
खाने को लेकर हर देश, बल्कि राज्यों में भी अलग-अलग रीति-रिवाज हैं. एक बात जहां अच्छी मानी जाती है, दूसरे देश में वही करने पर आप असभ्य कहलाते हैं. जैसे अमेरिका में नूडल खाते हुए आवाज निकालना गलत है, जबकि जापान में अगर आप चुपचाप नूडल गटक लें तो मेजबान बुरा मान जाएगा कि आपको खाना पसंद नहीं आया. ये तो हुई छोटी-मोटी बातें, लेकिन स्कैंडिनेवियाई मुल्क इस मामले में सबसे अलग हैं. वहां सिर्फ फैमिली ही साथ बैठकर खाती है. अगर आप ऐसे किसी समय चले गए तो भूखे ही लौटना होगा.
यहां से शुरू हुई चर्चा
उत्तरी यूरोप के तीन देश- नॉर्वे, डेनमार्क और स्वीडन मिलकर स्कैंडिनेवियाई मुल्क कहलाते हैं. इस साल के बीच सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हुई, जिसमें स्वीडिश कल्चर का मजाक उड़ाते हुए किसी ने लिखा कि डिनर टाइम में किसी दोस्त के घर जाने पर दोस्त ने उसे दूसरे कमरे में इंतजार करने को कह दिया और खुद खाना खाने चला गया.
अक्सर उठती रही बात
पोस्ट पर कमेंट करने वाले भी ऐसे ही तजुर्बे बांटने लगे कि स्वीडिन के लोग गेस्ट को खाना नहीं खिलाते. यहां तक कि ट्विटर पर #Swedengate ट्रेंड हो गया, जिसमें लोग कूद-कूदकर कहने लगे कि वहां के लोगों को मेजबानी करना नहीं आता. फिलहाल इस माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म पर पोस्ट और कमेंट्स का लिंक उपलब्ध नहीं है, लेकिन सर्च कीजिए और आतिथ्य न करने वालों में इन देशों का नाम ऊपर आने लगता है.
तो क्या वाकई स्वीडन में ऐसा होता है?
जवाब है- हां. लेकिन इसके पीछे वजह ये नहीं कि यहां के लोगों को आतिथ्य नहीं आता. कारण कुछ और हैं. स्कैंडिनेवियन परिवार आमतौर पर छोटे होते हैं. जैसे 4 लोगों का एक परिवार. वे मानते हैं कि खाने की टेबल ऐसी जगह है, जहां फैमिली को साथ होना ही चाहिए. ऐसे में ज्यादातर लोग कोशिश करते हैं कि उनका ऑफिस चाहे जितनी दूर हो, खाने के वक्त वे घर पहुंच जाएं और साथ खाना खाएं.
पसंद नहीं बाहरी लोगों की हिस्सेदारी
ऐसे में अगर कोई बाहरी आदमी खाने का हिस्सा बने तो ये उस मील को कंप्लीट नहीं मानते. यहां तक कि छोटे बच्चे भी अगर खाने के समय खेलने पहुंच जाएं तो यहां के लोग उसे वापस लौटा देते हैं ताकि जिस घर के वे बच्चे हैं, उनका फैमिली डिनर खराब न हो.
खाने को बर्बाद होने से बचाने के तरीके खोजते
हमारे देश में जहां शादी-पार्टी में लोग कनस्तर भर-भरकर खाना फेंकते हैं, वहीं स्कैंडिनेविया में इसका उलट देखेंगे. लोग यहां उतना ही खाना मंगाते या पकाते हैं, जितने में उनका पेट भर जाए. यानी अगर 4 लोग खाने वाले हैं तो उतना ही खाना बनेगा. ऐसे में 5वां आदमी पहुंच जाए तो जाहिर है कि सबके खाने से कटौती होगी और किसी का भी पेट नहीं भर सकेगा. तो इसलिए भी यहां खाने के समय पहुंचना गलत माना जाता है.
