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बिहार में कैबिनेट विस्तार के बाद BJP '21', अब क्या करेंगे 'लाडला CM' नीतीश?

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का स्थान एक मशहूर पहेली की तरह है, जिसका जवाब है "लाडला". नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में हमेशा से सीएम पद के लिए लाडले रहे हैं. हाल ही में, सात नए मंत्री बीजेपी के कोटे से नीतीश सरकार में शामिल हुए. इस घटना ने बिहार की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दिया है, जहां जातीय और क्षेत्रीय अहम हैं. इस कैबिनेट विस्तार पर नीतिश कुमार का छोटा सा बयान भी काफी दिलचस्प है.

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नीतीश कुमार
नीतीश कुमार

एक मशहूर पहेली बचपन में आपने भी पढ़ी-सुनी होगी. तीन अक्षर का ऐसा नाम उल्टा-सीधा एक समान. बिहार की सियासत में इस पहेली का जवाब है लाडला. बाएं से दाएं जाइए या फिर दाएं से बाएं नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में सबके लाडले मुख्यमंत्री हैं. उल्टा-सीधा दोनों तरफ से नीतीश एक समान सीएम बनते आ रहे हैं. इसी लाडला सियासत में जब नीतीश सरकार में बीजेपी के कोटे से सात नए मंत्री शामिल हुए तो सबकुछ शांति से बीता, लेकिन नीतीश कुमार के लाडला बनकर की जाने वाली शांत सियासत बड़े तूफानों को पैदा करती रही है.

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जिस बिहार में नीतीश के अलटने-पलटने से ही राजनीति उलटती-पलटती आई है वहां विधानसभा चुनाव से आठ महीने पहले नीतीश सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार हुआ है. सात नए मंत्रियों ने शपथ लिए हैं. सातों नए मंत्री बीजेपी के हैं. जेडीयू के कोटे से कोई मंत्री नया नहीं बना.

सबकुछ इतना गुड-गुड सा बिहार में होता दिखता है तो राजनीति के जानकारों के मन में शंकाओं का ज्वार भाटा उठता है कि आखिर जिस बिहार में अंतरात्मा की आवाज सुनकर नीतीश कुमार सत्ता के सफर में 180 डिग्री कब घूम जाएं पता नहीं होता, आखिर वहां सबकुछ इतना सरल, सीधा-सपाट सा कैसे दिख रहा है? क्या नीतीश कुमार वाकई अब सीधी चाल चल रहे हैं?

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बिहार मंत्रिमंडल विस्तार पर बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा, "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने बिहार के विकास को गति देने के लिए 7 मंत्रियों को मंत्री बनाया है. मैं उन्हें बधाई देता हूं."

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी विकास की रफ्तार और नीतीश कुमार का जोड़ सात मंत्री की शपथ में बताते हैं, लेकिन नीतीश कुमार से जब सवाल होता है तो बधाई से ज्यादा कुछ नहीं बोलते. मीडिया के सवाल पर बस वह यह कहते सुने जा सकते हैं, "सभी को बधाई."

मुख्यमंत्री ही जब अपने मंत्रिमंडल के विस्तार पर बधाई के सिवाए कुछ ना बोलें तो ये खटकता है. पहले कुछ लोगों के मन में ये सवाल आया कि बीजेपी कोटे से ही मंत्री क्यों बन रहे हैं, नीतीश कुमार की पार्टी से क्यों नहीं तो सबसे पहले आप इसी का जवाब समझ लीजिए.

बिहार विधानसभा और कैबिनेट का गणित

बिहार में जेडीयू के 45 विधायक हैं. बीजेपी के अभी 80 विधायक हैं. दोनों पार्टी में ये समझौता पहले ही हुआ था कि प्रति तीन से चार विधायक पर एक मंत्री होगा. इस फॉर्मूले के तहत ही जेडीयू के 13 मंत्री पहले से हैं, लेकिन बीजेपी के कोटे से 15 मंत्री ही थे. इसलिए बीजेपी छह मंत्री और बना सकती थी. बीते दिन दिलीप जायसवाल जो बिहार बीजेपी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी के साथ राजस्व मंत्री भी थे, उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इस तरह बीजेपी के पास सात मंत्री का कोटा था, और सातों मंत्री बीजेपी से ही शपथ लिए.

