महंगे पेट्रोल-डीजल ने इलेक्ट्रिक वाहनों के खरीदारों की संख्या में तेज इजाफा किया है. ERNST & YOUNG के एक सर्वे में दावा किया गया है कि अब 90 फीसदी भारतीय इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए ज्यादा कीमत तक देने को तैयार हैं. पर्यावरण की सेहत का ख्याल भी ई-वाहनों को खरीदने की बड़ी वजह है. (Photo: Getty Images)
इलेक्ट्रिक वाहनों का आगाज भारत में काफी देरी से हुआ है. इस साल केंद्र सरकार ने FAME-2 स्कीम में सब्सिडी का ऐलान किया तो कुछ राज्यों ने अलग से सब्सिडी देने की घोषणा कर इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीदारों की राह को और आसान बना दिया. (Photo: Getty Images)
इन रियायतों के बावजूद भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर इतना मजबूत नहीं है कि लोग भारी छूट के बावजूद इन्हें खरीदने का फैसला करेंगे. कंसल्टेंसी फर्म EY के सर्वे के मुताबिक इन दिक्कतों के होते हुए भी इलेक्ट्रिक वाहनों को खरीदने के लिए भारतीय कीमत से ज्यादा रकम चुकाने को तैयार हैं. (Photo: Getty Images)
सर्वे का दावा है कि भारत में 90 फीसदी लोग ज्यादा रकम देकर भी इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीदना चाहते हैं. 40 फीसदी लोग तो इलेक्ट्रिक व्हीकल के लिए 20 फीसदी तक का प्रीमियम चुकाने को तैयार हैं. 10 में से 3 भारतीय इलेक्ट्रिक या हाइड्रोजन से चलने वाली कार खरीदना चाहते हैं. (Photo: Getty Images)
दरअसल, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम लोगों के लिए परेशानी बनते जा रहे हैं. ऐसे में इलेक्ट्रिक व्हीकल लोगों को एक मजबूत सहारा नजर आ रहा है. सर्वे के मुताबिक इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री अगले साल तक ग्लोबल लेवल पर बढ़ने की उम्मीद है. लेकिन इसके लिए कंपनियों को ग्राहकों की पसंद और जरुरत का भी ख्याल रखना होगा. (Photo: Getty Images)
सर्वे में कहा गया है कि भारत के ज्यादातर लोगों को ऐसा इलेक्ट्रिक वाहन चाहिए जो फुल चार्ज करने पर करीब 160 किलोमीटर से 320 किलोमीटर तक चल सके. सर्वे के मुताबिक लोग पर्यावरण के लिए भी जागरूक हुए हैं. EV खरीदने की सबसे बड़ी वजह भी लोगों की सोच में पर्यावरण को लेकर हुआ बदला है.
EV खरीदने की इच्छा जताने वाले 67 फीसदी लोगों को यह लगता है कि उन्हें अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए जिससे पेट्रोल-डीजल गाड़ी की वजह से जो प्रदूषण होता है उसे रोका जा सके. 69 फीसदी को लगता है कि ईवी खरीदकर वो पर्यावरण का ख्याल रखने की अपनी सोच को धरातल पर उतार सकते हैं.
पर्यावरण के लिए लोगों को जागरुक बनाने में लगीं सामाजिक संस्थाएं इस बदलाव से काफी खुश हैं. उनका मानना है कि उनकी मेहनत को ये सर्वे सफल साबित कर रहा है. कंसल्टेंसी फर्म EY के इस सर्वे में 13 देशों के 9 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था. इसमें भारत के एक हजार लोगों ने हिस्सा लिया. (Photo: Getty Images)
(रिपोर्ट: आदित्य के राणा)