scorecardresearch
 

बारिश और विद्रोह का गीत... देवी दुर्गा के नाम पर पड़ा संगीत के इस राग का नाम, शृंगार और अध्यात्म का अनूठा संगम

राग दुर्गा की उत्पत्ति को लेकर संगीतज्ञों और इतिहासकारों में मतभेद है. कुछ का मानना है कि यह राग हाल के दिनों में उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा विकसित किया गया हो सकता है, जबकि अन्य इसे प्राचीन मानते हैं, क्योंकि यह कई अन्य हिंदुस्तानी रागों से संबंधित है. दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत में इसे "शुद्ध सावेरी" के नाम से जाना जाता है.

Advertisement
X
देवी दुर्गा के नाम पर है शास्त्रीय संगीत का राग दुर्गा
देवी दुर्गा के नाम पर है शास्त्रीय संगीत का राग दुर्गा

भारत की शास्त्रीय संगीत की परंपरा अध्यात्म के समानांतर ही चलती रही है. इसका उदाहरण संगीत में रागों और रागिनियों के नामकरण में भी दिखाई देता है. जहां कई रागों के नाम देवी दुर्गा के स्वरूपों के आधार पर तय किए गए हैं. उन रागों की प्रकृति और उनके गायन का तरीका ठीक वैसा ही है, जैसा पुराणों में देवियों के स्वरूपों का वर्णन है. शास्त्रीय परंपरा में ऐसा ही एक राग है, राग दुर्गा. देवी दुर्गा के ही नाम पर यह राग उनके ही दैवीय गुणों को स्वर लहरियों में सामने रखता है. 

Advertisement

ब्रह्नमवैवर्त पुराण में एक कथा आती है. त्रिपुर का विनाश करने के लिए बढ़ रहे महादेव शिव के मार्ग में अचानक ही कुछ बाधा आने लगती है. त्रिपुर के विनाश की शर्त भी बहुत कठिन थी. उसका अंत सिर्फ एक विशेष खगोलीय स्थिति में हो सकता था, जो कि 1000 साल में एक बार सिर्फ कुछ घटी के मुहूर्त में आ सकती थी. इस बाधा और विघ्न से बचने के लिए और त्रिपुर का विनाश कर त्रिपुरासुर पर विजय पाने के लिए महादेव शिव ने देवी त्रिपुर सुंदरी की स्तुति की.

देवी त्रिपुर सुंदरी कोई और नहीं, बल्कि देवी दुर्गा का ही विराट स्वरूप है. तब महादेव शिव ने श्री दुर्गा स्त्रोत रचा और इससे उनकी स्तुति की. इस स्त्रोत में वह देवी को एक जगह 'ब्रह्मस्वरूपा' कहते हैं.

शिव कृत दुर्गा स्तोत्र

Advertisement

रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि,
मां भक्तमनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि ॥

विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि।
ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणि ॥

त्वं च ब्रह्मादिदेवानामम्बिके जगदम्बिके,
त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात् ॥

महादेव शिव ने की देवी दुर्गा की स्तुति
महादेव शिव ने विनम्र लेकिन जिस ओजपूर्ण स्वरलहरी में देवी दुर्गा की स्तुति की, सामवेद में उनका वर्णन राग दुर्गा नाम से ही है. भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा है, बल्कि यह अध्यात्म की राह की ओर ले जाने में सक्षम एक अनूठा माध्यम है, जो राग आधारित है. सामवेद में संगीत शास्त्र के साथ रागों का विशेष वर्णन है. असल में ऋग्वेद और यजुर्वेद की ऋचाओं को किस तरह स्वर में गाकर प्रस्तुत किया जाए, सामवेद इसी ज्ञान का भंडार है.

राग दुर्गा

वर्षाकाल है राग दुर्गा का खास समय
हर राग का अपना एक समय है, ऋतु है, उसका आयाम है, ताल पद्धति है और उसके गाने का तरीका है. देवी दुर्गा की आध्यात्मिक शक्ति को अपने में समाहित करने वाला 'राग दुर्गा' विशेष ही है, जिसमें तंत्र की शक्ति, मंत्र का ओज और भक्ति के साथ शृंगार का पक्ष भी शामिल है. राग दुर्गा न केवल अपनी मधुरता और सादगी के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक गहराई के लिए भी प्रसिद्ध है.

Advertisement

राग दुर्गा की उत्पत्ति को लेकर संगीतज्ञों और इतिहासकारों में मतभेद है. कुछ का मानना है कि यह राग हाल के दिनों में उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों द्वारा विकसित किया गया हो सकता है, जबकि अन्य इसे प्राचीन मानते हैं, क्योंकि यह कई अन्य हिंदुस्तानी रागों से संबंधित है. दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत में इसे "शुद्ध सावेरी" के नाम से जाना जाता है. यह एक पंचम स्वरों वाला राग है, जो मध्य और तार सप्तक में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है. यह राग मध्य सप्तक में तो अभूतपूर्व तरीके से खिलकर सामने आता है.

