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जंग के बीच भी कैसे न्यूट्रल बने हुए हैं कई देश, क्या खुद को तटस्थ बता देने पर लड़ाई का खतरा टल जाता है?

एक इंटरव्यू के दौरान हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत न्यूट्रल देश नहीं, वो शांति के पक्ष में है. हमने कई मौकों पर साफ स्टैंड लेते हुए ये बात साबित भी की. वहीं दुनिया के कई देश ऐसे भी हैं, जिन्हें न ऊधो का लेना है, न माधो का देना. उन्हें किसी उठापटक की कोई परवाह नहीं. खुद को तटस्थ बताते हुए उन्होंने अपनी सेनाएं भी घटा लीं.

स्विट्जरलैंड की विदेश नीति तटस्थता की है. (Photo- Getty Images) स्विट्जरलैंड की विदेश नीति तटस्थता की है. (Photo- Getty Images)
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 10 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 1:48 PM IST

कह सकते हैं कि इस वक्त दुनिया में जंग ट्रेंड में है. हर कोई एक-दूसरे से लड़ रहा है. और जो बाकी हैं, वे लड़ने की तैयारी में हैं. लेकिन ग्लोब में कुछ ऐसे भी मुल्क हैं, जो न्यूट्रल हैं. यहां तक कि वे अपनी तटस्थता का बाकायदा एलान कर चुके, जिसे UN ने भी हरी झंडी दे दी. लेकिन क्या है तटस्थ रहना?

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क्या ऐसे देशों के वाकई कोई दोस्त या दुश्मन नहीं?

क्या तटस्थता अपनाने के साथ वे अपने बॉर्डर को लेकर भी निश्चिंत हो जाते हैं?

या कोई उनपर हमला कर भी दे तो वे सफेद झंडे फहराते रहते हैं?

ये देश जंग से ऊबकर हुआ न्यूट्रल

न्यूट्रल देशों की बात करें तो सबसे पहला नाम स्विट्जरलैंड का आता है. अपनी फॉरेन पॉलिसी के तहत ये देश किसी भी देश के अंदरूनी या आपसी झगड़े-फसाद में शामिल नहीं होता है. वो किसी का पक्ष नहीं लेता, फिर चाहे लड़ाई में फंसा देश उसका पड़ोसी या दोस्त देश क्यों न हो. विश्व युद्ध के दौरान भी स्विस मुल्क ने अपनी सेना को तैयार रखा. रिफ्यूजियों की मदद भी की, लेकिन युद्ध का हिस्सा नहीं बना. 

यूरोपियन देश स्विट्जरलैंड लोकतांत्रिक देश है, जहां की सीमाएं पोरस हैं, यानी यहां आना-जाना कई दूसरे देशों की तरह मुश्किल नहीं. अगर लोग यात्रा प्लान करते हैं तो यहां का वीजा आसानी से मिल पाता है, खासकर छोटी ट्रिप प्लान कर रहे हों. इसकी एक वजह ये भी है, यहां की इकनॉमी टूरिस्ट फ्रैंडली है. राजस्व का बड़ा हिस्सा सैलानियों के जरिए भी आता है.

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भाषा के मामले में भी यहां खुलापन है. यहां के बड़े शहरों में जर्मन, इतालवी, फ्रेंच और रोमन भाषाएं बोली जाती हैं. अंग्रेजी भी यहां बोली जाती है, खासकर फॉरेन स्टूडेंट्स और कामकाजी लोगों के बीच यही प्रचलित भाषा रही. लेकिन सवाल ये है कि कई देशों के मेलजोल की झलक वाले इस देश में न्यूट्रल होने की नीति क्यों रही.

इतिहास ने बोया तटस्थता का बीज

अतीत में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनका असर यहां की फॉरेन पॉलिसी पर पड़ा. ये बात 15वीं सदी के आसपास की है, जब पूरा यूरोप ही लड़ाइयों से घिरा हुआ था. अल्पाइन पहाड़ों के बीच बसा स्विट्जरलैंड रणनीतिक तौर पर काफी जरूरी था. कुदरती वजहों से वो जंग की चपेट में आता रहा. हर कब्जा करने वाला देश स्विस लोगों को अपने लिए सैनिक की तरह इस्तेमाल करती. 

लगातार जंगों ने वहां के लोगों को थका दिया. 17वीं सदी में एक संधि के बीच स्विट्जरलैंड ने खुद को तटस्थ घोषित कर दिया. नेताओं ने महसूस किया कि उनके देश के लिए यही सबसे दमदार सौदा है क्योंकि वे कई ताकतवर देशों से घिरे हुए थे, जिनसे टकराव का मतलब था हारना. 

तटस्थता के बीच हुआ अटैक

न्यूट्रल घोषित किए जाने के बाद भी 18वीं सदी में फ्रांस ने उसपर हमला किया और वो फ्रेंच एंपायर का हिस्सा हो गया. आजाद-खयाल स्विस जनता के लिए ये बड़ा धक्का था. वे छुटपुट बगावत कर ही रहे थे कि इस बीच फ्रांस को ही वॉटरलू के युद्ध में हार मिल गई. इसके बाद विएना में एक सभा हुई, जहां स्विट्जरलैंड ने अपने न्यूट्रल का होने का एक बार फिर एलान किया. इस बार ज्यादा दम के साथ. इसी दौरान ट्रीटी ऑफ पेरिस पर साइन हुआ, जिसमें उसने दुनिया के हर देश के युद्ध के लिए खुद को ऑफिशियली न्यूट्रल घोषित किया. इसी बात को यहां के संविधान की आत्मा माना गया.

