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कैसे हुई पेंटिंग की शुरुआत? मंदिरों की दीवारों से लेकर पुराण कथाओं में किरदार की तरह शामिल रही है चित्रकला

जिस तरह प्राचीन भारत में अन्य कलाओं (नाट्य, गीत-संगीत, लेखन) का विकास हुआ है चित्रकला का विकास भी इनके साथ ही साथ हुआ है. पुराण कथाओं में कहानियों के सहारे कहीं न कहीं इस कला का होने वाला जिक्र इसकी मौजूदगी की कहानी कहता है. कई कथाएं तो ऐसी रही हैं कि जिनमें चित्रकला एक किरदार की तरह शामिल हुई है और इसने कहानियों को आगे बढ़ाया है.

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भारत में चित्रकला की शुरुआत का इतिहास बहुत प्राचीन है, ये चित्र 16वीं सदी में बनाई गई मंडी कलम शैली का एक नमूना है
भारत में चित्रकला की शुरुआत का इतिहास बहुत प्राचीन है, ये चित्र 16वीं सदी में बनाई गई मंडी कलम शैली का एक नमूना है

चित्रकला, पेंटिंग, पोट्रेट, लैंडस्केप... शब्द तो कई हैं, लेकिन क्या आपके दिमाग में ये सवाल आता है कि इनकी शुरुआत कहां से हुई होगी. इंसानी दिमाग ने पहली बार कब किसी दृश्य को देखकर उसकी नकल बनाई होगी? पहला चित्र कौन सा बना होगा? इन सवालों का कोई सटीक जवाब नहीं है, लेकिन खोजे गए प्राचीन मंदिरों-गुफाओं और शिलालेखों में कहीं आड़ी-तिरछी तो कहीं गोलाकार, कहीं संकेतक के रूप में तो कहीं भित्तियों की तरह चित्रों की मौजूदगी है और यही मौजूदगी चित्रकला की पहली निशानी है.

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नदी घाटी सभ्यता से अजंता की गुफाओं तक बिखरे हैं निशान
सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर, अजंता-एलोरा की गुफाओं और दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर चित्रकला की प्राचीन निशानियां देखी जा सकती हैं. इनकी प्राचीनता 3000 से 5000 साल पुरानी तक मानी जाती है, लेकिन फिर भी ये उस सवाल का सटीक जवाब नहीं है कि पहला चित्र कब बनाया गया होगा.

खैर, जिस तरह प्राचीन भारत में अन्य कलाओं (नाट्य, गीत-संगीत, लेखन) का विकास हुआ है चित्रकला का विकास भी इनके साथ ही हुआ है. पुराण कथाओं में कहानियों के सहारे कहीं न कहीं इस कला का होने वाला जिक्र इसकी मौजूदगी की कहानी कहता है. कई कथाएं तो ऐसी रही हैं कि जिनमें चित्रकला एक किरदार की तरह शामिल हुई है और इसने कहानियों को आगे बढ़ाया है.

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पेंटिंग
बाएं से पहला चित्र मधुबनी शैली में है, जो अपने आप में हजारों साल का इतिहास समेटे है, दाएं ऊपर द्रौपदी चीर हरण की पेंटिंग है, जिसे 1922 में एमवी धुरंधर ने बनाया था, तीसरी पेंटिंग (नागमाता मनसा) प्रख्यात चित्रकार जैमिनी रॉय की है.

ऋषि नर-नारायण की कथा और चित्रकला

प्राचीन काल में ऋषि नर और नारायण से जुड़ी एक पौराणिक कथा है- दोनों ही ऋषि हिमालय की कंदराओं में कई हजार वर्षों से कठिन तप कर रहे थे. इंद्र ने इनका तप भंग करने के लिए स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सराओं रंभा, मेनका और तिलोत्तमा को भेजा. तीनों ही अप्सराएं मादक नृत्य करके उनकी तपस्या भंग करने की कोशिश करने लगीं.

अप्सराओं को इस तरह की कोशिश करते देखकर ऋषि नारायण ने अपनी जांघ पर उंगली फेरकर स्त्री आकृति बनाई तो वहां से नृत्य करती एक सुंदर नवयौवना प्रकट हो गई. जांघ यानी उरु से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम उर्वशी पड़ा. उर्वशी का रूप और सौंदर्य इतना मादक था कि इंद्र की भेजी गईं तीनों अप्सराएं शर्म से पानी-पानी हो गईं. नारायण ऋषि का जांघ पर उंगली फिराकर आकृति बनाना एक तरह से चित्र बनाने जैसी ही गतिविधि थी, जो कि साकार हो उठी थी.

ऊषा और अनिरुद्ध के विवाह की कथा
इस पौराणिक कथा में स्पष्ट रूप से चित्र बनाने की कला का जिक्र होता दिखाई देता है. इसी तरह का एक और वाकया द्वापरयुग में भी सामने आता है. बाणासुर की बेटी ऊषा सपने में अनिरुद्ध (श्रीकृष्ण का पोता) को देखती है और उसे अनिरुद्ध से प्रेम हो जाता है. ऊषा की एक अंतरंग सखी थी, चित्रलेखा जो चित्रकला में माहिर थी और योगविद्या भी जानती थी.

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ऊषा ने चित्रलेखा को सपने में देखे गए युवक का हुलिया बताया और उसका चित्र बनवाया. चित्रलेखा ने चित्र बनाकर स्पष्ट किया कि यह किसी यदुवंशी राजकुमार का ही चित्र है. आगे की कथा ये है कि चित्रलेखा, अनिरुद्ध का अपहरण करके ऊषा के पास ले आती है. बाद में इसी वजह से श्रीकृष्ण और बाणासुर के बीच युद्ध होता है. बाणासुर की हार होती है और फिर ऊषा और अनिरुद्ध का विवाह हो जाता है.

