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मध्य-पूर्व में सऊदी की बादशाहत पर क्यों मंडराने लगा है खतरा?

अकूत तेल भंडार और इस्लामिक दुनिया के पवित्र धर्मस्थलों के संरक्षक सऊदी अरब की बादशाहत पर अब खतरा मंडराने लगा है. एक तरफ, वह आर्थिक रूप से कमजोर होता जा रहा है तो दूसरी तरफ रणनीतिक तौर पर भी उसकी ताकत घटी है. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अब सऊदी युग का अंत होने वाला है.

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 22 सितंबर 2020,
  • अपडेटेड 7:30 PM IST
  • सऊदी की बादशाहत पर खतरा
  • अमेरिका के लिए सऊदी की कम प्रासंगिकता
  • क्राउन प्रिंस की गलतियों ने किया सऊदी को कमजोर
  • इजरायल का सहारा लेने को मजबूर

सऊदी अरब मध्य-पूर्व में सबसे ताकतवर और प्रभावशाली देश माना जाता रहा है. 1930 के दशक में तेल भंडारों की खोज ने सऊदी अरब को ना केवल एक समृद्ध देश बनाया बल्कि सभी पश्चिमी देशों के लिए उसकी अहमियत बढ़ा दी. हालांकि, अब वैश्विक ऊर्जा बाजार में तेल की अहमियत दिन पर दिन खत्म होती जा रही है और अमेरिका भी अब तेल के लिए सऊदी पर निर्भर नहीं रहा. अमेरिका खुद तेल उत्पादन के मामले में शीर्ष स्थान पर काबिज हो गया है. ऐसे में, सऊदी को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय खतरों के खिलाफ अमेरिका से पहले की तरह संरक्षण नहीं मिल रहा है. अपनी कई रणनीतिक गलतियों की वजह से सऊदी ने खुद अपने लिए तमाम चुनौतियां पैदा कर ली हैं.

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1978 में अफगानिस्तान में सोवियत के हमले और 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति ने मुस्लिम दुनिया में सऊदी को अमेरिका का अहम रणनीतिक सहयोगी बना दिया था. सऊदी ने अफगानिस्तान में सोवियत के खिलाफ अमेरिका को भरपूर सहयोग किया. 1980 के दशक में ईरान और इराक ने 8 साल लंबी जंग लड़ी और इससे भी सऊदी को उभरने का मौका मिला.

तेल उत्पादक देशों के संगठन 'ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज' (OPEC) और इस्लामिक सहयोग संगठन में 50 सालों से ज्यादा लंबे समय से सऊदी का दबदबा कायम रहा है. लेकिन अब इन दोनों संगठनों की प्रासंगिकता भी खत्म होती नजर आ रही है.

तेल की गिरती कीमतें और सऊदी का आर्थिक संकट

इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों के संरक्षक और दुनिया में दूसरे सबसे ज्यादा तेल भंडार के स्वामित्व के बावजूद सऊदी अरब अपनी कई गलत नीतियों की वजह से मध्य-पूर्व में अपना प्रभुत्व खोता दिख रहा है. खासकर, पिछले पांच साल सऊदी के पतन की कहानी बयां कर रहे हैं. सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी एमबीएस ने जब बागडोर संभाली तो उन्होंने सऊदी के कायापलट करने की योजना बनाई. तेल से मिलने वाले राजस्व और प्रवासी मजदूरों के ऊपर से अपनी निर्भरता को खत्म करने के लिए क्राउन प्रिंस ने 'विजन 2030' पेश किया. इसके तहत, 500 अरब डॉलर की लागत से रेगिस्तान में एक स्मार्ट सिटी तैयार की जानी थी. हालांकि, कोरोना वायरस की महामारी और तेल की गिरती खपत और कीमतों ने सऊदी क्राउन प्रिंस की तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं पर विराम लगा दिया है. सऊदी की अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे बुरे दौर में है.

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कभी टैक्स फ्री देश होने के लिए मशहूर सऊदी अरब ने कोरोना संकट में वैट पांच फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी तक कर दिया है और हर महीने कर्मचारियों को दिया जाने वाला भत्ता भी खत्म कर दिया है. कच्चे तेल की कीमत में गिरावट की वजह से सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको की पहली तिमाही के मुनाफे में 25 फीसदी की कमी आई है. सऊदी अरब के राजस्व में भी भारी कमी हुई है.

