
ताइवान (Taiwan) को पहले फॉरमोसा का द्वीप (Island of Formosa) कहा जाता था. 1949 से चीन इस द्वीप पर कब्जा करना चाहता है. ताइवान के खिलाफ मिलिट्री एक्शन लेने की तैयारी चीन कई दशकों से कर रहा है. ताइवान को संयुक्त राष्ट्र में भी जगह नहीं मिली है. उधर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. चीन की मिलिट्री की ताकत बढ़ाई जाती है. आधुनिक बनाया जाता है. सिर्फ इतने काम से ही दुनिया भर देश सतर्क हो जाते हैं. शी जिनपिंग ने एक बार कहा था कि ताइवान की आजादी पृथककरण का नतीजा है. यह चीन की राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए खतरा है.
उनके इस बयान से पूरी दुनिया में संदेश गया था कि चीन अब ताइवान के खिलाफ बड़ा कदम उठा सकता है. इस समय ताइवान के चारों तरफ युद्धाभ्यास, फाइटर जेट्स और जंगी जहाजों को ताइवानी की खाड़ी और उस द्वीप के चारों तरफ भेजना. ये जताता है कि चीन ताइवान पर कब्जा जमाना चाहता है. लेकिन क्या ये इतना आसान होगा कि चीन आराम से ताइवान पर फतह हासिल कर सके.
अगर हम आकार और ताकत की बात करें तो... चीन निसंदेह ताइवान से ताकतवर है. लेकिन ताइवान में घुसपैठ करना या कब्जा जमाना हलवा खाने के बराबर नहीं होगा. हम आपको बताएंगे कि चीन के लिए यह कितना मुश्किल होने वाला है. ताइवान छोटा भले ही हो लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति किसी भी युद्ध में उसे फायदा देगी.
संकरी है ताइवान की खाड़ी, इतनी कम जगह में ज्यादा परिवहन संभव नहीं
चीन जब भी घुसपैठ करने का प्रयास करेगा तो उसे सबसे पहले ताइवान की खाड़ी को पार करना होगा. यह करीब 128 किलोमीटर चौड़ी है. यानी चीन की जमीन से ताइवान की सतह तक. जंग के समय में जंगी जहाजों और पनडुब्बियों को संकरी जगह से दूर रखा जाता है. क्योंकि ऐसी जगहों पर ज्यादा एयरक्राफ्ट करियर, कॉर्वेट्स, फ्रिगेट्स लगाने के लिए जगह चाहिए होती है. इनके अंदर भारी मात्रा में सैनिक, हथियार, बख्तरबंद वाहन, आर्टिलरी, खाना, दवाई और ईंधन की सप्लाई भी करनी होगी. ताकि समुद्र के रास्ते चीन ताइवान पर हमला कर सके.
खुली खाड़ी में चीन के जंगी जहाजों पर हवाई हमला करना आसान हो जाएगा
तटों पर और खाड़ी के बीच में भारी मात्रा में पोत जमा हो जाएंगे. सैकड़ों की संख्या में. इतनी बड़ी मात्रा में जंगी जहाज जब चलेंगे तो उनकी गति धीमी हो जाएगी. यानी ताइवानी आर्टिलरी और रॉकेट सिस्टम्स इन्हें आसानी से निशाना बना सकते हैं. चीन अपनी तरफ से मिसाइल भी नहीं छोड़ सकता. कम से कम शॉर्ट रेंज की तो कतई नहीं. क्योंकि इनके दायरे में उसके खुद के जंगी जहाज आ जाएंगे. बड़ी रेंज के मिसाइल से कोई फायदा नहीं होगा. खाड़ी में मौजूद इतनी भारी मात्रा वाली फ्लीट पर हवाई और पनडुब्बियों से हमला करना आसान है.
हमलावर फ्लीट को खाली कराते समय भी ताइवान के हमले से बचाना मुश्किल
चीन की पूरी नौसेना और वायु सेना भी अपनी फ्लीट को बचा नहीं पाएगी. क्योंकि ये घंटों तक खुले पानी में रहेंगे. दूसरी बड़ी दिक्कत ये है कि अगर किसी तरह से ये फ्लीट पहुंच भी जाए तो तट पर उसे खाली होने में काफी ज्यादा समय लगेगा. इतना समय ताइवानी चुप तो बैठेंगे नहीं. जमीनी हमला होगा. ताइवान के गोरिल्ला फाइटर या कमांडो टीम या फिर स्नाइपर्स चीनी सैनिकों को चुन-चुन कर मारेंगे.