पांडवों के मायामहल में थी रोचक चित्रकारियां
महाभारत में पांडवों के माया महल का वर्णन आया है. पांडवों की नई राजधानी इंद्रप्रस्थ में बना ये माया महल अपने आप में अनोखा था. यहां जो दिखता था, असल में वह वास्तविक नहीं था. तमाम तरह के रहस्यमय शिल्प, अनोखी और आश्चर्य में डालने वाली मूर्तियां, बड़े-बड़े भव्य भूल भुलैया वाले रास्ते इस महल में थे. उन रास्तों पर ऐसी चित्रकारी थी कि एक बार को लगता था कि द्वार यहां है, पर पता चलता था कि वह सिर्फ दीवार पर द्वार की चित्रकारी है.

दुर्योधन जब इस माया महल में घूम रहा था, तब इसी भ्रम में उसका सिर कई बार दीवार टकराया था. चित्रकला का ऐसा अद्भुत नमूना देखकर वह आश्चर्य में था. इसी दौरान उससे फर्श और जलाशय में फर्क करने में गलती हो गई और वह पानी के बड़े टैंक में गिर पड़ा. यहीं द्रौपदी ने उसका मजाक उड़ाते हुए, उसे 'अंधे का पुत्र अंधा' कह दिया था, जो मजाक आगे चलकर महाभारत युद्ध का बड़ा कारण बना.    

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विष्णुधर्मोत्तर पुराण में चित्रकला का है विस्तार से वर्णन
चित्रकला की प्राचीनता और उसके मर्म को समझाने के लिए सनातन संस्कृति में इस कला पर समर्पित एक पुराण का जिक्र भी होता है. इसे विष्णुधर्मोत्तर पुराण का नाम दिया गया है. यह एक उपपुराण है और इसके 'चित्रसूत्र' नामक अध्याय में चित्रकला का महत्त्व इन शब्दों में बताया गया है,

कलानां प्रवरं चित्रम् धर्मार्थ काम मोक्षादं.
मांगल्य प्रथम् दोतद् गृहे यत्र प्रतिष्ठितम् ॥38॥[1]

अर्थ: कलाओं में चित्रकला सबसे ऊंची है जिससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसलिए जहां चित्रों को प्रतिष्ठा मिलती है, वहां मंगल ही मंगल होता है.

मौजूदा दौर में इस ग्रंथ के तीन खंड मिलते हैं. पहले खंड में 269 अध्याय हैं, दूसरे खंड में 183 अध्याय और तीसरे खंड में 355 अध्याय हैं. पहले खंड में पुराणों की ही तरह कुछ पौराणिक कथाओं का वर्णन है, दूसरे खंड में राजनीति, आश्रम, ज्योतिष, औषधि विज्ञान शामिल है और तीसरे खंड में संस्कृत व्याकरण, शब्दकोष, छन्दशास्त्र, काव्यशास्त्र के साथ-साथ नृत्य और संगीत आदि ललित कलायें, वास्तु, ललित शिल्प-कलाओं का भी ज्ञान शामिल है.

इंडोनेशिया में हाल ही मिली में 51,200 साल पुरानी पेंटिंग, इसमें एक सूकर के शिकार का चित्रण है. ये रॉक आर्ट का सबसे प्राचीन नमूना है. कला-संस्कृति के मामले में भारत और इंडोनेशिया की साझी विरासत है
इंडोनेशिया में बीते साल खोजी गई 51,200 साल पुरानी पेंटिंग

पहली शताब्दी से ही मिलते हैं उन्नत चित्रकलाओं के उदाहरण
भारत में चित्रकला का इतिहास कहां से शुरू होता है और इसकी जड़ें कहां तक जाती हैं, कह नहीं सकते. पाषाण काल में ही मानव ने गुफा चित्रण करना शुरू कर दिया था. होशंगाबाद और भीमबेटका क्षेत्रों में कंदराओं और गुफाओं में मानव चित्रण के प्रमाण मिले हैं. इन चित्रों में शिकार, शिकार करते मानव समूहों, स्त्रियों तथा पशु-पक्षियों आदि के चित्र मिले हैं. अजंता की गुफाओं में की गई चित्रकारी कई शताब्दियों में तैयार हुई थी, इसकी सबसे प्राचीन चित्रकारी ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी की हैं, इन चित्रों में भगवान बुद्ध को विभिन्न रूपों में दर्शाया गया है. अभी बीते ही साल इंडोनेशिया में 51,200 साल पुरानी पेंटिंग की खोज हुई थी, जिसमें एक सूकर के शिकार का चित्रण है.ये रॉक आर्ट का सबसे प्राचीन नमूना है. कला-संस्कृति के मामले में भारत और इंडोनेशिया की साझी विरासत है.

कुल मिलाकर बात यह है कि ये चित्रकला का इतिहास नहीं है, लेकिन उसकी शुरुआत कहां और कैसे हुई इसका एक अनुमानित विवरण है. चित्र एक शब्द रहित कविता है. यह किसी विषय की कागज पर उकेरी गई व्याख्या है. यह मन के भावों को बिना किसी शब्द की सहायता के प्रकट कर देने का माध्यम है. मानव के क्रमिक विकास में चित्र ही वह जरिया बने हैं, जिसके सहारे आदि मानव सदियों और युगों की यात्रा कर सका है. मनुष्य ने धरती पर जब जीवन शुरू किया होगा तो क्या-क्या झेला होगा, गुफाओं और खुदाइयों में मिलने वाले अबूझ चित्र शायद यही बताने की कोशिश कर रहे होंगे.

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