
आज के समय में बिना एयर कंडिशन (AC) के कारों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. भयंकर गर्मी में बिना AC के कार में सफर करना बहुत ही मुश्किल है. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब कारों में एयर कंडिशन तो छोड़िए कवर बॉडी भी नहीं हुआ करता था. लेकिन वो दौर दूसरा था, क्योंकि उस वक्त न तो इतनी गर्मी थी और न ही लोगों ने एयर कंडिशन के मखमली हवा का आनंद अनुभव किया था.
19वीं सदी की शुरुआत में जब दुनिया भर में कारों का चलन बढ़ा उस वक्त खुली बॉडी वाली कारों का निर्माण होता है. इतनी भयंकर गर्मी भी नहीं थी कि, लोगों को कार में हर वक्त एयर कंडिशन (AC) की जरूरत पड़े. लेकिन समय के साथ बंद बॉडी वाली कारों ने बाजार में दस्तक दी. अब हवादार केबिन मैटेल शीट से ढक चुका था, जिससे कार के भीतर का वातावरण तेजी से गर्म हो जाता था. जिसके बाद इंजीनियरों को कार में भी एयर कंडिशन का इस्तेमाल करने के जरूरत महसूस होने लगी. इसके बाद जो हुआ वो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया और दुनिया में पहली बार एयर कंडिशन कार को पेश किया गया.
कैरियर कंपनी के संस्थापक विलिस कैरियर
दुनिया का पहला एयर कंडिशन:
कारों में AC के इस्तेमाल से पहले ये जानना भी जरूरी है कि एयर कंडिशन की शुरुआत कैसे हुई. 19वीं सदी के प्रारंभ में एयर कंडिशन दुनिया के लिए एक नया नाम था. ऐसी तकनीक पहली बार सामने आई थी, जिसकी मदद से हवा को ठंडा कर किसी कमरे या विशेष क्षेत्र के वातावरण को ठंडा किया जा सकता था. साल 1902 में अमेरिकी इंजिनियर विलिस हैविलैंड कैरियर (Willis Haviland Carrier) ने दुनिया का पहला मॉर्डन एयर कंडिशन का अविष्कार किया. साल 1915 में विलिस ने कैरियर कॉर्पोरेशन के नाम से एक कंपनी की स्थापना की. ये कंपनी हीटिंग, वेंटिलेशन और एयर कंडिशनिंग (HVAC) सिस्टम का निर्माण करती थी.
उस दौर में भी एयर कंडिशन का इस्तेमाल इतना आसान नहीं था. क्योंकि उस वक्त जो एयर कंडिशन बनाया गया था वो साइज में काफी बड़ा था. इसे किसी इमारत में लगाने के लिए एक कमरे जितनी जगह चाहिए होती थी. लेकिन बड़े दफ्तरों और बिल्डिंगों में एयर कंडिशन का प्रयोग शुरू हो चुका था.
अब चूंकि एयर कंडिशन से लोग रूबरू हो चुके थें. ऐसे में लोगों को कारों में भी एयर कंडिशन की जरूरत महसूस हुई. लेकिन किसी कार में एयर कंडिशन को इंस्टॉल करना एक बड़ी चुनौती थी. दुनिया भर में कई कार कंपनियां थीं जो अपने वाहन में AC को इंस्टॉल करने का प्रयास कर रही थीं लेकिन साइज, मैकेनिज़्म और जटिल ऑपरेशन के चलते सभी असफल थें.
जेम्स वार्ड पैकार्ड और उनके भाई विलियम.
एक तंज और बड़े ब्रांड की शुरुआत:
ये वो समय था जब दुनिया का ऑटो सेक्टर लगातार विकसित हो रहा था. कई इंजीनियर ऐसे थें जो कारों का निर्माण कर रहे थें. इसी बीच वॉरेन सिटी में कुछ ऐसा हुआ जिससे एक नए ब्रांड की नींव रखी गई. दरअसल, उस वक्त अमेरिका में स्कॉटिश इंजीनियर एलेक्जेंडर विंटन का कार ब्रांड विंटन मोटर कैरिज कंपनी काफी मशहूर हुआ करता था. उस समय ओहियो के रहने वाले जेम्स वार्ड पैकार्ड (James Ward Packard) ने विंटन ब्रांड की कार खरीदी थी. लेकिन वो इस कार के परफॉर्मेंस से नाखुश थें क्योंकि कार में आए दिन कोई न कोई तकनीकी खराबी सामने आती रहती थी.
इस बात की शिकायत उन्होनें खुद विंटन से की. जिसके बाद विंटन ने उन्हें एक बेहतर कार बनाने की चुनौती दे डाली. बताया जाता है कि विंटन ने कहा था कि, वो खुद के लिए अपनी नई कार बना लें जो उनके मन मुताबिक चले. पैकार्ड खुद एक मैकेनिक थें और उन्हें ये बात बेहद नागवार गुजरी. जिसका नतीजा ये रहा कि उन्होनें अपने भाई विलियम के साथ मिलकर ठीक वैसा ही किया जैसा विंटन ने कहा था और खुद की एक कार कंपनी की शुरुआत की.
ऑटोमोबाइल की दुनिया में चारों तरफ कुछ नया हो रहा था. मर्सिडीज बेंज, कैडिलैक और जनरल मोटर्स जैसी कंपनियां भी लगातार तकनीक रूप से खुद को मजबूतर करने में जुटी थीं. इस दौरान जेम्स ने भी 1899 में पैकार्ड मोटर कंपनी की स्थापना की और कारों का प्रोडक्शन शुरू किया. पैकार्ड ने साल 1956 तक एक से बढ़कर एक कई नए मॉडलों को बाजार में उतारा. जिसमें सेडान और हैचबैक भी शामिल थीं. उस समय पैकार्ड ने अमेरिकी बाजार में अपनी एक अलग पहचान बनाई और लग्ज़री कारों के मामले में ये ब्रांड सबसे बड़ा नाम बनकर उभरा.
