदी अरब?

अकूत तेल भंडार की मदद से दुनियाभर में सऊदी अरब की दशकों से बादशाहत कायम है. लेकिन ऑयल मार्केट में रूस की एंट्री से सऊदी अरब को आर्थिक रूप से झटका लगा है. ऐसे में कहा जा रहा है कि सऊदी अरब की बादशाहत पर खतरा मंडराने लगा है.

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (फाइल फोटो- रॉयटर्स) सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (फाइल फोटो- रॉयटर्स)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2023,
  • अपडेटेड 12:41 PM IST

1930 के दशक में तेल भंडारों की खोज के बाद से ही ऑयल मार्केट में सऊदी अरब का दबदबा रहा है. लेकिन आज परिस्थितियां ऐसे बदली हैं कि सऊदी अरब को अब रूस से ऑयल मार्केट में कड़ी टक्कर मिल रही है.

दरअसल, पश्चिमी देशों की ओर से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध के कारण रूस रियायती कीमतों पर चीन और भारत को भारी मात्रा में तेल निर्यात कर रहा है.  

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समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग में छपी एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि रूस जिस तरह से एशियाई ऑयल मार्केट में अपना कब्जा जमा रहा है. वह सीधे-सीधे सऊदी अरब के लिए खतरे की घंटी है. ऑयल इंडस्ट्री के जाने-माने विश्लेषक पॉल सैंके के अनुसार, एशियाई बाजारों में रूसी तेल की एंट्री सऊदी तेल की कीमतों को कम कर रहा है.

सऊदी अरब पिछले कुछ दिनों से ऑयल मार्केट में शामिल छोटे-मोटे विक्रेताओं (शॉर्ट सेलर्स) पर निगरानी कर रहा है और कम कीमत में तेल नहीं बेचने की चेतावनी दे रहा है.

मंगलवार को भी सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री अब्दुलअजीज बिन सलमान ने शॉर्ट सेलर्स को इकोनॉमिक पेन (आर्थिक चोट) की चेतावनी दी है. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि अगर कोई देश कम कीमत पर तेल बेचता है तो उस पर क्या कार्रवाई की जाएगी. इस चेतावनी के बाद सऊदी तेल की कीमत में थोड़ी तेजी भी देखने को मिली.

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पॉल सैंके का भी मानना है कि सऊदी तेल की कीमत कम होने की एक वजह यह शॉर्ट सेलर्स भी हैं. लेकिन सऊदी अरब को इन शॉर्ट-सेलर्स की तुलना में रूस पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए. 

एशियन ऑयल मार्केट में रूस का फुटप्रिंट सऊदी अरब के लिए खतराः विशेषज्ञ

सैंके ने ब्लूमबर्ग से बात करते हुए कहा, "सच पूछें तो मुझे नहीं पता कि वे (सऊदी अरब) छोटे-मोटे सट्टेबाजों से इतना चिंतित क्यों हैं? मेरा कहने का मतलब यह है कि आप इन शॉर्ट सेलर्स पर निगरानी रख अपनी समस्या को थोड़े समय के लिए हल के तौर पर देख सकते हैं. लेकिन मूल समस्या तो पूरे तेल बाजार संतुलन में है."

उन्होंने आगे कहा कि असली मुद्दा तो यह है कि क्या सऊदी अरब एशियाई देशों को तेल बेचने से रूस को रोक सकता है? क्योंकि रूस जो कर रहा है, वह सऊदी अरब के लिए खतरा है. रूस अपना तेल एशियाई देशों को रियायती कीमतों पर निर्यात कर रहा है. जो पारंपरिक तौर पर एशिया के प्रमुख तेल निर्यातक देश सऊदी अरब के तेल की प्रीमियम कीमत को कम कर रहा है. 

सैंके ने आगे  कहा, "मार्केट शेयर और कंपीटिशन के मामले में यह डील उससे भी बड़ी है जितना लोग इसे एप्रिशिएट कर रहे हैं. जबकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच अच्छे संबंध हैं. अब यह स्पष्ट नहीं है कि क्या दोनों देशों के तेल मंत्रियों के बीच रिश्ते बेहतर हैं या नहीं."

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 रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (फाइल फोटो)

ऑयल मार्केट में रूस की एंट्री से सऊदी अरब को झटका 

दो तेल दिग्गजों के बीच तेल निर्यात को लेकर मची होड़ का मुख्य कारण सऊदी के ऑयल मार्केट में रूस की एंट्री है. रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से पहले रूस अपना तेल मुख्यतः यूरोपीय देशों को निर्यात करता था. वहीं, सऊदी अरब मुख्यतः.इन एशियाई देशों में सऊदी अरब मुख्यतः भारत और चीन को तेल निर्यात करता था.

लेकिन रूस यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर आर्थिक प्रतबंध लगा दिया गया. इससे रूस यूरोपीय देशों को तेल निर्यात नहीं कर पाता है. इसके बाद रूस ने अपनी अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनाए रखने के लिए एशियाई देशों को रियायती कीमतों पर तेल निर्यात करना शुरू कर दिया. 

एशियाई देशों के ऑयल मार्केट में रूस का कद किस तरह से बढ़ा है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले भारत के ऑयल मार्केट में रूस का योगदान एक प्रतिशत से भी कम था. लेकिन आज सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे देशों को पछाड़ते हुए भारत के लिए नंबर 1 तेल निर्यातक देश बन चुका है. इसके अलावा पिछले महीने ही रूस ने एक और एशियाई देश पाकिस्तान को भी रियायती कीमतों पर तेल निर्यात करने का फैसला किया है. 

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रॉयटर्स कैलकुलेशन रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल महीने में रूस ने जितना भी समुद्री रास्तों से तेल निर्यात किया है ,उसका 70 प्रतिशत से ज्यादा भारत ने और लगभग 20 प्रतिशत चीन ने आयात किया है. पिछले सात महीने से लगातार रूस, भारत के लिए सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है. 

इसके अलावा इस बात के बहुत कम संकेत हैं कि रूस एशिया पर अपनी निर्भरता फिलहाल कम करेगा. क्योंकि हाल ही में रूसी उपप्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने कहा है कि आने वाले दिनों में रूस चीन की ऊर्जा जरूरतों का 40 फीसदी आपूर्ति कर सकता है.
 

 

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