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...जब डेड रिवर टेम्स की भयानक बदबू से संसद छोड़ भाग रहे थे लॉर्डस, पानी में भरा गया था ऑक्सीजन!

'द ग्रेट स्टिंक' ने सचमुच अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. नाक पर रूमाल रखकर ताजा हवा के लिए लगभग हांफते ब्रिटेन के सांसदों ने अर्बन प्लानिंग की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम उठाया. ये फैसला टेम्स की धारा को नया जीवन देने वाली थी. ये फैसला लंदन में व्यापक सीवरेज सिस्टम बनाने का. ब्रिटेन इसमें सफल भी हुआ. लेकिन फिर आया सेकेंड वर्ल्ड वॉर. और जर्मनी ने लंदन के इस सिविल कंस्ट्रक्शन को तबाह कर दिया.

बैकग्राउंड में टेम्स नदी की तस्वीर और प्रदूषण से बचने के लिए चिमटी लगाए हुए महारानी विक्टोरिया. (डिजाइन-आजतक) बैकग्राउंड में टेम्स नदी की तस्वीर और प्रदूषण से बचने के लिए चिमटी लगाए हुए महारानी विक्टोरिया. (डिजाइन-आजतक)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 21 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 7:30 AM IST

1858 की तपती गर्मी में टेम्स नदी से उठती भयानक बदबू ब्रिटिश पार्लियामेंट के भव्य हॉल में बेतरह बैचेनी भर रही थी. संसद में बैठने वाले 'लॉर्ड्स' के लिए ये बड़ी असहनीय स्थिति थी. कई माननीय सांसद तो पहले ही इससे बचने के लिए यहां से इंग्लैंड के गांवों की ओर निकल गए थे. लेकिन जो बच गए उनके लिए सचमुच में जिंदगी नरक थी. 

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अपनी नाक पर रूमाल रखकर ताजा हवा के लिए लगभग हांफते ब्रिटेन के सांसदों ने तब जो तय किया वो मानव के आधुनिक इतिहास में शहरी नियोजन (Urban planning) की दिशा में एक चमत्कारिक पहल थी.  

टेम्स नदी से निकली दूषित वायु जो सांस लेना दूभर बना रही थी वैसी ही थी जैसा कि भभका कभी-कभी हम आजकल यमुना बेल्ट में महसूस करते हैं. 

इतिहास दर्ज करने में माहिर अंग्रेजों ने 1858 के उस ग्रीष्म ऋतु के संकट को नाम दिया "Great stink" यानी कि 'भीषण बदबू'.

रानी विक्टोरिया नाक पर चिमटी लगाए हुए.

ब्रिटिश सांसदों ने इस बात पर सहमति जताई कि लंदन को उस "बुरी गंध" से मुक्त करने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है, जिसकी वजह से लंदन में हैजा, पेचिश और पेट की कई बीमारियां फैल रही थी और लोग मर रहे थे. 

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टेम्स का क्यों हुआ बुरा हाल? 

यमुना की तरह ही लंदन के बीचों-बीच बहने वाली टेम्स नदी सदियों से व्यापार, मछली पकड़ने और दैनिक जीवन को सहारा देने वाली एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा रही है. हालांकि, 18वीं और 19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति ने इसे औद्योगिक कचरे, बिना ट्रीटमेंट हुए सीवेज और कूड़े के डंपिंग ग्राउंड में बदल दिया. विक्टोरियन युग तक, नदी एक खुला सीवर बन चुकी थी.

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1800 सदी के मध्य तक, टेम्स नदी का उपयोग सदियों से मानव मल के निपटान के लिए किया जाता रहा था. 

जैसे-जैसे लंदन की जनसंख्या बढ़ी,  1800 से 1850 के बीच यह दोगुनी से भी अधिक हो गई, टेम्स नदी कचरे के एक टापू में बदल गई. ऐसा टापू जिसे कोई नहीं देखना चाहता था. 

1858  का 'ग्रेट स्टिंक' टेम्स नदी में इसी कचरे के सड़ने और मानव मल को बिना ट्रीटमेंट इस नदी में बहा दिए जाने का परिणाम था. 

Great stink की वजह से ब्रिटिश संसद की कार्रवाई प्रभावित होने लगी. 

