रंजना गौहर के प्रदर्शन उनकी छऊ, कथक और मणिपुरी नृत्य की ट्रेनिंग को दर्शाते हैं. उन्होंने "ओडिसी, द डांस डिवाइन" नामक किताब भी लिखी है और ओडिसी व अन्य नृत्य रूपों को बढ़ावा देने के लिए वृत्तचित्रों का निर्माण किया है. उन्होंने प्रसिद्ध गुरु मायाधर राउत के अधीन प्रशिक्षण लिया और उनके पास दर्शनशास्त्र और अंग्रेजी साहित्य में डिग्रियां हैं.
नृत्यांगना शोभना नारायण शृंगार के गहरे अर्थ पर रौशनी डालते हुए कहती हैं कि, “शृंगार, मेरे लिए, केवल एक कलात्मक रूप नहीं है. यह जीवन की धड़कन है, एक ऐसी भाषा है जो सीधे दिल से बात करती है. शृंगार एक ऐसा भाव है, जो वहां भी मौजूद है, जहां कुछ नहीं है. यह विलोपन, यह वियोग भी शृंगार का ही एक पक्ष है. इसके कैनवस को प्रेम, संयोग-वियोग, राग-द्वेष के बजाय और बड़ा व विस्तृत करके देखने की जरूरत है.'
कथक की कला में विशेष रूप से इसकी कहानी कहने की शैली में सहज अभिव्यक्ति (इम्प्रोवाइजेशन) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. कथक कलाकार कहानी की भावनात्मक टेंडेंसी को न सिर्फ मंचन के दौरान आत्मसात कर पाते हैं, बल्कि जब वे अपने मानसिक चित्रों को मंच पर भाव के जरिए गढ़ रहे होते हैं तब, वह चेहरे के भावों और शारीरिक मुद्राओं के जरिए उन्हीं भावों को अंदर से बाहर भी लाते हैं. सहज अभिव्यक्ति की सबसे चुनौती पूर्ण शैलियों में से एक है बैठक. इसे कथक का बैठकी भाव भी कहते हैं.
मौका था, उत्सव एजुकेशनल एंड कल्चरल सोसाइटी द्वारा आयोजित और पद्मश्री व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित गुरु रंजना गौहर की शिष्याओं द्वारा ‘नृत्य मोहा’ की प्रस्तुति का. ओडिसी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों पर ऐसी सम्मोहिनी शक्ति चलाई कि, 21वीं सदी का मौजूदा जनसमूह समय में पीछे की ओर सफर करते हुए शताब्दियों के प्राचीन सफर पर निकल पड़ा.
भारत में शास्त्रीय नृत्य केवल एक कला नहीं, बल्कि एक साधना है. यह नृत्य रूप नाट्यशास्त्र पर आधारित होते हैं और इनमें भाव, राग, ताल एवं मुद्राओं का गहन समन्वय देखने को मिलता है. प्रमुख भारतीय शास्त्रीय नृत्य अलग-अलग प्रदेशों की खासियत के साथ सामने आता है.
नृत्य केवल एक कला का रूप नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है. भारतीय पौराणिक कथाओं, दर्शन और धार्मिक ग्रंथों में भी इसका खास स्थान है. यह न केवल अभिव्यक्ति का जरिया है, बल्कि देवताओं की आराधना, आध्यात्मिक साधना और सांस्कृतिक परंपराओं का अभिन्न अंग भी रहा है.
जैसे हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल हैं और शीरीं-फरहाद मशहूर हैं, वैसे ही रेतीली जमीन में प्यार के फूल खिलाए थे, ढोला और मारू ने. आज भी राजस्थान में नए दूल्हा-दूल्हन के जोड़े को ढोला-मारू की जोड़ी कह देते हैं. ढोला शब्द तो पति और प्रेमी का पर्यायवाची बन गया है. जानिए 'केसरिया बालम' गीत की कहानी
होली का त्योहार तो कई दिन पहले से धीरे-धीरे आता है धीरे-धीरे सबको रंगों और उमंगों में सराबोर करता चलता है. होली भी केवल रंगों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसमें लोक संगीत, परंपराएं और सामाजिक मेलजोल भी गहराई से जुड़े होते हैं. ये सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत रूप है. होली के पांच यार- फाग, राग, रंग, मस्ती और मल्हार ऐसी धूम मचाते हैं कि होली भुलाए नहीं भूलती.
ब्रज में होली की शुरुआत लड्डुओं की होली से होती है. बरसाना गांव से शुरू होने वाली इस होली को निमंत्रण का प्रतीक माना जाता है. मान्यता के अनुसार, राधा प्रतीक रूप से नंदगांव लड्डू लेकर जाती हैं और नंदगांव के हुरियारे हुड़दंग शुरू कर देते हैं. मीठे लड्डुओं की इस होली का नजारा देखने लायक होता है.
राजा रवि वर्मा को भारत का प्राचीन और सबसे उत्कृष्ट चित्रकार माना जाता है. आज देवी-देवताओं के जिन पौराणिक स्वरूपों को हम इतने सहज तरीके से कागज पर जीवंत हुए देखते हैं, इसका पहला प्रयास उन्होंने ही किया था. प्रख्यात चित्र देवी सरस्वती उन्होंने तकरीबन 1896 में बनाया था, लेकिन यह इतना आसान नहीं था.
नारीवाद के लिए चित्रकला एक क्रांतिकारी मीडियम रहा है और इसने रंगों के सहारे पितृसत्तात्मक समाज की जटिल संरचनाओं को चुनौती दी. ऐसा नहीं है कि सिर्फ आधुनिक समाज में ही स्त्री परक विषय को खुलकर जगह मिली है, बल्कि सुविख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा भी जब 150 साल पहले भारतीय चित्रकला की नई पौध तैयार कर रहे थे, तब भी उन्होंने स्त्री रूपकों को सहजता के साथ अपनी रंगत दी है.
द स्टेनलेस गैलरी में 22 फरवरी से 25 फरवरी 2025 तक 'क्रोमालॉग: कलर्स एंड कन्वर्सेशंस' कला प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है. 'द आर्ट एक्सचेंज प्रोजेक्ट' की ओर से आयोजित इस सातवें सामूहिक प्रदर्शन में 15 कलाकारों की कृतियां प्रदर्शित की जा रही हैं.