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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो (Zulfikar Ali Bhutto) को 1979 में हत्या से जुड़े एक मामले में फांसी दी गई थी. लेकिन अब 45 साल बाद पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने भुट्टो की फांसी को लेकर बड़ी टिपप्णी दी है.
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 1979 में पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के खिलाफ चलाए गए मुकदमे में हुई सुनवाई संविधान के अनुरूप नहीं थी. पाकिस्तान के चीफ जस्टिस काजी फैज ईसा की अगुवाई में नौ जजों की पीठ ने ये टिप्पणी पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की ओर से दायर रिफरेंस पर की है.
दरअसल जरदारी ने दो अप्रैल 2011 को पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 189 के तहत पूर्व प्रधानमंत्री भुट्टो को दिए गए मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट की राय मांगी थी. जरदारी ने याचिका में कहा था कि 1979 के इस फैसले पर दोबारा गौर किया जाना चाहिए. अब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और जूरिस्ट ने इस फैसले को ऐतिहासिक भूल बताया था.
चीफ जस्टिस ईसा ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री भुट्टो को निष्पक्ष ट्रायल नहीं दिया गया था. भुट्टो को साल 1979 की 4 अप्रैल को रावलपिंडी में फांसी दे दी गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस ईसा ने कहा कि लाहौर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई अपील पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 4 और 9 के अनुरूप नहीं थी. इनके तहत निष्पक्ष सुनवाई और तय प्रक्रिया को मौलिक अधिकार के रूप में देखा गया है. संविधान के आर्टिकल 10ए के तहत भी इसे एक मूल अधिकार के रूप में जगह दी गयी है.
बता दें कि इस मामले में अब तक सात बार सुनवाई हो चुकी है. चीफ जस्टिस ईसा का कहना है कि लाहौर हाईकोर्ट की ओर से मामले की सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट की अपील एक दूसरे से मेल नहीं खाते.
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डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि हमारे न्यायिक इतिहास में ऐसे कुछ मामले हुए हैं, जिन्होंने आमजन में ऐसी धारणा बनी है कि डर से या फिर पक्षपात करने से न्याय प्रभावित होता है. जब तक हम अतीत में की गई अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम खुद में सुधार नहीं कर सकते.
चीफ जस्टिस ने ये भी कहा कि इस रेफरेंस से सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक के शासन में भुट्टो को मृत्युदंड दिए जाने के मामले पर फिर से गौर करने का मौका मिला है
जुल्फिकार अली भुट्टो के पोते बिलावल भुट्टो जरदारी ने अदालत के इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है. उन्होंने कहा है कि 44 साल बाद देश की सुप्रीम कोर्ट के फैसले से देश को सही राह में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. 44 पुराने उस फैसले के दाग से इस मुल्क के लोगों को अदालत पर विश्वास करने में मुश्किल हुई. लोगों की धारणा रही कि अगर इस मुल्क के प्रधानमंत्री को न्याय नहीं मिला तो हमें कैसे मिलेगा.
क्या है मामला?
पाकिस्तान में 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टो को हत्या के मामले में उकसाने के लिए दोषी ठहराया गया था और फांसी की सजा दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय बेंच के चार जजों ने लाहौर हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था, जबकि तीन ने जुल्फिकार अली भुट्टो को आरोपों से बरी कर दिया था. उसके बाद 4 अप्रैल, 1979 को जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दे दी गई थी. हालांकि, भुट्टो का परिवार आज भी न्याय की मांग कर रहा है. कई लोगों का मानना है कि यह तत्कालीन सैन्य तानाशाह जनरल जियाउल हक के दबाव में लिया गया फैसला था, जिन्होंने 1977 में भुट्टो की सरकार को गिरा दिया था.
ज़ुल्फिकार अली भुट्टो 14 अगस्त, 1973 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे. लेकि चार साल बाद 5 जुलाई, 1977 को जनरल जिया उल हक ने सैन्य तख्तापलट कर दिया था. इसके बाद हत्या के एक मामले में साल 1979 की चार अप्रैल को उन्हें फांसी दी गई.