पौराणिक कथाओं में एक राक्षस का जिक्र है जिसका नाम था अपस्मार है. यह बौना है, लेकिन है काफी शक्तिशाली. हिंदू प्रतीकवाद में इस बौने को अक्सर एक नाग को पकड़े हुए दिखाया जाता है, जो शैव परंपरा में अहंकार (अहंकार) का प्रतीक है. यह बौना राक्षस शिव के पैरों में हैं. शिव पुराण और स्कंद पुराण में इस कथा का जिक्र है, शिव ने अहंकार के प्रतीक इस राक्षस को हराकर इस पर नियंत्रण स्थापित किया था, वह भी एक सबसे प्राचीन नृत्य के जरिए. सवाल ये है कि इस नृत्य के तार मेडिकल साइंस से कैसे जुड़ते हैं और क्या है इसका अर्थ?
ब्रह्नांड की कॉस्मिक पॉवर का स्वरूप है नटराज
नटराज स्वरूप सिर्फ नृत्य कला का सबसे सुंदर और प्राचीन मूर्तिकला का ही खूबसूरत नमूना नहीं है. यह ब्रह्मांड की कॉस्मिक पॉवर का आंखों से देखा जा सकने वाला हाल है. गहरी आध्यात्मिक और दार्शनिक समझ देने वाली ये कला ऐसी है जो आगे चलकर हर कला और दर्शन की जननी बन गई. भगवान शिव के इस रूप में हर तत्व एक विशेष अर्थ रखता है विशेष रूप से, उनके चरणों के नीचे दबा हुआ बौना राक्षस अपस्मार (जिसे मुइयालक भी कहा जाता है) अज्ञान और अहंकार का प्रतीक है.
दार्शनिक ऑल्डस हक्सले ने की है नटराज स्वरूप की व्याख्या
इस स्वरूप का जितना आभारी भारतीय दर्शन शास्त्र है, उससे कहीं अधिक इसके मुरीद विदेशी सभ्यता के लोग रहे हैं. अंग्रेजी लेखक और दार्शनिक ऑल्डस हक्सले ने अपने उपन्यास 'आइलैंड' में नटराज और अपस्मार के प्रतीकवाद की व्याख्या की है. उनके अनुसार, नटराज का दायां पैर एक छोटे, लेकिन शक्तिशाली राक्षस अपस्मार पर रखा हुआ है. यह राक्षस अज्ञान और स्वार्थ का प्रतीक है. शिव इसे कुचलकर यह दर्शाते हैं कि ज्ञान और सच्चाई की विजय होती है.
लेकिन हक्सले ध्यान दिलाते हैं कि नटराज का इशारा उस पैर की ओर नहीं है, जो अपस्मार को दबा रहा है, बल्कि उस पैर की ओर है, जिसे वे नृत्य करते हुए उठा रहे हैं. यह उठा हुआ पैर मोक्ष और मुक्ति का प्रतीक है. यह दर्शाता है कि अज्ञान को कुचलने के बाद ही व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति और मुक्ति प्राप्त कर सकता है.
आयुर्वेद में अपस्मार की व्याख्या
आयुर्वेद में अपस्मार एक गंभीर मानसिक और तंत्रिका संबंधी विकारों के लिए प्रयुक्त शब्द है. मेडिकल साइंस में इसे मिर्गी या फिर दौरे पड़ने जैसी बीमारी के तौर पर देखा जाता है. दौरा पड़ना या मिर्गी आना बीमारी की ऐसी ही अवस्था है, जिसमें दिमाग सोचना-समझना बंद कर देता है. आयुर्वेदाचार महर्षि चरक के अनुसार, अपस्मार के चार प्रकार होते हैं:
वातज अपस्मार – वात दोष के असंतुलन से उत्पन्न होता है.
पित्तज अपस्मार – पित्त दोष की अधिकता के कारण होता है.
कफज अपस्मार – कफ के बढ़ने से मानसिक भ्रम उत्पन्न होता है.
सन्निपातज अपस्मार – जब वात, पित्त और कफ तीनों दोष असंतुलित हो जाते हैं, तब यह गंभीर स्थिति बनती है.
इनका संबंध मिर्गी, याददाश्त की समस्या और मानसिक विकारों से जोड़ा जाता है. चरक ने इन वर्गों को शरीर के दोषों के अनुसार बांटा, ताकि उनके उपचार की सही विधि खोजी जा सके.
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नृत्य सिर्फ आनंद के लिए नहीं बल्कि यह एक उपचार भी
नटराज की नृत्य मुद्रा (Final Pose) और इसकी मूर्ति केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक और वैज्ञानिक तथ्यों से भी जुड़ी हुई है. ऑल्डस हक्सले ने इसे आत्मज्ञान और मुक्ति से जोड़ा है, जबकि आयुर्वेद में इसे मानसिक और तंत्रिका संबंधी विकारों के प्रतीक के रूप में देखा है. यह समझ हमें बताती है कि नटराज की मूर्ति न केवल आध्यात्मिक ज्ञान, बल्कि जीवन के गहरे सच को भी दर्शाती है. यह सिर्फ आनंद के लिए किया गया नृत्य नहीं है, बल्कि हमें परंपरा के रूप में मिली एक बड़ी प्राचीन सौगात है.