कहां चली गई 'सिल्वर टेम्स'

जो अंग्रेज कवि सिल्वर जैसी चमकने वाली टेम्स नदीं की स्तुति करते थे वे वो 'सिल्वर टेम्स' “एक अपारदर्शी पीला भूरा तरल पदार्थ” बन गई थी.

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मशहूर ब्रिटिश कवि चार्ल्स डिकेंस ने 1855-57 में लिखा, "शहर के हृदय स्थल से एक खतरनाक सीवर बहता था, एक स्वच्छ और ताजे पानी की नदी के स्थान पर."

टेम्स की तबाही और गंदगी ने अंग्रेजों की चेतना को झकझोरा और फिर शुरू हुआ अर्बन प्लानिंग के क्षेत्र में एक बड़ा निर्माण.  इस निर्माण को अंजाम दिया इंजीनियर जोसेफ बैजलगेट (Joseph Bazalgette) ने. 

इंजीनियर जोसेफ बैजलगेट की सीवर प्रणाली, जो 19वीं सदी के अंत में पूरी हुई, ने सीवेज को सेंट्रल लंदन से दूर कर दिया, जिससे अस्थायी रूप से टेम्स की स्थिति सुधरी. 

हालांकि स्थिति सुधरी लेकिन डाउनस्ट्रीम प्रदूषण बिगड़ गया, और लंदन की आबादी और उद्योगों के बढ़ने के साथ नदी पर दबाव बना रहा. 

द्वितीय विश्व युद्ध और टेम्स की तबाही

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) ने प्रदूषण से दम तोड़ रही टेम्स की सेहत और सूरत को और भी बिगाड़ दिया. 

जर्मन बमबारी ने बैज़लगेट के सीवर नेटवर्क के कुछ हिस्सों को नष्ट कर दिया, साथ ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को भी नष्ट कर दिया, जिससे बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज वापस नदी में गिरने लगा. 

जंग के कारण ब्रिटेन में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ी. कारखानों से निकलने वाला कचरा नदियों में छोड़ा जाने लगा. जैसा कि आज कल दिल्ली में देखने को मिलता है. जंग के बाद एक बार फिर औद्योगिक गतिविधियां बढ़ीं टेम्स के दुर्दिन खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे. 

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1950 के दशक तक, टेम्स एक मटमैला, ऑक्सीजन-रहित बंजर जमीन बन गया था. 

इस नदी में Dissolved oxygen (पानी में पाया जाने वाला ऑक्सीजन) लगभग 0.5 mg/L तक पहुंच गया. डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन (DO) पानी में घुले हुए ऑक्सीजन की मात्रा होती है. यह पानी में जीवन के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह जलीय जीवों को सांस लेने में मदद करता है.

पानी में डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन का स्तर कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे कि तापमान, दबाव, और पानी की गुणवत्ता. आम तौर पर, पानी में डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन का स्तर 5-15 मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) होना चाहिए. 

लंदन की टेम्स नदी (फोटो-रॉयटर्स)

अगर यमुना नदी की बात करें तो यमुना नदी में डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम है, जो अक्सर 2-4 mg/L के बीच रहता है. यह स्तर जलीय जीवन के लिए खतरनाक है, यही वजह है कि यमुना में आपको जलीय जीव बहुत कम देखने को मिलते हैं. 

वजीराबाद बैराज से पहले पहले DO लेवल 4–6 mg/L रहता है.  लेकिन यमुना में नजफगढ़ नाले के प्रवेश से ये लेवर 1 mg/L से कम तक चला जाता है. 

बात एक बार फिर से टेम्स नदी की.  1957 में नदी की भयावह स्थिति के कारण इसे "जैविक रूप से मृत" घोषित कर दिया गया. 

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 कानून, तकनीकी नवाचार और बुनियादी ढांचे में सुधार

1960 के दशक में कानून, तकनीकी नवाचार और बुनियादी ढांचे में सुधार की मदद से टेम्स की धारा को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू हुआ. 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, क्षतिग्रस्त सीवेज उपचार संयंत्रों की मरम्मत की गई और उनका विस्तार किया गया, लेकिन यहां अधिक व्यापक कार्रवाई की आवश्यकता थी. 1964 में ब्रिटेन ने टेम्स वाटर अथॉरिटी का गठन किया और लंदन की सीवर प्रणाली को बड़ा और आधुनिक बनाने के लिए एक दशक लंबी परियोजना शुरू की. 

