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जर्मनी में दक्षिणपंथी पार्टी की जीत से भारत के साथ रिश्तों पर क्या होगा असर?

जर्मनी में रविवार को हुए आम चुनाव में चांसलर ओलाफ शोल्ज की पार्टी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है. इस चुनाव में दक्षिणपंथी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) ने जीत हासिल की है और माना जा रहा है कि फ्रेड्ररिक मर्त्स जर्मनी के अगले चांसलर बनेंगे. नई सरकार के आने से जर्मनी की विदेश नीति में भी बदलाव देखने को मिल सकता है.

जर्मनी के आम चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टियों की जीत हुई है (Photo- Reuters) जर्मनी के आम चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टियों की जीत हुई है (Photo- Reuters)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 28 फरवरी 2025,
  • अपडेटेड 4:21 PM IST

यूरोपीय देश जर्मनी में रविवार को हुए चुनाव में रूढ़िवादी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) ने सबसे अधिक वोट शेयर हासिल किया है. पार्टी ने अपनी बवेरियन सहयोगी पार्टी क्रिश्चियन सोशल यूनियन (CSU) के साथ मिलकर जर्मनी चुनाव में जीत हासिल की है. जर्मनी चुनाव में ओलाफ शोल्ज की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) की हार और दक्षिणपंथ की जीत के साथ ही यह भी साफ हो गया है कि सीडीयू के नेता फ्रेड्ररिक मर्त्स जर्मनी के अगले चांसलर होंगे.

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जर्मनी में चुनाव ऐसे वक्त में हुए हैं जब अमेरिका और यूरोपीय संघ के रिश्ते तनावपूर्ण बने हुए हैं. जर्मनी में उदार लोकतांत्रिक पार्टी की हार और दक्षिणपंथी पार्टियों की जीत का असर देश की विदेश नीति पर भी पड़ने वाला है जिसमें भारत-जर्मनी के संबंध भी शामिल हैं.

भारत और जर्मनी के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं. दोनों देशों के बीच हर साल अरबों का व्यापार होता है और 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचकर 26.10 अरब डॉलर हो गया.

जर्मनी में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत-जर्मनी रिश्तों में क्या बदलाव आएगा? इस सवाल के जवाब में भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने कहा है कि जर्मनी के चुनाव का भारत-जर्मनी रिश्तों पर कोई बड़ा असर नहीं होगा.

हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए जर्मन राजदूत ने कहा, 'जर्मनी की बड़ी राजनीतिक पार्टियों के बीच विदेश नीति को लेकर एक तरह की सहमति है. मैं नहीं मानता कि जर्मनी की विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. जर्मनी की शोल्ज सरकार ने भारत को लेकर देश की विदेश नीति - Focus On India को जिस तरीके से हैंडल किया है, मेरा मानना है कि नई सरकार भी इसी नीति पर चलेगी.'

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भारत के पूर्व राजदूत गुरजीत सिंह जर्मनी में नई सरकार के तहत दोनों देशों के रिश्तों को लेकर आशान्वित हैं. जर्मन ब्रॉडकास्टर डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जर्मनी और भारत के संबंधों को सीडीयू और एसपीडी, दोनों ही पार्टियों ने मिलकर मजबूत किया है और इसलिए ये संबंध आगे भी मजबूत रहने वाले हैं.

उन्होंने कहा, 'भारत जर्मनी और यूरोप को बहुध्रुवीय दुनिया की व्यवस्था में एक अहम शक्ति मानता है. भारत को विश्वास है कि जर्मनी के साथ उसके रिश्तों को सभी दलों का समर्थन हासिल है, इसलिए जर्मनी की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है.'

अमेरिका की वजह से क्या और करीब आएंगे भारत-जर्मनी?

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद से देश की विदेश नीति में भारी बदलाव आया है जहां अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगी यूरोपीय देशों से अलग-थलग दिख रहा है. जो बाइडेन प्रशासन जहां रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए रूस को जिम्मेदार बताते हुए उसके खिलाफ यूक्रेन की भारी मदद कर रहा था, वहीं , ट्रंप प्रशासन ने यूक्रेन के खिलाफ सख्त और रूस के खिलाफ नरम रुख अपना रखा है. 

अमेरिका ने हाल ही में सऊदी अरब में रूस-यूक्रेन शांति समझौता वार्ता किया था. यूरोप को इस वार्ता से भी दूर रखा गया. 

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जर्मनी में दक्षिणपंथ की जीत से अमेरिका खुश है लेकिन संभावित चांसलर फ्रेड्ररिक मर्त्स अमेरिका के खिलाफ बोलते आए हैं. वो जर्मनी को 'सही मायनों में अमेरिका से आजादी' दिलाने की बात कह चुके हैं.

अमेरिका के साथ यूरोपीय देशों की तनातनी के बीच यूरोपीय संघ भारत के साथ अपने संबंधों को महत्व दे रहा है. भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार वार्ता के लिए यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन भारत में हैं जहां शुक्रवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है.

क्या जर्मनी की नई सरकार भी अमेरिकी नीति में बदलावों को देखते हुए भारत के साथ पार्टनरशिप को और बढ़ाएगी?

जर्मन राजदूत एकरमैन ने कहा, 'हम व्यापार उन्मुख देश हैं. हमारा मानना है कि अमेरिका का बहुत से देशों पर टैरिफ लगाना सही नहीं लगता. मेरा मानना है कि हमारी नई सरकार भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को सफल बनाने की और अधिक कोशिश करेगी और इसे थोड़ा और आगे ले जाने में मदद करेगी.'

ग्लोबल साउथ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के प्रमुख समन्वयक गुलशन सचदेवा कहते हैं कि अमेरिकी नीतियों की वजह से यूरोप में मचे हलचल के बीच मर्त्स एक स्वतंत्र यूरोप की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

उन्होंने कहा, 'रूस भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती बना हुआ है, वहीं जर्मनी का चीन से मोहभंग बढ़ता जा रहा है. यह स्थिति भारत को यूरोप के साथ मजबूत साझेदारी बनाने के लिए प्रेरित कर सकती है. इससे भारत को एक स्वतंत्र यूरोपीय विदेश नीति का फायदा मिल सकता है.'

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