चीन के पास एक ही विकल्प, चरणबद्ध हमला और ताइवानी एयर डिफेंस खत्म करना
चीन के पास जल्दी से घुसपैठ का एक ही तरीका है कि वो चरणबद्ध तरीके से हमला करे और आगे बढ़े. वो अगर ताइवान के किसी एक बंदरगाह या उसके आसपास किसी द्वीप पर कब्जा करके हमला करे तो चीन का काम आसान हो सकता है. इस बीच वह चीन के सैन्य परिवहन विमानों से ताइवान के एयरफील्ड, जमीन या जरूरी जगहों पर अपनी कमांडो फोर्स और बख्तरबंद वाहनों को उतार सकता है. इससे पहले ताइवान की एयरफोर्स और हवाई सुरक्षा प्रणालियों को खत्म करना होगा. ताकि घुसपैठ का पहला चरण पार किया जा सके.
क्या ताइवान के पास बचाव का तरीका है? है... उसके शहर और द्वीप ही उसे बचाएंगे
ताइवान एक अंडाकार द्वीप है. उत्तर से दक्षिण तक 395 किलोमीटर की लंबाई में घने जंगलों वाले पहाड़ हैं. घाटियां हैं. खतरनाक इलाके हैं. पहाड़ों के पश्चिम की तरफ उपजाऊ भूमि हैं. बड़े शहर हैं. राजधानी ताइपे उत्तर में है. ताइचंग मध्य और काओसिअंग दक्षिण की तरफ फैले हुए बड़े शहर हैं. इन शहरों के बीच में प्राकृतिक रक्षा दीवार बनी है. यानी ये घने जंगल और पहाड़. ये भौगोलिक स्थिति चीन के सैनिकों की गति को कमजोर करेंगे. उन्हें घने प्राकृतिक और शहरों में घने कॉन्क्रीट के जंगलों में लड़ना होगा. जिनके बारे में चीनी सैनिकों को पता नहीं होगा. इसका फायदा ताइवानी सैनिक भरपूर उठाएंगे.
तटों के पास ऊंची इमारतें यानी दूर से ही दुश्मन पर रखी जा सकती है नजर
पूरे द्वीप का पूर्वी हिस्सा नदियों और नहरों के जाल से बिछा पड़ा है. ताइवान के पास कुछ ऐसे तट भी हैं जहां एंफिबियस पोत की लैंडिंग कराई जा सकती है. लेकिन यहां से जमीन पर उतरने के लिए चीनी सैनिकों को ताइवानी सेना से भयानक संघर्ष करना होगा. क्योंकि ताइवानी सेना जी जान से लड़ेगी. ये तट काफी ऊंची-ऊंची इमारतों से पटी पड़ी हैं. यानी तट की तरफ सीधा निशाना लगाने के लिए कई जगहों पर स्नाइपर बैठ सकते हैं.
ताइवान के चारों तरफ छोटे द्वीप है सबसे बेहतर और अनजान सुरक्षा कवच
ताइवान के चारों तरफ कई छोटे-छोटे द्वीप भी मौजूद हैं. इनमें से कई तो ताइवान की खाड़ी में हैं. जैसे- मात्सू (Matsu Islands) और किनमेन (Kinmen Island). ये हैं ताइवानी लेकिन चीन के तट के करीब हैं. इसके अलावा पेंघू (Penghu) महत्वपूर्ण द्वीप है. फिर 90 द्वीपों का एक समूह ताइवान के पास है, जो चीनी घुसपैठी सैनिकों के लिए अत्यधिक खतरनाक होंगे. यहां से अप्रत्याशित हमले हो सकते हैं. जिनमें चीन की सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. ये द्वीप जंगली हैं. झाड़ियों से ढंके हैं. इनके पीछे छीपे हैं एंटी-शिप, एंटी-एयरक्राफ्ट, अर्ली वॉर्निंग राडार सिस्टम और अत्यधिक प्रशिक्षित ताइवानी सैनिक. जो चीनी जहाजों, विमानों और सैनिकों की धज्जियां उड़ा देंगे.
ताइवान के सैनिकों को सिर्फ चीनी घुसपैठ रोकने की ही ट्रेनिंग मिली है
जैसे ही इन छोटे-छोटे द्वीपों से ताइवान के मुख्य जमीनी हिस्से को घुसपैठ की सूचना मिलेगी. ताइवान के साथी देश अलर्ट हो जाएंगे. ताइवान की मिलिट्री भले ही चीन की सेना से बहुत छोटी हो. लेकिन उसे सिर्फ चीन के सैनिकों से लड़ने के लिए ही प्रशिक्षित किया गया है. वो चीनी घुसपैठ को रोकने की ट्रेनिंग करके बैठे हैं. ताइवान को सबसे ज्यादा हथियार अमेरिका से मिलते हैं. अमेरिका ताइवान को ज्यादातर रक्षात्मक हथियार ही बेचता है. ताइवान हमला करने के लिए स्वदेशी हथियार खुद बनाती है. जैसे- प्रेसिशन स्ट्राइक वेपन्स, एयरक्राफ्ट शेल्टर और पानी के सुरंग.
