
देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर सरकार की ओर से किए गए कई ऐलान के बाद भी अधिकतर लोग पेट्रोल या डीजल गाड़ियों को ही तरजीह दे रहे हैं. इसकी वजह इन दोनों किस्म के वाहनों की कीमत में बड़ा अंतर होना है. हाल में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने संसद में कहा कि अगले दो साल में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की कीमत पेट्रोल-डीजल गाड़ियों के बराबर होगी. लेकिन इससे जुड़े ये 5 सवाल बेहद अहम हैं...
ऑटो कंपनियों के लिए चुनौती
भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों के अभी 5 से 6 मॉडल ही ज्यादा बिक रहे हैं. इसमें भी सबसे ज्यादा पॉपुलर मॉडल Tata Nexon EV है. ऐसे में अगर लोगों के बीच इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लोकप्रिय बनाना है तो उन्हें ज्यादा इनके ज्यादा विकल्प उपलब्ध कराने होंगे. इसके लिए ऑटो कंपनियों के सामने बड़े निवेश का जोखिम होगा. हालांकि केंद्र सरकार की फेम-2 सब्सिडी और राज्य सरकारों की इलेक्ट्रिक व्हीकल नीतियों ने इनकी सेल में थोड़ा सुधार किया है.
बीते साल सिर्फ 0.8% ही बिक्री
दिसंबर 2021 तक देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सेल कुल गाड़ियों की बिक्री का महज 0.8% रही है. यानी अभी भी 99% गाड़ियां पेट्रोल-डीजल की ही बिक रही हैं. ऐसे में ऑटो कंपनियों के लिए एकदम से पेट्रोल-डीजल गाड़ियों की जगह इलेक्ट्रिक व्हीकल पर निवेश करना एक बड़ी चुनौती होगी. मॉर्डर इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के हिसाब से अगर हम ऑटो कंपनियों के प्लान देखें तो Tata Motors ने 2023 तक 50,000 इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सालाना सेल का टारगेट रखा है और इसे 2025 तक बढ़ाकर 1.5 लाख यूनिट करने का लक्ष्य है. Hyundai Motor India ने 4000 करोड़ रुपये के निवेश से 2028 तक 6 इलेक्ट्रिक गाड़ियां लॉन्च करने का प्लान बनाया है. तो Mahindra & Mahindra ने भी 2027 तक 16 इलेक्ट्रिक व्हीकल मार्केट में लाने का प्लान किया है.
चार्जिंग स्टेशनों की कमी
देश में इलेक्ट्रिक व्हीकल को लेकर लोगों का रूझान बढ़े, इसके लिए EV Infrastructure में सुधार होना बहुत जरूरी है. e-amrit Portal के दिसंबर 2021 तक के आंकड़ों को देखें तो देश में महज 1800 पब्लिक चार्जर ही अभी काम कर रहे हैं. जबकि पोर्टल के मुताबिक भारी उद्योग मंत्रालय अभी तक 2,636 चार्जिंग स्टेशन का आवंटन कर चुका है. हालांकि इस बार के बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने बैटरी स्वैपिंग के लिए अलग नीति लाने और चार्जिंग स्टेशन की जगह स्वैपिंग को बढ़ावा देने की बात कही है.
नितिन गडकरी ने कुछ वक्त पहले कहा था कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों की कीमत ज्यादा होने की वजह बैटरी की कीमत ज्यादा होना है. सरकार इसे लगातार कम करने की कोशिश कर रही है. इसके लिए लीथियम बैटरी की कुल जरूरत का 81 फीसदी उत्पादन स्थानीय स्तर पर हो रहा है. उन्होंने कहा कि कैसे सस्ती बैटरी उपलब्ध हो, इस पर भी रिसर्च जारी है. साथ ही देश में बैटरी के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए सरकार ने 18,100 करोड़ रुपये की PLI Scheme भी लॉन्च की है. हालांकि इसके लाभ सामने आने में अभी वक्त लगेगा.
ग्राहकों में विश्वास की कमी
लोगों के बीच इलेक्ट्रिक गाड़ियों के कम पॉपुलर होने की एक बड़ी वजह इसे लेकर विश्वास की कमी होना है. लोगों के बीच इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर उनकी रेंज या माइलेज, वारंटी, री-सेल वैल्यू, ड्यूरेबिलिटी और सुरक्षित होने से जुड़ी कई आशंकाएं हैं. हालांकि ऑटो कंपनियां और सरकार अलग-अलग तरीके से इलेक्ट्रिक व्हीकल से जुड़े मिथ तोड़ने में लगी हैं. लेकिन अभी मार्केट में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का शेयर बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है. ग्राहकों के विश्वास की कमी की बड़ी वजह इसका इन्फ्रास्ट्रक्चर कमजोर होना भी है.
छोटे शहरों में इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं होना
इलेक्ट्रिक गाड़ियों की खरीद बढ़ाने के लिए सरकार को छोटे शहरों में इसके इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर देना होगा. अगर हम अभी सरकार की कोशिशों को देखें तो देश के चुनिंदा शहरों में ही इलेक्ट्रिक व्हीकल और इलेक्ट्रिक चार्जिंग स्टेशन बनाने पर जोर है. ई-अमृत पोर्टल के मुताबिक इसमें दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, चेन्नई, कोलकाता, चंडीगढ़ और नागपुर जैसे शहर ही प्रमुख हैं. भारी उद्योग मंत्रालय ने जो 2636 चार्जिंग स्टेशन आवंटित किए हैं वो भी देश के सिर्फ 62 शहरों के लिए सीमित हैं. ऐसे में दिल्ली से मेरठ की यात्रा करने वाला इंसान इलेक्ट्रिक व्हीकल खरीदना पसंद नहीं करेगा. पेट्रोल और डीजल के विकल्प के तौर पर सीएनजी बीते कई साल से मार्केट में है, लेकिन इसके ज्यादातर स्टेशन भी दिल्ली जैसे बड़े शहरों में ही देखने को मिलेंगे और इन स्टेशनों पर भी लंबी-लंबी लाइन लगती है. ज्यादा से ज्यादा लोग इलेक्ट्रिक गाड़ियां खरीदें, इसके लिए सरकार को पेट्रोल पंप की तरह गांव-गांव तक ईवी चार्जिंग स्टेशन तक पहुंचाना होगा.
पेट्रोल गाड़ियों का क्या होगा?
इन सब सवालों के बीच एक बड़ा सवाल ये भी है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों को अगर बढ़ावा मिलेगा तो पेट्रोल गाड़ियों का क्या होगा? हालांकि इसे लेकर नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) कई बार साफ कर चुके हैं कि वो पेट्रोल-डीजल गाड़ियों को बंद करने नहीं जा रहे हैं, बल्कि ये एक विकल्प की तरह उपलब्ध होंगी. लेकिन हम सरकार के हालिया कदमों को देखें तो कहीं ना कहीं सरकार पेट्रोल-डीजल गाड़ियों की बिक्री को हतोत्साहित करने की दिशा में काम कर रही है. जैसे पेट्रोल गाड़ियों के लिए 15 साल और डीजल की गाड़ियों के लिए 10 साल बाद फिटनेस टेस्ट कराना, पुरानी गाड़ियों के लिए स्क्रैप पॉलिसी लाना इत्यादि. इसी के साथ पेट्रोल-डीजल की अभी जो कीमतें हैं, उससे गाड़ी चलाने का खर्च बढ़ रहा है. पेट्रोल गाड़ी पर प्रति किमी जो खर्च 10 रुपये का है, इलेक्ट्रिक गाड़ी पर यही खर्च 1 रुपये प्रति किमी आता है.
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