देवी दुर्गा से ही लिया गया है राग दुर्गा का नाम
राग दुर्गा का नाम देवी पार्वती या अंबा से लिया गया है, जो भगवान शिव की पत्नी हैं और "मां दुर्गा" के रूप में पूजी जाती हैं. हिंदू धर्म में मां दुर्गा को शक्ति, धैर्य और निडरता का प्रतीक माना जाता है. "दुर्गा" शब्द का अर्थ है "अप्राप्य" या "अभेद्य". पौराणिक कथाओं के अनुसार, दुर्गा को ब्रह्मा, विष्णु, शिव और अन्य देवताओं ने मिलकर महिषासुर नाम के एक अहंकारी-शक्तिशाली राक्षस को परास्त करने के लिए अपनी-अपनी दैव शक्तियों से प्रकट किया था.

मां दुर्गा को आमतौर पर शेर की सवारी करते हुए और आठ या दस भुजाओं के साथ चित्रित किया जाता है, जिनमें प्रत्येक हाथ में एक देवता द्वारा दिया गया विशेष हथियार होता है. यह चित्रण उनकी अपार शक्ति और दुष्टों पर विजय का प्रतीक है. राग दुर्गा इसी शक्ति और साहस का संगीतमय रूप माना जाता है.

Advertisement

शास्त्रीय संगीत परंपरा में राग दुर्गा को रात के दूसरे प्रहर (9 बजे से आधी रात तक) में गाने की सलाह दी जाती है. हालांकि, यह कभी भी गाया जा सकता है. इसकी संरचना में एक योद्धा देवी की छवि झलकती है, जो अंधेरे को परास्त कर प्रेम और आनंद से घावों को भर देती है. राग दुर्गा में दिव्य आनंद और सुरक्षा की शक्ति है.

राग दुर्गा

औडव जाति का राग है दुर्गा

राग दुर्गा एक पेंटाटोनिक राग (औडव जाति) है, जिसमें केवल पांच स्वरों का प्रयोग होता है. इसकी संरचना में सा, रे, म, प, ध जैसे स्वर शामिल हैं, जो इसे बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली बनाते हैं. संगीत विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी मूल संरचना इतनी सार्वभौमिक है कि इसके समान पैमाने विश्व के विभिन्न संगीत परंपराओं में देखे जा सकते हैं. यह संभवतः इसकी प्राचीनता और स्वतंत्र विकास का प्रमाण है. कर्नाटक संगीत में "शुद्ध सावेरी" के रूप में इसका अस्तित्व इस बात का सबूत है कि यह राग उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत परंपराओं को जोड़ने वाली कड़ी है. इसकी मध्यम और ऊपरी सप्तक में गहराई और आत्मविश्वास इसे एक अनूठा रंग प्रदान करता है.

अभी हाल ही में फेमस वेब सिरीज बंदिश बैंडिट्स में एक गीत शामिल किया गया था, जो कि विशुद्ध शास्त्रीय राग माला में आधारित था.

Advertisement

बंदिश: "सखी मोरी रुम झुम"

स्थाई:

| स्वर:       | सा  रे  | म   म   | ध   ध  | सां    |

| ताल:       | 1   2   | 3   4   | 5   6  | 7   8  |

| बोल:       | सखी    | मोरी    | रुम    | झुम    |

| स्वर:       | सां ध   | म   रे  | सा     | -      |

| ताल:       | 9   10  | 11  12  | 13  14 | 15  16 |

| बोल:       | बरसन   | लागी   | रे     | -      |

अंतरा:

| स्वर:       | म   म   | ध   सां | ध   म   | रे  सा  |

| ताल:       | 1   2   | 3   4   | 5   6   | 7   8   |

| बोल:       | सावन   | की      | रुत    | आई     |

ये बंदिश तकरीबन 550 साल पुरानी है. राग दुर्गा की इस बंदिश में सावन और वर्षा ऋतु का वर्णन शामिल है. बता दें कि, राग दुर्गा ख्याल अंग का राग है, और यह बंदिश छोटे ख्याल में है. राग दुर्गा बिलावल थाट से उत्पन्न होता है और इसमें पंचम (प) वर्जित होता है. ये बंदिश तीन ताल के साथ गाई जाती है.

Advertisement

आरोह: सा रे म ध सां

अवरोह: सां ध म रे सा

वादी: म (मध्य)

संवादी: सा (षड्ज)

गीत में क्यों है सावन का वर्णन?

गीत में सावन का वर्णन इसलिए है, क्योंकि एक बार देवी ने एक असुर के प्रभाव को खत्म करने के लिए खुद ही वर्षा का रूप धारण किया था और अकाल वाली जमीन पर जल बनकर बरसी थीं. देवी का यह स्वरूप न सिर्फ मनोरम था, बल्कि यह एक तरीके से अत्याचार के खिलाफ उनकी तरफ से किया गया एक विद्रोह भी था. यही वजह है कि राग दुर्गा में कोमलता और लालित्य होने के बावजूद एक विद्रोह का स्वर भी शामिल होता था.

Live TV

Advertisement
Advertisement