सऊदी के युग की समाप्ति इस बात से भी जाहिर होती है कि उसका जूनियर पार्टनर रहा यूएई अब खुद रीजनल पावर बन गया है और लीबिया और ट्यूनीशिया जैसे देशों में दखल दे रहा है. यहां तक कि यूएई कई मामलों में अगुवाई करता नजर आ रहा है और सऊदी उसका अनुसरण कर रहा है. जब पिछले महीने यूएई ने खाड़ी देशों की सुरक्षा के लिए इजरायल से समझौता करने का कदम उठाया तो सऊदी क्राउन प्रिंस ने इसका समर्थन किया. सऊदी अरब ईरान की चुनौती से निपटने के लिए इजरायल का सहारा लेने के लिए मजबूर हो गया है.

अमेरिका की मजबूत ढाल नहीं

सऊदी अरब अमीर होने के बावजूद अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर बुरी तरह निर्भर है. यहां तक कि सऊदी रॉयल पैलेस की सुरक्षा में भी विदेशी सैनिक तैनात हैं. पिछले साल सितंबर महीने में ईरान ने सऊदी अरब की तेल रिफाइनरी पर हमला किया था तो इसके बाद जनवरी में अमेरिकी हमले में ईरान के कुद्स फोर्स के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी मारे गए थे. हालांकि, अमेरिका का ये सुरक्षा कवच कमजोर पड़ता दिख रहा है. जुलाई महीने में अमेरिकी संसद में सऊदी को अरबों डॉलर के आधुनिक हथियार बेचने का भी काफी विरोध हुआ, हालांकि, क्राउन प्रिंस के दोस्त डोनाल्ड ट्रंप ने वीटो कर सऊदी को हथियार बेचे.

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साल 2010 में ओबामा प्रशासन के समय से ही अमेरिका सऊदी से किनारा करने लगा था. अमेरिका दुनिया का अग्रणी तेल उत्पादक देश बन गया था और इसलिए खाड़ी देशों या सऊदी की सुरक्षा में उसकी दिलचस्पी भी कम होने लगी थी. अमेरिका अपने अमीर दोस्तों के लिए सैन्य दखल देने में भी कम उत्सुक दिखाई देने लगा. इसी दौर में, इराक के मुकाबले ईरान का प्रभाव बढ़ने लगा. साल 2015 में अमेरिका और ईरान ने ऐतिहासिक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए जिससे ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हट गए. सऊदी के लिए ये किसी बड़े झटके से कम नहीं था.

2011 से अरब देशों में क्रांति शुरू हो गईं जिससे सऊदी किंगडम भी अलर्ट हो गया. हालांकि, ओबामा प्रशासन के लोकतांत्रिक सुधारों को समर्थन देने की वजह से सऊदी के लिए और मुश्किल स्थिति बन गई. सऊदी पर लोकतांत्रिक सुधारों के लिए दबाव लगातार बढ़ता गया.

पश्चिमी देशों को शांत कराने के लिए और यूएई की नकल करने की कोशिश में सऊदी के क्राउन प्रिंस ने कई सुधारवादी कार्यक्रमों पर जोर देना शुरू किया. इसके तहत कुछ दिनों तक पॉप कॉन्सर्ट और एंटरटेनमेंट प्रोजेक्ट चलाए गए लेकिन ये सब बस दिखावे तक ही सीमित रहा. सामाजिक उदारता और महिला सशक्तीकरण को लेकर शुरुआती उत्साह अब निराशा में बदल चुका है. सऊदी में आर्थिक सुधार और अरबों डॉलर की मेगा परियोजनाएं थम गई हैं और बेरोजगारी दर 29 फीसदी तक पहुंच गई है. 

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यमन, कतर और लेबनान

सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने बागडोर संभालने के तुरंत बाद यमन में हूती विद्रोहियों को सबक सिखाने के लिए युद्ध छेड़ दिया था. हूती विद्रोही ईरान के सहयोगी माने जाते हैं. क्राउन प्रिंस ने हफ्तों के भीतर जीत का वादा किया था लेकिन ये संघर्ष एक अंतहीन जंग में बदल चुकी है. जून 2017 में क्राउन प्रिंस एमबीएस ने यूएई के साथ मिलकर कतर में आतंकवाद के खात्मे के बहाने से सत्ता परिवर्तन की नाकम कोशिश की जिससे कतर के साथ भी अनबन हो गई.

ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में कतर में तख्तापलट में साथ देने का वादा किया था लेकिन बाद में कदम पीछे खींच लिए. कतर के साथ इस तकरार ने छह देशों की खाड़ी-अरब कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) की एकता में दरार पैदा कर दी.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवंबर 2017 में एमबीएस ने लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी को ईरान समर्थित सहयोगी हेजबुल्लाह की आलोचना के लिए मजबूर किया और उनसे सऊदी के टीवी चैनल पर इस्तीफे का ऐलान करवाया. सऊदी के इस कदम की भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तीखी आलोचना हुई. ये सिलसिला यहीं नहीं रुका.

अक्टूबर 2018 में तुर्की स्थित सऊदी दूतावास में वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या कर दी गई. पत्रकार की हत्या में सऊदी क्राउन प्रिंस की भूमिका को लेकर दुनिया भर में सवाल उठे और अंतराष्ट्रीय समुदाय में उनकी साख को बहुत नुकसान पहुंचा.

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एमबीएस के तमाम कदमों ने भले ही सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत कर दी हो लेकिन इससे सऊदी किंगडम कमजोर पड़ा है. यमन में पांच साल से चल रहे युद्ध जीतने के लिए सऊदी ने अरबों के हथियार खरीदे लेकिन ये जंग अभी तक खत्म नहीं हो पाई है. बल्कि अब सऊदी अरब पर यमन के हूतियों के मिसाइल हमले का खतरा मंडराता रहता है. गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) कभी सऊदी की एक बड़ी उपलब्धि हुआ करती थी लेकिन एमबीएस की नीतियों की वजह से अब ये संगठन अपनी अहमियत खो चुका है.

इस्लामिक दुनिया में घटता विश्वास

ईरान और टर्की की तरफ से बढ़ती चुनौती की वजह से भी एमबीएस चितिंत हैं. टर्की के राष्ट्रपति रेचेप एर्दोवान खुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में जुटे हुए हैं. पिछले साल ही, टर्की और मलेशिया ने एक शिखर सम्मेलन बुलाया था जिसमें पाकिस्तान भी शामिल होने वाला था. हालांकि, सऊदी ने इसे अपने प्रभुत्व वाले इस्लामिक सहयोग संगठन के लिए चुनौती के तौर पर लिया और इमरान खान को रोक दिया. हाल ही में, पाकिस्तान ने सऊदी अरब को कश्मीर मुद्दे को लेकर सीधी चुनौती दे डाली थी कि अगर वो कश्मीर पर खुलकर अगुवाई नहीं करता है तो वह अपने साथ खड़े देशों के साथ अलग से बैठक बुला लेगा. पाकिस्तान समेत तमाम मुस्लिमों को ऐसा लगता है कि सऊदी अपने आर्थिक हितों के लिए मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व सही तरीके से नहीं कर रहा है.

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आर्थिक संकट और क्षेत्रीय समस्याओं में घिरे सऊदी अरब की चुनौतियां तब और बढ़ जाएंगी, अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नवंबर महीने में चुनाव हार जाते हैं. यमन में युद्ध खत्म करने, कतर के साथ संबंध सुधारने और खाड़ी और अरब एकता को कायम करने के बजाय सऊदी क्राउन प्रिंस अब ईरान को रोकने के लिए इजरायल के साथ गठबंधन मजबूत करने में लग गए हैं. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस एमबीएस ने ही यूएई और बहरीन को इजरायल के साथ रिश्ते बहाल करने के लिए प्रेरित किया है जबकि उनके पिता यानी किंग सलमान इसके खिलाफ थे. किंग सलमान की जिद थी कि फिलीस्तीन की मांग पूरी होने के बाद ही सऊदी इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करे.

हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका और ट्रंप सऊदी अरब को पतन की तरफ बढ़ने से नहीं रोक पाए तो इजरायल भी ऐसा करने में शायद ही कामयाब हो.

 

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