सबसे तगड़ी लड़ाई होगी बंदरगाहों और एयरफील्ड पर और उसके आसपास
सबसे तगड़ी लड़ाई होगी बंदरगाहों और एयरफील्ड्स को लेकर. क्योंकि ताइवानी सैनिकों और सरकार को पता है कि चीन किस बंदरगाह और एयरफील्ड पर हमला करेंगे. इन प्रमुख जगहों को बचाने के लिए ताइवान पहले ही तैयारी कर चुका होगा. इन जगहों पर कब्जा करने के लिए चीन को पहले ताइवान पर साइबर अटैक करना होगा. ताकि उनकी रक्षा प्रणाली नष्ट हो जाए. फिर वो फिजिकली हमला कर इन जगहों पर कब्जा कर सकता है. लेकिन ये इतना आसान नहीं होगा.
साइबर अटैक रोकने के लिए ताइवान के पास 2500 लोग और नई एजेंसी
ताइवान की साइबर वारफेयर यूनिट चीन की तुलना में बेहद छोटी है. ताइवान के पास सिर्फ 2500 साइबर वारफेयर एक्सपर्ट हैं. जबकि चीन के पास 1 लाख से ज्यादा हैकर्स हैं. ताइवानी साइबर एक्सपर्ट्स ज्यादा देर तक चीन के हैकरों के हमले को रोक नहीं पाएंगे. चीनी हैकर ताइवान के इलेक्ट्रिक ग्रिड, इंटरनेट सर्विस, संचार प्रणाली, टेलिफोन सर्विस वगैरह बंद करके ताइवानी लोगों को लाचार कर देंगे. इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग बंद हो जाएगी. एयरफोर्ट और एयरफील्ड्स लकवाग्रस्त हो जाएंगे. ताइवान के कई हथियार काम ही नहीं करेंगे. लेकिन चीन इसी मौके का फायदा उठाकर हमला कर सकता है. लेकिन ताइवान ने हाल ही में एक साइबर सिक्योरिटी एजेंसी बनाई है ताकि चीनी साइबर हमले रोके जे सके.
ताइवान लगातार करता है मिलिट्री ड्रिल, ताकि सैनिकों का प्रशिक्षण होता रहे
ताइवान लगातार हर साल मिलिट्री ड्रिल लेकर काफी मेहनत करता है. पिछले साल इसकी एयरफोर्स के फाइटर प्लेन्स को सड़कों पर लैंडिंग की ट्रेनिंग कराई गई थी. अगर एयफील्ड्स खत्म हो जाते हैं और रनवे नहीं बचते तो सड़क पर प्लेन उतारने और वहां से टेकऑफ करने की सुविधा रहेगी. सिर्फ यही नहीं ताइवान की एयरफोर्स छोटी है लेकिन बेहद खतरनाक, तेज और आधुनिक है. इसके पास कुल मिलाकर 411 फाइटर एयरक्राफ्ट्स हैं. इनमें से आधे F-16 और फ्रांस का मिराज 2000 फाइटर जेट्स हैं.
ताइवान की पॉर्क्यूपीन स्ट्रैटेजी, यानी छुआ तो चुभेंगे जहरीले कांटे
ताइवानी वायुसेना के जवान दुनिया के बेस्ट लड़ाकुओं में से एक हैं. ये तीन घंटे में रनवे रिपेयर कर देते हैं. दुनिया में किसी भी अन्य वायुसेना द्वारा लिए जाने वाले समय की तुलना में बहुत कम. ये अपने फाइटर जेट्स को लगातार मेंटेन और रिपेयर करते रहते हैं. ताइवान ने पॉर्क्यूपीन स्ट्रैटेजी (Porcupine Strategy) को फॉलो किया है. अपने बचाव प्रणाली को साही जीव की तरह कर रखा है. यानी उसपर हमला करोगे तो कांटें चुभेंगे.
एयरफील्ड्स खत्म भी हो गए तो गम नहीं, पहाड़ों में बने सुरंगों से उड़ेंगे फाइटर
मान लीजिए अगर ताइवान के एयरफील्ड्स पर चीन के हमले में खराब हो जाते हैं तो उसे चिंता करने की कोई बात नहीं है. ताइवान ने पहाड़ों को काटकर चौड़ी-चौड़ी सुरंगें बना रखी हैं. जिनके अंदर फाइटर जेट्स रहते हैं. ये यहीं से निकल कर दुश्मन पर हमला करेंगे और फिर यहीं जाकर छिप जाएंगे. इन सुरंगों को हेंगशान मिलिट्री कमांड सेंटर कहा जाता है. ये 24X7 एक्टिव रहता है. इसके अंदर लगातार फाइटर जेट्स पर काम होता रहता है. हजारों लोग रह सकते हैं.
