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एक गुमनाम देश से हारा सऊदी अरब, क्राउन प्रिंस सलमान को लगा बड़ा झटका!

सऊदी अरब पिछले चार सालों से कोशिश कर रहा है कि वो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन का सदस्य बन जाए. वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों को लेकर हो रही आलोचना के बीच उसके लिए मानवाधिकार परिषद में एक सीट जीतना बेहद अहम था. लेकिन हालिया वोटिंग में उसे हार का सामना करना पड़ा है.

 सऊदी अरब के किंग सलमान और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Photo- Reuters) सऊदी अरब के किंग सलमान और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Photo- Reuters)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 10 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 1:19 PM IST

बुधवार के दिन सऊदी अरब को बड़ा झटका लगा है. मध्य-पूर्व का इस्लामिक देश संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में सीट जीतने में असफल रहा. इससे वैश्विक स्तर पर सऊदी के मानवाधिकार प्रतिष्ठा को बढ़ावा देने की सऊदी क्राउन प्रिंस की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है. सऊदी अरब ने साल 2020 में भी 47 सदस्यीय मानवाधिकार संगठन का हिस्सा बनने के लिए आवेदन दिया था और तब भी उसे निराशा हाथ लगी थी.

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सऊदी अरब की पारंपरिक छवि एक रूढ़िवादी इस्लामिक देश की रही है जो सख्त धार्मिक प्रतिबंधों और मानवाधिकार हनन के लिए जाना जाता है. लेकिन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सत्ता में आने के बाद से इस छवि को बदलने की भरपूर कोशिश की है. वो अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'विजन 2030' के तहत देश की छवि को सुधारने के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं और देश को पर्यटन और मनोरंजन केंद्र में बदल रहे हैं.

ऐसे में सऊदी के लिए मानवधिकार परिषद में एक सीट जीतना बेहद अहम था. हालांकि, सऊदी अरब की सालों की कोशिश पर एक बार फिर पानी फिर गया है.

स्विटजरलैंड के जेनेवा स्थित मानवाधिकार परिषद के सदस्य देशों का चुनाव न्यूयॉर्क स्थित 193 सदस्यीय महासभा करती है. यह चुनाव भौगोलिक समूहों के आधार पर गुप्त मतदान के जरिए होता है ताकि संगठन में सभी समूहों का समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके.

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सऊदी अरब एशिया-पैसिफिक समूह से मानवाधिकार परिषद के चुनाव में शामिल एकमात्र देश था. संगठन की पांच सीटों के लिए छह उम्मीदवार थे. सऊदी अरब को जहां 117 वोट मिला वहीं, छोटे से द्वीप देश मार्शल आईलैंड को 124 वोट मिले और सऊदी अरब को पछाड़कर वो पांचवें स्थान पर रहा.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की शक्तियां

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के पास कानूनी रूप से बाध्यकारी शक्तियां नहीं हैं. लेकिन इसकी बैठकों से किसी देश पर निगरानी बढ़ जाती है और यह मानवाधिकार हनन के डॉक्यूमेंटेशन के लिए जांच के आदेश दे सकती है. कई बार इसके आदेशों से कुछ देशों के खिलाफ युद्ध अपराध के मामले भी चले हैं.

कांगो, इथियोपिया, केन्या, चेक गणराज्य, उत्तरी मैसेडोनिया, बोलीविया, कोलंबिया, मैक्सिको, आइसलैंड, स्पेन और स्विटजरलैंड इस बार मानवाधिकार परिषद के लिए चुने गए हैं. जबकि बेनिन, गाम्बिया और कतर को दूसरे तीन साल के कार्यकाल के लिए फिर से चुना गया. कोई भी सदस्य देश लगातार दो बार से अधिक मानवाधिकार परिषद का सदस्य नहीं रह सकता. नए निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल 1 जनवरी 2025 से शुरू होगा.

फांसी के बढ़ते मामलों को लेकर निशाने पर सऊदी अरब

बुधवार को यह मतदान ऐसे समय में हुआ है, जब फांसी-विरोधी समूह Reprieve ने कहा कि सऊदी अरब ने इस साल कम से कम 212 लोगों को फांसी दी है, जो सऊदी के पिछले फांसी के रिकॉर्ड से भी ज्यादा है. साल 2022 में सऊदी अरब को 196 लोगों को और 2023 में 172 लोगों को फांसी दी गई थी.

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सऊदी में फांसी के बढ़ते मामलों की आलोचना के जवाब में मोहम्मद बिन सलमान ने कुछ समय पहले कहा था कि उनका देश मौत की सजा के अपने नजरिए में सुधार के लिए काम कर रहा है.

हालांकि, मानवाधिकार हनन के लिए खुद क्राउन प्रिंस निशाने पर रहे हैं. उनपर आरोप लगते हैं कि उन्होंने अपने विरोधियों को सख्ती से दबाया. 2018 में सऊदी पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या के कथित आदेश के लिए भी उनकी निंदा की जाती है.

हालांकि, सऊदी सरकार ने खाशोज्जी की हत्या में क्राउन प्रिंस की किसी भी संलिप्तता से इनकार किया है.

राजनयिकों और मानवाधिकार समूहों का कहना है कि भले ही सऊदी अरब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन में मतदाव करने वाला सदस्य नहीं है, बावजूद इसके, वो हाल के वर्षों में मानवाधिकार परिषद में पर्दे के पीछे से काफी सक्रिय रहा है.

उनका कहना है कि 2021 में सऊदी अरब की पैरवी से ही परिषद में चल रही यमन युद्ध अपराधों की जांच बंद की गई. परिषद के अंदर सऊदी का प्रभाव इतना है कि सूडान में युद्ध अपराध में शामिल अपराधियों की निगरानी बढ़ाने में भी इसने पश्चिम के प्रस्ताव को रोकने की कोशिश की थी.

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