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इजरायल, फिलिस्तीन और हमास... दशकों से चली आ रही जंग की जड़ क्या है? जानें हर बार कैसे मजबूत होते गए यहूदी

इजरायल, हमास और फिलिस्तीन. इस लड़ाई में प्रमुख तौर पर यही तीन स्टेक होल्डर हैं. इजरायल और अरब देशों की अदावत पुरानी है.साल 1948 में जब इजरायल बना तभी से अरब देशों की इजरायल से बनती नहीं थी.

इजरायल-फिलिस्तीन विवाद इजरायल-फिलिस्तीन विवाद
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 08 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 2:09 PM IST

जब हमास के आतंकियों ने शनिवार सुबह इजरायल में तांडव किया तो पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी कि इजरायल पर हमला हुआ है. ऐसे में सवाल उठा कि आखिर हमास ने इजरायल पर हमला क्यों किया? हालांकि इन दोनों देशों के बीच जंग कोई नई बात नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि जब-जब हमास ने हमला किया है तो ज्यादा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ा है. हमास, इजरायल और फिलस्तीन. आइए समझते हैं कि आखिर इस जंग का पूरा मामला क्या है?

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इजरायल, हमास और फिलिस्तीन. इस लड़ाई में प्रमुख तौर पर यही तीन स्टेक होल्डर हैं. इजरायल और अरब देशों की अदावत पुरानी है.साल 1948 में जब इजरायल बना तभी से अरब देशों की इजरायल से बनती नहीं थी. जिसका नतीजा ये हुआ कि यूनाइटेड नेशन का टू स्टेट प्लान कभी अमल में नहीं लाया जा सका. टू स्टेट प्लान संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन और इजरायल के विवाद खत्म करने के लिए किया था जिसमें यहूदियों के लिए इजरायल और फिलिस्तीनियों के लिए फिलिस्तीन का प्रावधान.

मजबूत होता गया इजरायल

लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब इजरायल पर हमले हुए, इजरायल ने मुंहतोड़ जवाब दिया. न सिर्फ जवाब दिया बल्कि अपनी स्थिति भी मजबूत करता गया. फिर चाहे 1967 का 6 दिन का युद्ध हो या फिर 1973 का अरब-इजरायल युद्ध. हर युद्ध में इजरायल भौगौलिक तौर पर अपना आकार बढ़ाता गया. फिलिस्तीनियों की जमीन खिसकती गई.

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1990 का दशक आते-आते इजरायल और फिलिस्तीन में बातचीत का दौर शुरु हुआ. एक तरफ बातचीत के जरिए विवाद खत्म करने का प्रयास किया जाने लगा. दूसरी तरफ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने 1987 में हमास नाम के संगठन की शुरुआत की. अंग्रेजी में हमास का मतलब इस्लामिक रजिस्टेंश मूवमेंट है. 

फिलीस्तीन को इस्लामिक स्टेट बनाने का था मकसद

हमास का उद्देश्य फिलिस्तीन को इजरायल से आजाद कराना और उसे इस्लामिक स्टेट बनाना था. फिलिस्तीन में हमास अपनी जड़ें जमा रहा था और उधर बातचीत के जरिए फिलिस्तीन और इजरायल के रिश्ते सामान्य होने लगे. 1995 में इजरायल ने फिलिस्तीनियों को जमीनें लौटाना शुरू कर दिया. 

ओस्लो समझौते के तहत शांति बहाल करने की कोशिश

ओस्लो समझौते के तहत के तहत गाजा स्ट्रिप और वेस्ट बैंक को 3 तरह के क्षेत्रों में बांटा गया. जोन ए में ऐसे क्षेत्रों को रखा गया जिनपर फिलिस्तीन का पूरा नियंत्रण था. जोन बी में उन क्षेत्रों को रखा गया, जहां प्रशासन फिलिस्तीन का था लेकिन सुरक्षा इजरायल के हाथ रही. इसी तरह जोन सी में वो क्षेत्र थे जहां पूर्ण रूप से इजरायल का नियंत्रण था.

1995 में हुए ओस्लो-2 समझौते ने फिलिस्तीनियों को वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में अधिक ऑटोनामी दिया. इस समझौते के तहत फिलिस्तीनी अथॉरिटी को वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी के 91% क्षेत्रों पर नियंत्रण प्रदान किया गया. फिलिस्तीन अथॉरिटी ने एक स्थायी समझौते पर बातचीत करने के लिए इजरायल के साथ काम करने की प्रतिबद्धता जाहिर की. हालांकि, ये समझौते पूरी तरह से लागू नहीं हुए, और फिलीस्तीन-इजरायल संघर्ष जारी रहा.