पहाड़ी सुरंगें सीधे जुड़ी हैं अमेरिका से, अचानक हमला कर पाना बेहद मुश्किल
इन सुरंगों का डायरेक्ट लिंक अमेरिका के हवाई स्थित इंडो-पैसिफिक कमांड से डायरेक्ट जुड़ा है. यहां पर मौजूद अर्ली वॉर्निंग राडार की मदद से चीनी हमले की जानकारी पहले मिल जाएगी. साथ ही हवाई से डायरेक्ट सर्विलांस होता रहता है. इसके लिए सैटेलाइट्स और एयरक्राफ्ट्स की मदद ली जाती है. यानी चीन के लिए अचानक से हमला करने की संभावना बेहद कम बनती है. ताइवान के दक्षिण में बैकअप सेंटर्स भी बनाए गए हैं. जहां पर चिहहांग एयर बेस है. यहां पर बने स्टोन माउंटेन कॉम्प्लेक्स यानी गहरी सुरंगों में फाइटर जेट्स का मेंटेनेंस, रीफ्यूलिंग सेंटर आदि हैं. यहां पर कई मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं. ताकि ताइवान के हवाई क्षेत्र को सुरक्षित रखा जा सके.
अत्याधुनिक राडार बहुत पहले बता देगा कि मिसाइल आ रही है, बचाव कर लो
मान लीजिए चीन अपनी मिसाइल से अमेरिका पर हमला करता है तो उसे ताइवान के हवाई क्षेत्र से गुजरना होगा. ताइवान के पास अत्याधुनिक अल्ट्रा हाई फ्रिक्वेंसी वाला अर्ली वॉर्निंग राडार सिस्टम है. जो मिसाइल के उड़ते ही पता लगा लेगा कि ये कहां जा रही है, इसकी दिशा और दशा क्या है. इससे ताइवान को पर्याप्त समय मिल जाएगा अमेरिका को सूचना देने के लिए और खुद के बचाव की तैयारी के लिए.
ताइवान अकेले नहीं लड़ेगा चीन के साथ, उसके साथी देश भी जंग में कूदेंगे
चीन से युद्ध में ताइवान अकेला नहीं है. उसकी मदद करने के लिए अमेरिका सबसे पहले सामने आएगा. अमेरिका का एक महत्वपूर्ण बेस जापान के दक्षिणी द्वीप ओकिनावा पर मौजूद है. अगर जरुरत पड़ी तो अमेरिका के फाइटर प्लेन्स एक घंटे के अंदर ताइवान पहुंच जाएंगे. इससे चीन के पास बहुत कम समय बचेगा कि वह ताइवान पर हवाई हमला करके भाग सके. ओकिनावा पर कादेना एयरबेस हैं. यहां पर 20 हजार अमेरिकी मरीन्स रहते हैं. इस जगह पर F-15 फाइटर जेट्स की बड़ी संख्या है. इसके अलावा अर्ली वॉर्निंग एयरक्राफ्ट्स, हर्क्यूलिस और ऑस्प्रे जैसे परिवहन विमान हैं.
अमेरिकी नौसेना का सेवेंथ फ्लीट इस समय ताइवान के पास ही मौजूद है
अमेरिकी नौसेना का सेवेंथ फ्लीट इस समय ताइवान के पास ही मौजूद है. अमेरिका एक भी एयरक्राफ्ट करियर स्ट्राइक ग्रुप भेजता है तो ताइवान का पलड़ा बेहद भारी हो जाएगा. इन विमानवाहक पोतों पर 150 फाइटर जेट्स तैनात हो सकते हैं. 70 जंगी जहाज और पनडुब्बियां इसके कमांड में हैं. जिसका नेतृत्व करता है USS Ronald Reagan विमानवाहक पोत. जिनमें पारंपरिक से लेकर परमाणु हथियार भी शामिल रहते हैं.
अमेरिका की क्रूज मिसाइल से लैस सबमरीन USS Ohio या USS Michigan किसी भी वक्त चीन की जमीन पर कहर बरपा देंगी. दोनों ही सबमरीन 300 से ज्यादा मिसाइलों से हमला कर सकती हैं. यानी चीन की हालत पस्त हो जाएगी. चीन के पास नौसैनिक हमले का कोई अनुभव नहीं है. जबकि अमेरिका कई जंग जीत चुका है. उधर, जापान की सेना भी अपनी पूरी तैयारी में है. वो भी अमेरिका और ताइवान के साथ चीन के खिलाफ जंग में शामिल हो सकती है. जापान अपने युद्धपोत और F-35B स्टेल्थ फाइटर जेट्स को उतार सकता है.