
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आते ही कठोर और आक्रामक विदेश नीति का पालन कर रहे हैं. शपथग्रहण के साथ ही ट्रंप ने जो फाइलें साइन की थी उनमें से एक फाइल थी अमेरिका का विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर होने का फैसला. इसके बाद ट्रंप ने कई फैसले लिए जिसमें अमेरिका ने अपनी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को अलविदा कह दिया और अमेरिकी स्वायत्तता को प्राथमिकता दी.
ट्रंप ने एक के बाद एक फैसले लिए और WHO, UNHRC, UNRWA, पेरिस क्लाईमेट एग्रीमेंट से बाहर हो गए. ताजा फैसले में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) पर कई प्रतिबंध लगाए हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार (6 फरवरी) को अमेरिकी नागरिकों या इजरायल जैसे अमेरिकी सहयोगियों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय की जांच में काम करने वाले लोगों पर आर्थिक और यात्रा प्रतिबंध लगाने की अनुमति दी है.
ICC पर ट्रंप ने क्यों लगाया बैन
यह कदम इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की वाशिंगटन यात्रा के साथ मेल खाता है. बता दें कि ICC ने बेंजामिन नेतन्याहू को वांटेड घोषित कर दिया है. बता दें कि अपने पहले कार्यकाल में भी ट्रंप ने ICC के के अभियोजक Fatou Bensouda पर प्रतिबंध लगाया था. तब ICC ने अफगानिस्तान में युद्ध अपराधों के लिए अमेरिकी सैनिकों के खिलाफ जांच की शुरुआत की थी.
ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद अमेरिकी सरकार ने प्रतिबंधित लिस्ट में शामिल व्यक्तियों की संपत्ति जब्त कर सकेगी और उनके परिवारों को अमेरिका आने पर प्रतिबन्ध लगा सकेगी.
अमेरिका का तर्क है कि ICC ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ 'अवैध और निराधार कार्रवाई' की है. ट्रंप सरकार द्वारा जारी कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि ट्रम्प ने निर्धारित किया है कि आईसीसी ने "बिना किसी वैध आधार के" अमेरिकी कर्मियों और इजरायल सहित अमेरिकी सहयोगियों के विरुद्ध अपने अधिकार का प्रयोग किया और जांच की.
बता दें कि 125 सदस्यों वाली आईसीसी एक स्थायी अदालत है जो युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों, नरसंहार और सदस्य देशों के क्षेत्र या उनके नागरिकों के खिलाफ आक्रामकता के अपराध के लिए व्यक्तियों पर मुकदमा चला सकती है. संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, रूस और इजरायल इसके सदस्य नहीं हैं.
सवाल है कि ट्रंप राष्ट्रपति बनते ही इतनी आक्रामक विदेश नीति पर क्यों चल रहे हैं. दरअसल ट्रंप और उनके नीति निर्माताओं का मानना है कि ये अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं अक्षम, भ्रष्ट या अमेरिका या उसके सहयोगियों के खिलाफ पक्षपाती हैं.
WHO से अमेरिका आउट
विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका को बाहर निकालने के पीछे ट्रंप यही तर्क देते हैं. डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि WHO कोविड-19 महामारी को सही तरीके से नहीं संभाल पाया, स्वतंत्र रूप से काम करने में नाकाम रहा, और राजनीतिक प्रभाव में काम किया. ट्रंप WHO पर कोविड के दौरान चीन के हितों की रक्षा का आरोप लगाते हैं. उनका कहना था कि WHO ने जनवरी और फरवरी 2020 में जो सलाह दी, वह अपर्याप्त थी और इससे वायरस को नियंत्रित करने में देरी हुई.
साथ ही ट्रंप की पॉलिसी ये कहती है कि अमेरिका जितनी बड़ी रकम WHO को देता है उस धन का अधिक प्रभावी ढंग से कहीं और उपयोग किया जा सकता है.
WHO से बाहर निकलकर ट्रंप ने अमेरिका की घरेलू राजनीति को साधा है. ये एक ऐसा कदम था जिससे ट्रंप अपने समर्थकों को यह संदेश दे सकते थे कि वे विदेशी प्रभावों से अमेरिका को सुरक्षित कर रहे हैं और अमेरिकी संसाधनों को सीधे अमेरिकी जनता के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका के बाहर होने की वजह से WHO का कार्यक्षेत्र काफी घट जाएगा. इसके अलावा इस संगठन अमेरिका को मिलने वाली भारी भरकम राशि कम हो जाएगी.2023-24 में अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को लगभग 1.28 बिलियन डॉलर दिए थे.
पेरिस क्लाईमेट एग्रीमेंट से बाहर अमेरिका
पेरिस क्लाईमेट समझौते से ट्रंप की शुरू से ही नाराजगी रही है. 2015 में हुए इस समझौते का बड़ा मकसद है, ग्लोबल तापमान पर काबू करना. इसके लिए कोयला, गैस और तेल से होने वाले प्रदूषण को कम करना होगा. प्रदूषण कम करना है इसका मतलब है कि इसका प्रयोग कम करना होगा.
निश्चित रूप से इनका कम इस्तेमाल किसी भी देश की औद्योगिक गतिविधियों को प्रभावित करेगा. उस देश की उत्पादन क्षमता कम होगी. चूंकि अमेरिका में बड़े पैमाने पर इंडस्ट्रीज के चलते ग्रीन हाउस एमिशन ज्यादा है, लिहाजा पेरिस क्लाईमेट एग्रीमेंट के तहत उसका टारगेट भी बड़ा था.ट्रंप ने आते ही इसका विरोध किया और समझौते से दूर हो गए.
