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अमरुल्ला सालेह: जासूस से लेकर कार्यकारी राष्ट्रपति तक, तालिबान के खिलाफ अकेले मोर्चा खोला

अमरुल्ला सालेह ने खुद को कार्यकारी राष्ट्रपति घोषित किया है, वह इस वक्त अफगानिस्तान के पंजशीर इलाके में हैं. जिसपर तालिबान अबतक कब्जा नहीं कर पाया है, जबकि अफगानिस्तान के बाकी 34 प्रांतों में उसका ही कब्ज़ा है. 

अफगानिस्तान के मौजूदा कार्यकारी राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह (फाइल फोटो) अफगानिस्तान के मौजूदा कार्यकारी राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह (फाइल फोटो)
गीता मोहन
  • नई दिल्ली,
  • 19 अगस्त 2021,
  • अपडेटेड 12:13 PM IST
  • अमरुल्ला सालेह ने तालिबान के खिलाफ संभाला मोर्चा
  • खुद को कार्यकारी राष्ट्रपति बनाया, हार मानने से इनकार

अफगानिस्तान (Afghansitan) में तालिबान (Taliban) के बढ़ते हुए वर्चस्व के बीच अशरफ गनी जब देश छोड़कर भाग गए, तब मुल्क के पहले उप-राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह (Amrullah Saleh) ने देश में रहकर तालिबान के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया.

अमरुल्ला सालेह ने खुद को कार्यकारी राष्ट्रपति घोषित किया है, वह इस वक्त अफगानिस्तान के पंजशीर इलाके में हैं. जिसपर तालिबान अबतक कब्जा नहीं कर पाया है, जबकि अफगानिस्तान के बाकी 34 प्रांतों में उसका ही कब्ज़ा है. 

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पंजशीर (Panjshir) प्रांत तालिबान के खिलाफ बने राष्ट्रीय मोर्चे का अहम हिस्सा है. अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद और अमरुल्ला सालेह की अगुवाई में यहां से तालिबान को चुनौती दी जा रही है. तमाम चुनौतियों के बीच 17 अगस्त, 2021 को अमरुल्ला सालेह ने खुद को कार्यकारी राष्ट्रपति घोषित किया, उन्होंने संविधान का हवाला दिया लेकिन तालिबान इसे नहीं मानता है. 

अशरफ गनी (Ashraf Ghani) के जाने के बाद अमरुल्ला सालेह की ओर से अफगानी नेताओं से संपर्क साधा जा रहा है और तालिबान के खिलाफ जारी लड़ाई को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है. अमरुल्ला ने साफ किया है कि वह अपने देश के लिए लड़ते रहेंगे और तालिबान के सामने नहीं झुकेंगे. 

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कौन हैं अमरुल्ला सालेह?

पंजशीर प्रांत में अक्टूबर 1972 में जन्मे अमरुल्ला ताजिक एथनिक ग्रुप के परिवार से संबंध रखते हैं. कम उम्र में ही उनके ऊपर से परिवार का साया उठ गया था. ऐसे में उन्होंने छोटी उम्र में ही अहमद शाह मसूद की अगुवाई में एंटी-तालिबानी मूवमेंट को ज्वाइन कर लिया. 

जानकारी के मुताबिक, अमरुल्ला सालेह को तालिबान ने निजी तौर पर नुकसान पहुंचाया है. 1996 में तालिबानियों ने उनकी बहन को टॉर्चर कर मार डाला. सालेह बताते हैं कि तब से ही तालिबान के प्रति उनका रुझान पूरी तरह बदल गया. ऐसे में उन्होंने तालिबान को हराने के लिए लड़ाई में हिस्सा लिया.

साल 1997 में अमरुल्ला सालेह को मसूद द्वारा यूनाइटेड फ्रंट के अंतराष्ट्रीय दफ्तर में नियुक्त किया गया. जो ताजिकिस्तान के दुशान्बे में था. वहां उन्होंने विदेशी इंटेलीजेंस के साथ मिलकर काम किया. 

अमरुल्ला सालेह – एक जासूस

अमरुल्ला सालेह साल 2001 तक नॉर्दन एलाइंस के साथ रहे, उसके बाद 9/11 का हमला हुआ और अमेरिक की अफगानिस्तान में एंट्री हो गई. तब अमरुल्ला ने अमेरिकी एजेंसी CIA के साथ मिलकर काम किया, तालिबान को कमजोर करने के लिए उन्होंने इंटेलिजेंस ऑपरेशन को अंजाम दिया. जब तालिबान की सरकार हटी तो उसके बाद अमरुल्ला को कई अहम पद मिले. 

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साल 2004 में अमरुल्ला सालेह को अफगानिस्तान इंटेलिजेंस एजेंसी नेशनल सिक्युरिटी डॉयरेक्टरेट का प्रमुख बनाया गया. इसी दौरान उन्होंने तालिबान के खिलाफ अपना नेटवर्क तैयार किया, जो कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान की सीमा और आसपास में अपनी जड़ें मजबूत कर रहे थे. तालिबान को पाकिस्तान समर्थन दे रहा था, ऐसे में अमरुल्ला भी पाकिस्तान के खिलाफ हो गए.

एक मीटिंग में जब अमरुल्ला की मुलाकात पाकिस्तान के परवेज मुशर्रफ से हुई, तब उन्होंने कह दिया था कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही है, मुशर्रफ वो मीटिंग छोड़कर ही चले गए थे. अमरुल्ला का नेटवर्क धीरे-धीरे मजबूत होता गया और तालिबान के अंदर की डिटेल उन्हें मिलती चली गई. इसने अफगानिस्तानी सरकार को काफी मदद की. 

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अमरुल्ला के नेता बनने की कहानी...

साल 2010 में अमरुल्ला सालेह ने इंटेलिजेंस की जॉब से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि तब एक हमला हुआ था जिसके बाद रणनीति पर काफी सवाल खड़े हो रहे थे. दरअसल, तब हामिद करजई और तालिबान के बीच बातचीत का रास्ता निकला था, लेकिन सालेह ने इसे एक साजिश बताया था. इसी के बाद से ही दोनों के बीच में संबंध बिगड़ने लगे थे. 

साल 2011 में अमरुल्ला सालेह ने हामिद करजई के खिलाफ कैंपेन छेड़ दिया और उनकी नीतियों पर सवाल खड़े करने लगे. इसके बाद उन्होंने नेशनल मूवमेंट की शुरुआत की और फिर अशरफ गनी के साथ हाथ मिला लिया. सितंबर 2014 में अशरफ गनी सत्ता में आए और अमरुल्ला सालेह को बाद में गृह मंत्री बनाया गया.

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2019 में जब अशरफ गनी फिर से राष्ट्रपति बने, तब अमरुल्ला सालेह को उपराष्ट्रपति बनाया गया. वो अफगानिस्तान के पहले उप-राष्ट्रपति बने. अब एक बार फिर जब अफगानिस्तान मुश्किल में है और तालिबान के हाथ में है, तब अमरुल्ला एक बार फिर तालिबान के खिलाफ लड़े हुए हैं. अमरुल्ला सालेह ने खुद को कार्यकारी राष्ट्रपति बनाया है और तालिबान के खिलाफ मोर्चा खोला है.

अमरुल्ला सालेह ने उन लोगों को सलाम किया है, जो तालिबान के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. तालिबान के खिलाफ अभी भी जो लोग अफगानिस्तानी झंडे का सम्मान कर रहे हैं, उनको अमरुल्ला सालेह ने ट्वीट कर सलाम किया है. 

 

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