पैकेजिंग-फ्री हैं फूड स्टोर
आप ये कल्चर न जानते हों और गलती से डिनर-लंच टाइम पर पहुंच भी जाएं तो आपको अलग कमरे में इंतजार करने को कह दिया जाएगा. लोगों की खाना बर्बाद न करने की आदत का इसी से अंदाज लगा सकते हैं कि यहां के ज्यादातर फूड स्टोर पैकेजिंग-फ्री हो चुके, यानी कोई फूड आइटम खरीदने पर पहले आप अपनी डायट के बारे बताएंगे, तब वो कस्टमाइज होकर आपको मिलेगा.
समय की कमी के चलते पकता है थोड़ा भोजन
एक वजह और भी है, जिसके कारण इन देशों में खाने के समय मेहमानों का आना अच्छा नहीं समझा जाता. दरअसल यहां दोनों ही पेरेंट्स कामकाजी होते हैं और डिनर टाइम होता है शाम के 4 से 5 बजे. ऐसे में ऑफिस से लौटकर लंबा-चौड़ा मेन्यू तैयार करना मुमकिन नहीं. तो ऑफिस से लौटने के बाद बहुत लिमिटेड खाना पकता है और परिवार के माहौल में खाया जाता है.
बता दें कि उत्तरी यूरोप के ये तीन देश इतने व्यस्त रहते हैं कि इसके लिए एक शब्द ही बन गया- Tidsklemma, यानी बहुत सिमटा हुआ समय, जिसमें किसी भी और चीज या काम की गुंजाइश न हो.
कितना समय लगाते हैं रसोई में?
साल 2018 में स्वीडन में औसत साइज वाले लगभग 48 प्रतिशत परिवारों ने एक दिन के खाने की तैयारी पर लगभग आधे घंटे खर्च किए. इसमें शॉपिंग का समय भी शामिल है. वहीं 3 प्रतिशत से भी कम लोगों ने लगभग ढाई घंटे लगाए. अब भारत से इसकी तुलना करें तो फर्क साफ दिखेगा.
भारत में कितने घंटे किचन के नाम?
जर्मनी की मार्केट एनालिस्ट कंपनी जीएफके के मुताबिक भारत के लोग, खासकर महिलाएं 13 से ज्यादा घंटे किचन में बिताती हैं. इसमें वो समय शामिल नहीं है, जो सब्जी-राशन खरीदने में लगा. स्टडी 22 देशों के 27 हजार लोगों पर हुई. खाना बनाने का ग्लोबल साप्ताहिक एवरेज साढ़े 6 घंटे रहा.
क्या दिखेगा डिनर टेबल पर
स्कैंडिनेविया में पहले से पकी हुई चीजें शौक से खाई जाती हैं. जैसे फालसे का जैम या मुरब्बा लगाकर ये पैनकेक खाएंगे, और ऊपर से फल खा लेंगे. यही नाश्ता है. क्रिस्पब्रेड भी यहां खूब चलने वाला स्नैक है. लगभग 5 सौ सालों से यहां क्रिस्पब्रेड बेक हो रही है, जो अक्सर मेन मील के साथ परोसी जाती है, लेकिन अगर बड़ा खाना पकाने का समय न हो तो इसे भी खा सकते हैं.
स्वीडन में हर गुरुवार यही खाना
ज्यादातर स्वीडिश घरों गुरुवार को पहुंच जाएं तो एक तरह का ही खाना दिखेगा- मटर का सूप और पैनकेक. ये गुरुवारी खाना दूसरे विश्व युद्ध की देन है, जब राशन की कमी के कारण स्वीडिश आर्म्ड फोर्स यही खाने लगी. तब से ही चलन चल पड़ा, जो आम घरों तक पहुंच गया. हालांकि कुछ लोग इसे धर्म से प्रेरित भी मानते हैं.