ट्रंप ने तर्क दिया कि ये एग्रीमेंट अनफेयर है, जो अमेरिका पर गैरजरूरी दबाव बनाता है. पेरिस समझौते के तहत अमेरिका को कार्बन उत्सर्जन कम करना था. उन्हें डर था कि इससे उद्योगों पर असर पड़ेगा और नौकरियां कम होगी. आक्रामक ट्रंप इस शर्त को कभी स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे.
ट्रंप ये भी रोना रोते थे कि पेरिस समझौता चीन और भारत समेत बाकी देशों के लिए नरम रवैया रखता था, जबकि यूएस को सबसे ज्यादा जिम्मेदारी लेनी पड़ रही थी. हालांकि वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और यहां उद्योगों का घनत्व चीन के मुकाबले कम है.
चुनाव के दौरान ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी की पैरवी करते हुए कहा कि देश को अपनी शर्तों पर जीना चाहिए. राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर दिया.
अमेरिका के इस समझौते से बाहर होने की वजह से ग्लोबल वार्मिंग झेल रही दुनिया के सामने प्रदूषण से निपटने की चुनौती बढ़ गई है.
UNHRC से बाहर अमेरिका
UNHRC या संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (United Nations Human Rights Council) एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसका उद्देश्य मानवाधिकारों को बढ़ावा देना और सुरक्षित करना है. ये संस्था मानवाधिकार उल्लंघन की जांच करती है और ऐसे घटनाओं की निंदा भी करती है.
सवाल है कि ट्रंप UNHRC से बाहर क्यों हो गए? पिछले मंगलवार को ट्रंप ने UN के बैनर तले काम करने वाली इस संस्था से अमेरिका को बाहर करने का ऐलान कर दिया. साथ ही इसको दी जाने वाली फंडिंग भी रोक दी. ट्रंप और उसके प्रशासन ने UNHRC को इजरायल के खिलाफ लगातार पूर्वाग्रह दिखाने वाला माना है.
UNHRC से बाहर होने के बाद ट्रंप ने UNRWA (United Nations Relief and Works Agency for Palestine Refugees) को मिलने वाली मदद पर रोक लगा दी है. UNRWA फिलीस्तीनी रिफ्यूजियों को मदद करने वाली एक संस्था है जो UN के तहत काम करती है. अमेरिका के सहयोगी इजरायल ने UNRWA पर आरोप लगाया है कि ये संस्था उन हमास आतंकियों को संरक्षण देती है जिन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमला किया था.
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू UNHRC और UNRWA पर लगातार पूर्वाग्रह के आरोप लगाते आए हैं.
UNHRC ने अमेरिकी बॉर्डर पालिसी, इमीग्रेंट्स पॉलिसी पर भी सवाल उठाए थे, जिसके बाद ट्रंप ने इसका तर्कसंगत जवाब देने के बजाय इस फोरम से अलग होने का फैसला किया.
राष्ट्रपति ट्रंप ने यूनेस्को में भी अमेरिका के रोल की समीक्षा का आदेश दिया है. इसके अलावा उन्होंने इस बात भी विचार करने की घोषणा की है कि संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका कितना पैसा दे.
बता दें कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला संयुक्त राज्य अमेरिका UN के नियमित परिचालन बजट का 22% भुगतान करता है. जबकि शांति प्रयासों के लिए अमेरिका यूएन के कुल खर्च का 25 फीसदी हिस्सा उठाता है. इस लिस्ट में चीन दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है. चीन नियमित परिचालन बजट का 12 प्रतिशत और शांति प्रयासों के लिए किए जा रहे अभियानों को 16 फीसदी खर्चा उठाता है.
ट्रम्प ने ओवल ऑफिस में कुछ ही दिन पहले संवाददाताओं से बातचीत में संयुक्त राष्ट्र की वित्त नीतियों पर सवाल उठाए थे. उन्होंने कहा था कि मुझे हमेशा से लगता रहा है कि यू.एन. में जबरदस्त क्षमता है. लेकिन यह अभी उस क्षमता के अनुरूप नहीं है. उन्हें अपने काम को ठीक से करना होगा.
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि यूएन को उन देशों के साथ निष्पक्ष होना चाहिए जो निष्पक्षता के हकदार हैं.
दबाव से क्या हासिल करना चाहते हैं ट्रंप?
ट्रंप की महात्वाकांक्षी 'अमेरिका पहले' और 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' नीति के अंतर्गत उनका लक्ष्य अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के नियंत्रण या प्रभाव से मुक्त करना है. वह यह सुनिश्चित करना है कि या तो ये अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अमेरिका के अनुसार चले या फिर अमेरिका अपने नीतिगत निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सके, बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के.
ट्रंप चाहते हैं कि ये संस्थाएं अमेरिकी हितों, व्यापार, और सुरक्षा नीतियों के अनुकूल काम करें. ट्रंप का यह दबाव अमेरिकी व्यापार समझौतों, सैन्य रणनीतियों, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अमेरिका के लाभ को सुरक्षित करने के लिए है. इसके लिए वे अमेरिकी डॉलर को हथियार बनाते हैं.