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ट्रेनिंग की कमी, ड्रोन अटैक में माहिर सेना... रूस की बजाय उत्तर कोरियाई सैनिक क्यों बन रहे यूक्रेन के आसान शिकार?

दुनिया की सबसे बड़ी स्टैंडिंग सेनाओं में से एक होने के बावजूद, उत्तर कोरियाई सैनिकों के पास युद्ध के मैदान की विशेषज्ञता की कमी है क्योंकि तानाशाही शासन ने कई साल से कोई युद्ध नहीं लड़ा है.

नॉर्थ कोरियाई सेना (तस्वीर: AFP) नॉर्थ कोरियाई सेना (तस्वीर: AFP)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 27 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 11:24 AM IST

यूक्रेन और दक्षिण कोरिया ने कुर्स्क क्षेत्र में रूस के लिए लड़ रहे उत्तर कोरियाई सैनिकों को मिली असफलताओं पर विरोधाभासी डेटा जारी किया है. जबकि साउथ कोरिया ने दावा किया है कि यूक्रेनी बलों द्वारा करीब एक हजार उत्तर कोरियाई सैनिक मारे गए हैं या गंभीर रूप से घायल हुए हैं. जेलेंस्की का दावा है कि उनकी सेना ने आज तक करीब 3 हजार उत्तर कोरियाई लोगों को मार डाला है या घायल कर दिया है.

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एक हफ्ते पहले, दक्षिण कोरिया की जासूसी एजेंसी ने दावा किया था कि दिसंबर के दौरान कुर्स्क में अग्रिम मोर्चे पर तैनात होने के बाद से करीब 100 उत्तर कोरियाई सैनिकों की मौत हो चुकी है. हताहतों की तादाद में भारी बढ़ोतरी हुई है, जो तीन हजार तक बताई जा रही है. कई एक्सपर्ट्स की चिंताएं सही साबित हो रही हैं.

दुनिया की सबसे बड़ी स्टैंडिंग सेनाओं में से एक होने के बावजूद, उत्तर कोरियाई सैनिकों के पास युद्ध के मैदान की विशेषज्ञता की कमी है क्योंकि तानाशाही शासन ने कई साल से कोई युद्ध नहीं लड़ा है.

उत्तर कोरिया में नहीं युद्ध का मैदान

युद्ध अभ्यास सैनिकों को रियल एक्शन के लिए नहीं तैयार कर सकता है. रूस तैनाती से पहले अपने प्योंगयांग सेना को सही ट्रेनिंग देने में कामयाब नहीं रहा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसके बाद भाषा की बाधा आती है, जो रूस और कोरिया के लोगों के बीच प्रभावी संचार को प्रभावित करती है.

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हालांकि, उत्तर कोरियाई लोग मोटिवेटेड हैं, लेकिन उन्हें आधुनिक युद्ध के बारे में कुछ भी नहीं पता. ज्यादातर मौतें यूक्रेनी ड्रोन की वजह से हुई हैं. The Guardian के मुताबिक, कुर्स्क के जंगलों में मिसाइलों और ट्रेनिंग हादसों में भी लोगों की जान गई है, जिनमें एक जनरल की मौत भी शामिल है.

इससे पहले, रिपोर्ट्स में से पता चला था कि उत्तर कोरियाई यूनिट्स ने यूक्रेनी गुरिल्ला लड़ाकों का सामना किया, जो एक पुरानी युद्ध रणनीति थी. जब वे भागकर छिप गए, तो उन्हें आसानी से पकड़ने के लिए ड्रोन तैनात किए गए, एशियाई सैनिकों को इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि ड्रोन्स से कैसे बचा जाए.

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रूस की सेना ने इन कमियों को समझ लिया है और सहयोग के बजाय पहले दौर के हमलों का नेतृत्व करने के लिए उनका इस्तेमाल कर रही है. रूस के जनरल्स ने अपना सबक सीख लिया है और अब वे अपने लोगों को अपने कम प्रशिक्षित "मित्रों" के साथ भेजकर उनकी जिंदगी को जोखिम में नहीं डालना चाहते.

US मीडिया रिपोर्ट्स में पहले दावा किया था कि ब्रीफ कॉम्बैट ट्रेनिंग के अलावा, उत्तर कोरियाई सैनिकों को फ्रंटलाइन कम्युनिकेशन के लिए बुनियादी रूसी शब्दावली भी सिखाई गई थी. उन्हें आगे भेजने से पहले "आक्रमण", "पीछे हटना", "चलना", "फैल जाना" और इसी तरह के शब्द सिखाए गए थे. कुछ अन्य रिपोर्ट्स में कहा गया था कि प्योंगयांग के Storm Corps ज्यादातर मशीनरी का संचालन कर रहे थे और भयंकर युद्ध वाले क्षेत्रों में खाइयां खोद रहे थे.

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रूस-नॉर्थ कोरिया डिफेंस टाइ-अप

अनुमान है कि किम जोंग-उन ने कुर्स्क में व्लादिमीर पुतिन के युद्ध प्रयासों में मदद करने के लिए अपने करीब 12,000 सैनिकों को भेजा था.

अमेरिकी एजेंसियों का मानना ​​है कि वे आर्टिलरी राउंड्स, एंटी टैंक रॉकेट, हॉवित्जर और रॉकेट लॉन्चर के 10 हजार से ज्यादा कंटेनर लेकर पहुंचे हैं. पेंटागन ने कहा कि किम अपने स्टॉर्म कॉर्प्स से और ज्यादा लोगों को रूस भेजने या तैनात करने में संकोच नहीं करेंगे. हालांकि, पहली टुकड़ी ने अभी तक युद्ध के मैदानों पर कोई बड़ा असर नहीं डाला है.

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