इससे नदी में जाने वाले अनुपचारित सीवेज की मात्रा कम हो गई. 1960 और 1970 के दशक में क्लीन वाटर एक्ट लाया गया. ये सख्त नियम था. इसका नतीजा ये हुआ कि कारखानों को अपने अपशिष्ट को टेम्स में छोड़ने से पहले उसे ट्रीट करने के लिए मजबूर होना पड़ा. 

हानिकारक रसायनों की जगह बायोडिग्रेडेबल डिटर्जेंट का इस्तेमाल किया जाने लगा. जिससे प्रदूषण का बोझ और कम हो गया. 

टेम्स के पानी को दिया गया ऑक्सीजन 

टेम्स को शुद्ध स्वच्छ करने में एक महत्वपूर्ण नवाचार ऑक्सीजनेटर या "बबलर" की शुरूआत थी, जो नदी के गंभीर रूप से कम ऑक्सीजन लेवल को ठीक करने के लिए था. इसके जरिए पानी में ऑक्सीजन पंप किया जाता था. 

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 इसे 1988 में "थेम्स बबलर" के साथ अपग्रेड किया गया था, जो एक स्व-संचालित जहाज था, उसके बाद 1999 में एक दूसरा जहाज, "थेम्स विटैलिटी" आया. इन बबलर ने घुले हुए ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे नदी में वाटर लाइफ फिर से पैदा होने लगा. 

नीतियां और निजीकरण

1961 और 1995 के बीच कानून ने पूरे ब्रिटेन में जल गुणवत्ता के मानकों को बढ़ाया. 1989 में प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने जल कंपनियों के निजीकरण ने महत्वपूर्ण बदलाव लाए.  टेम्स वाटर, जो अब एक निजी संस्था है, ने नदी के जल और सीवेज सिस्टम का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया. 

यमुना नदी की तस्वीर (फोटो- पीटीआई)

इसके अलावा 1976 तक, टेम्स में प्रवेश करने वाले सभी सीवेज को ट्रीट करना आवश्यक था, ये एक ऐसा मील का पत्थर था जिसने ये तय कर दिया कि नदी की गंदगी को खत्म करने के लिए सरकार को रिएक्टिव नहीं बल्कि प्रोएक्टिव होने की जरूरत है. 

धीरे-धीरे लेकिन परिवर्तनकारी परिणाम

इन प्रयासों के परिणाम धीरे-धीरे आए लेकिन परिवर्तनकारी बदलाव थे. 1967 में, फ़्लॉन्डर टेम्स में दर्ज की गई पहली मछली प्रजाति बन गई, उसके बाद मीठे पानी के जीव जैसे ब्रीम,पाइक और ट्राउट टेम्स में मिलने लगे. बाद में समुद्री प्रजातियां जैसे बास और ईल भी इस नदी के मुहाने पर पाई जाने लगी. ये दशकों के मेहनत का परिणाम था. 

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टेम्स के किनारे वेटलैंड 

सकारात्मक नतीजे को देखते हुए टेम्स के किनारे वेटलैंड और प्राकृतिक आवास बनाए गए. जिससे बायो डाइवर्सिटी बढ़ी. 1980 में इस नदी में सैलमन मछली दिखाई देने लगी. ये 150 साल के बाद का चमत्कार था. 

20वीं सदी के अंत तक, टेम्स में 125 से अधिक मछली प्रजातियां और 400 प्रकार के invertebrates थे. यानी जल में पनपने वाले कीट, केकड़ा, झिंगा, घोंघा, ऑक्टोपस, स्टारफिश जैसे जीव.

वर्ष 2010 में टेम्स नदी को अंतर्राष्ट्रीय थीस नदी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, और इसके पुनरुद्धार को वैश्विक सफलता की कहानी माना गया. 

टेम्स की तरह यमुना को पुनर्जीवित करने के लिए बड़े पैमाने पर सीवेज उपचार, औद्योगिक नियंत्रण, और सामुदायिक सहयोग की जरूरत है. फरवरी 2025 तक, यमुना का DO स्तर दिल्ली में बेहद चिंताजनक बना हुआ है, जो इसके पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा बताता है. 

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