पैकार्ड की पहली कार:
पैकार्ड मोटर कंपनी ने मॉडल ए (Model A) के तौर पर अपनी पहली कार का प्रोडक्शन 1889 में शुरू किया. उस वक्त कंपनी ने इस कार के केवल 5 यूनिट्स ही बनाए थें. जाहिर है कि तकनीकी और मशीनरी की कमी के चलते ज्यादातर काम हाथ से ही किया जाता था. ऐसे में कारों के प्रोडक्शन की स्पीड भी धीमी थी. कंपनी ने इस कार के सभी यूनिट्स को लेहाई यूनिवर्सिटी को डोनेट किया था.
दुनिया की पहली एयर कंडिशन कार:
पैकार्ड की शोहरत लगातार बढ़ रही थी उनकी कारें उस वक्त दुनिया भर में अपने लग्ज़री और पावरफुल परफॉर्मेंस के लिए जानी जाती थीं. लेकिन उनकी कारों में कुछ ऐसा था जिसकी कमी अभी भी उन्हें महसूस हो रही थी और वो थी एयर कंडिशन की. कई असफल प्रयासों के बाद आखिरकार पैकार्ड मोटर को सफलता हाथ लगी और साल 1939 में कंपनी ने अपने नए कार मॉडल में फैक्ट्री-इंस्टॉल एयर-कंडीशनिंग की पेशकश की.
ये दुनिया की पहली कार थी जिसमें एयर कंडिशन दिया जा रहा था. कंपनी ने अपनी कारों में वैकल्पिक रूप से एयर कंडीशनिंग यूनिट इंस्टॉल किया था. इस एयर कंडिशन यूनिट को बिशप और बैबकॉक नाम की दो कंपनियां कारों में इंस्टॉल करती थी. बताया जाता है कि, उस समय बिशप और बैबकॉक को तकरीबन 2000 कारों में एयर कंडिशन इंस्टॉल करने का ऑर्डर मिला था. शुरुआत में एयर कंडिशन से लैस कारों ने खूब सुर्खियां बटोरी लेकिन आगे चलकर तकनीक खामियों के चलते इनका प्रोडक्शन बंद करना पड़ा.
मुश्किल था इस्तेमाल:
पैकार्ड की एयर कंडीशनिंग कारों में AC का इस्तेमाल इतना आसान नहीं था. एयर कंडीशनर का इस्तेमाल करने के लिए इंजन को बंद करना पड़ता था. जब कार का केबिन पर्याप्त ठंडा हो जाता था तो उसके बाद ड्राइवर को कंप्रेसर बेल्ट को डिस्कनेक्ट करना पड़ता था. ये प्रक्रिया इतनी आसान और व्यवहारिक नहीं थी. इसको लेकर उस वक्त तमाम इंजीनियरों और चालकों ने सवाल भी उठाए थें.
अमेरिका की सड़कों पर पैकार्ड कार.
इन वजहों से बंद हुआ एयर कंडिशन कारों का प्रोडक्शन:
एयर कंडिशन कार की वापसी:
पैकार्ड के पैकअप के बाद साल 1953 में, मोटर वाहन उद्योग में एयर-कंडीशनिंग की फिर वापसी हुई, और लगभग 30,000 कारों में फ़ैक्टरी-फिटेड एयर कंडीशनिंग लगाई गई. जनरल मोटर्स के हैरिसन रेडिएटर डिवीज़न ने एक नया AC सिस्टम विकसित किया जिसे इंजन कम्पार्टमेंट में हुड के नीचे लगाया जा सकता था, जो कि एक बहुत ही नई बात थी. अगले दशक के दौरान, शेवरले, फ़ोर्ड, डॉज और प्लायमाउथ सहित अधिक से अधिक कार निर्माता एयर कंडीशनिंग को एक विकल्प के रूप में पेश करने लगें.
जैसे-जैसे एयर-कंडीशनिंग की मांग बढ़ती गई, एयर कंडिशन से लैस नई कारों का प्रोडक्शन भी बढ़ता गया. 1969 तक अमेरिका में बिकने वाली सभी नई कारों में से आधे से ज़्यादा एयर कंडीशनिंग से लैस थीं. लेकिन जब मांग बढ़ती रही, तो ऑटोमेकर मौजूदा सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए चुपचाप एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, इसे उपभोक्ताओं को लगातार बेहतर विकल्प मिलते रहें.
70 के दशक के दौरान, ओज़ोन की कमी की समस्या ने ऑटोमोबाइल एयर कंडीशनिंग की दिशा में एक नया डेवलपमेंट हुआ. R12 रेफ्रिजरेंट को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया और उसकी जगह R134a का इस्तेमाल किया जाने लगा. जिसके चलते कुछ नए कंपोनेंट्स को एयर कंडिशन सिस्टम में शामिल करने की जरूरत महसूस हुई और कार कंपनियों ने अपने मौजूदा AC सिस्टम में कंडेनसर, कंप्रेसर, ल्यूब्रिकेंट और डेसीकेंट को जोड़ा. इसके बाद रिसर्च में सामने आया है कि, कार ड्राइविंग के दौरान AC का इस्तेमाल करने पर माइलेज पर असर पड़ता है.