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क्या है न्यूट्रल होने का मतलब? 

तटस्थता की नीति के तहत, स्विट्जरलैंड दो देशों के बीच लड़ाई में किसी तरह का सैन्य सहयोग नहीं करेगा. वो न तो अपने सैनिक देगा, न इस खास मकसद से हथियार ही सप्लाई करेगा. यहां तक कि अगर दो पड़ोसी देशों के बीच जंग छिड़ी हो और एक देश की आर्मी किसी भी तरह स्विस सीमा का इस्तेमाल करना चाहे तो उसकी मनाही है. हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि स्विट्जरलैंड अपनी रक्षा भी नहीं करेगा.

अपनी आर्मी भी है यहां 

यहां पर स्विस आर्म्ड फोर्स है, जिसमें साल 2017 में लगभग डेढ़ लाख सैनिक एक्टिव ड्यूटी पर थे. एक्टिव ड्यूटी का मतलब है, वे स्थाई तौर पर सेना के लिए ही काम कर रहे हैं. अस्थाई सेना भी होती है, जो अशांतिकाल में काम आती है. बता दें कि तमाम तटस्थता के बाद भी इस देश में पुरुषों को सैन्य ट्रेनिंग और सेवा देना अनिवार्य है, अगर वे मानसिक या शारीरिक तौर पर किसी तरह की विकलांगता न झेल रहे हों तो. महिलाएं चाहें तो सेना की ट्रेनिंग और सर्विस का हिस्सा बन सकती हैं, ये ऑप्शनल है. इस पॉलिसी को सशस्त्र तटस्थता कहते हैं. आसान भाषा में समझें तो ये उस शख्स की तरह है, जो हथियार तो रखता है लेकिन आत्मरक्षा के लिए.

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विश्व युद्ध के दौरान भी अलग रहा

पहले और दूसरे वर्ल्ड वॉर के दौरान भी स्विस सरकार तटस्थता की अपनी नीति पर पक्की रही. पहले युद्ध में उसका स्टैंड साफ था. उसने अपनी सेना को आपातकाल के तैयार कर लिया था, उसकी सीमाओं पर चौकसी थी, लेकिन उसने युद्ध का हिस्सा बनने से मना कर दिया. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान देश कुछ परेशानी में रहा. बड़े देश और खासकर जर्मनी ने उसपर अपने साथ शामिल होने का दबाव बनाया, लेकिन उसने सहयोग नहीं किया.

क्या हिटलर के हाथों मरने दिया था यहूदियों को! 

इसका दूसरा पक्ष भी है. स्विट्जरलैंड पर आरोप लगे थे कि उसने वैसे तो सबके लिए न्यूट्रल रहने की बात की थी, लेकिन कहीं न कहीं वो नाजियों का सपोर्ट करता रहा.

जर्मनी और पोलैंड के यहूदियों ने कहा था कि हिटलर से आतंक से भागकर शरण लेने के लिए जब वे स्विट्जरलैंड पहुंचे तो इस देश ने उन्हें अपनी सीमा के भीतर तक आने नहीं दिया था. नब्बे के दशक तक स्विस बैंकों में वे पैसे जमा थे, जो यहूदी होलोकास्ट के दौरान खत्म हुए थे. असल में नाजियों ने तब उनके पैसों को स्विस बैंकों में डाल दिया था ताकि लड़ाई के बाद आराम से हिस्सा बांटा जा सके, लेकिन फिर हालात बदले और जर्मनी करना पड़ा. 

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गोपनीयता कानून के हवाले से स्विस बैंक ने इस बात को लंबे समय तक छिपाकर रखा था. लेकिन दबाव के बाद कानून को लचीला बनाया गया, तब जाकर इतनी बड़ी बात बाहर आ सकी.

कई और देश भी तटस्थ

- ऑस्ट्रिया किसी सैन्य गठबंधन में शामिल नहीं होता और अपनी फॉरेन पॉलिसी में तटस्थता रखता है. 

- कोस्टा रिका ने अपनी आर्मी को खत्म करते हुए खुद को न्यूट्रल घोषित कर दिया. 

- तुर्कमेनिस्तान की न्यूट्रैलिटी को खुद यूएन ने मान्यता दी. 

क्या न्यूट्रल देश हमलों से बचे रहते हैं

तटस्थ मुल्कों पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों को तोड़ना है, जिसके बाद सभी बड़े देश नाराज हो सकते हैं. तटस्थ देशों के स्टैंड को हेग कन्वेंशन में बड़ा स्पेस दिया गया. इसके मुताबिक, ऐसे देश पर हमला गैरकानूनी है. लड़ाई में जुटे देशों को हर हाल में न्यूट्रल देश की जमीनी, जल और वायु सीमाओं से दूर रहना होगा.

किसी तटस्थ देश पर हमला हो तो यूएन हमलावर देश के खिलाफ बड़ी या सैन्य कार्रवाई भी कर सकता है. गंभीर खतरा दिखने पर ऐसे देश अपनी तटस्थता छोड़कर किसी गठबंधन का हिस्सा भी बन सकें, ये छूट भी उन्हें है. 

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