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इस समझौते के बाद वेस्टबैंक से फिलिस्तीन के हिस्से में कई प्रमुख शहर आए जिसमें हेब्रों, यत्ता, बेतलहम, रमल्ला, कल्कइलियाह, तुलकार्म, जैनीन, नाबुलुस थे. इसके अलावा गाजा पट्टी के शहर भी फिलिस्तीन को मिले. जिसमें रफाह, खान यूनुस, डायरल, अलबलह, जबलियाह, अन नजलाह शामिल हैं. इस समझौते के बाद ऐसा लगने लगा था कि इजरायल और फिलिस्तीन का विवाद अब खत्म हो गया है. अब दोनों देश शांतिपूर्वक आगे बढ़ेंगे. लेकिन दोनों पक्षों के कट्टरपंथियों को ये समझौता मंजूर नहीं था. 

जब एक ही दिन पड़ा यहूदियों और मुसलमानों का त्योहार

1994 में इत्तेफाक से यहूदियों का त्योहार पुरिम और मुसलमानों को रमदान एक ही दिन पड़ गया. तब एक यहूदी कट्टरपंथी ने मुसलमानों की भीड़ पर फायरिंग कर दी. इसके बदले में हमास के आतंकियों ने आत्मघाती हमलों के जरिए धमाके शुरू कर दिए. इन घटनाओं के बाद भी ओस्लो समझौते पर बातचीत जारी थी.

शांति प्रयासों पर पूर्णविराम लगा 4 नवंबर 1995 को जब एक कट्टरपंथी यहूदी ने प्रधानमंत्री यिजक रॉबिन की हत्या कर दी. फिर साल 1996 में बेंजामिन नेतन्याहू पहली बार इजरायल के प्रधानमंत्री बने. नेतन्याहू ने सख्त रुख अपनाया, सेक्युरिटी विद पीस का नारा दिया और ओस्लो समझौते को मानने से इनकार कर दिया. 

इधर हमास ने फिलिस्तीन की राजनीति पर धीरे-धीरे कब्जा कर लिया. हमास के आतंकी मुस्लिम भाईचारे के नाम पर फंड इकट्ठा करते हैं और उसका इस्तेमाल इजराइल ये खिलाफ करते हैं. आत्मघाती हमलों से शुरू हुआ हमास का आतंकी सफर अब रॉकेट अटैक तक पहुंच गया है. आए दिन हमास के आतंकी इजरायल पर हमला करते रहते हैं. 

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अरब मुल्कों के बीच घिरा इजरायल

अगर इजरायल का नक्शा देखें तो ये एक ऐसा देश है जो चारों ओर से अरब मुल्कों से घिरा है. इजरायल के उत्तर में लेबनान और सीरिया की मौजूदगी है. इजरायल की पूरब की लंबी सीमा जॉर्डन से सटी हुई है. अगर इजरायल के पश्चिमी हिस्से की बात करें तो मिस्र और गाजा पट्टी की मौजूदगी यहां है. दक्षिण की ओर भी मिस्र ही है. इजरायल की पश्चिमी सीमा पर मशहूर वेस्ट बैंक मौजूद है. इस वेस्ट बैंक के किनारे पर येरुशलम मौजूद है. जिसे तीन धर्मों के लोग अपना पवित्र स्थल मानते हैं.  

इसके अलावा इजरायल की पूर्वी सीमा पर विशाल भूमध्य सागर स्थित है. 

इजरायल की पूर्वी सीमा की बात करें तो सबसे पहले 41 किलोमीटर गाजा पट्टी है, इसके बाद समुद्री किनारे पर अश्कलोन, अश्दोद, राजधानी तेल अवीव, नेतान्या, हाइफा और नहारिया जैसे शहर मौजूद हैं. 

सदी का सबसे बड़ा हमला

7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल पर जो रॉकेट दागे वो इस सदी का सबसे बड़ा अटैक है. अलजजीरा टेलिवजन के एक कार्यक्रम में हमास के प्रवक्ता ने कहा कि इजरायल पर ये हमला मुस्लिम देशों को संदेश है कि वो इजरायल से रिश्ते सामान्य करने का प्रयास छोड़ दें.

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हमास का साथ देता है हिजबुल्ला

आपको बता दें कि वेस्टबैंक में कई ऐसे मजहबी स्थल हैं, जिनपर यहूदी और इस्लामिस्ट दोनों दावा करते हैं. ऐसे ज्यादातर क्षेत्रों पर इजरायल का कब्जा है. हमास उन क्षेत्रों को इजरायल से छीनकर इस्लामिक देश बनाना चाहता है. क्योंकि मामला मजहबी है, इसलिए आतंकी संगठन हमास को समर्थन और फंडिंग भी मिल जाती है. मजहब के नाम पर युवाओं को बरगलाना और इजरायल पर आतंकी हमले करवाने में हमास का साथ हिजबुल्ला जैसे संगठन भी देते हैं.

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