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जिस समय पूरा मंत्रिपरिषद बना था, उस समय कुछ स्थान खाली रह गए थे जिसमें भाजपा कोटा था और उसी आधार पर हालिया विस्तार हुआ है. इसमें कुछ नया नहीं है. अब आपको ये तो समझ आ गया होगा कि सातों मंत्री बीजेपी से बनने में कहीं कोई खटपट नहीं, लेकिन ये बिहार है यहां सबकुछ दो सीटी में नहीं पकता. आंकडे बताते हैं कि 20 साल पहले जिस जेडीयू के बीजेपी से दोगुना से ज्यादा मंत्री सरकार में होते थे. वो गणित अब पूरी तरह पलट चुका है.

2020 में जेडीयू के 19 मंत्री थे और बीजेपी के सात. साल दर साल जेडीयू के मंत्री घटते गए, बीजेपी के बढ़ते गए. आज स्थिति ये है कि नीतीश कुमार की कुर्सी समेत 13 मंत्री उनकी अपनी सरकार में जेडीयू के हैं, और बीजेपी के 21 मंत्री हो चुके हैं, क्योंकि बीजेपी के विधायक जेडीयू से कहीं ज्यादा हैं. नीतीश कुमार इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि सीटें कम होने से ही अब बीजेपी धीरे धीरे बड़े भाई वाली भूमिका में आने लगी है.

नीतीश कुमार के मन में अब क्या चल रहा है?

ऐसे में क्या नीतीश कुमार को लगता है कि सात नए मंत्री सरकार में लाकर बीजेपी ने जाति-क्षेत्र के उस गणित को साध लिया है, जिससे बीजेपी को और फायदा चुनाव में हो सकता है? बीजेपी का ज्यादा फायदा मतलब क्या सीटें फिर से ज्यादा बीजेपी पाई तो मंत्री पद घटते घटते जेडीयू का मुख्यमंत्री पद भी घट सकता है? नीतीश कुमार के सामने महाराष्ट्र का उदाहरण है, जहां शिंदे पहले कम सीटों के बावजूद सीएम रहे लेकिन अबकी बार मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं था. नतीजे बीजेपी के हक में बंपर आए. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बने. एकनाथ शिंदे डिप्टी सीएम बने.

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वैसे ही बिहार में अब तक इस बात की गारंटी फिलहाल किसी ने नहीं दी है कि 2025 में गठबंधन जीता तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही बनेंगे, और तब क्या नीतीश के मन में आज की शपथ के बाद कुछ हलचल हो सकती है, क्योंकि 2005 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और बीजेपी ने गठबंधन में चुनाव लड़ा. सीट शेयरिंग के बाद जेडीयू के खाते में 139 सीट लड़ने को आई और 88 सीटें जीती जबकि बीजेपी सिर्फ 102 पर लड़ी और 55 सीटें जीती. यानी बड़े भाई की भूमिका में नीतीश कुमार थे.

  • अगर बात 2010 चुनाव की करें तो जेडीयू ने 141 सीटों पर चुनाव लड़ा और 115 सीटें जीती थी, जबकि बीजेपी ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा और 91 सीटें जीती. 2010 में भी बड़े भाई की भूमिका में नीतीश कुमार थे.
  • 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार महा गठबंधन के साथ मिलकर लड़े. जेडीयू को लड़ने के लिए 101 सीटें मिलीं. जीत भी 71 सीट पर मिली. यानी सीट नीतीश की घटने लगी.
  • 2020 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर नीतीश कुमार एनडीए के झंडे तले लड़े. नीतीश कुमार की पार्टी को यहां कुल 115 सीटें लड़ने को मिली, जबकि बीजेपी के हिस्से में 110 सीटें लड़ने को आई.
  • जेडीयू को केवल 43 सीट पर जीत मिली, जबकि बीजेपी 2020 में 74 सीट पर जीती थी.

साल से भले लेफ्ट-राइट दोनों हाथ से खेलते हुए मुख्यमंत्री पद वाली बैटिंग नीतीश कुमार कर रहे हों, लेकिन अब उनकी सीटें घटने लगी हैं, और तब जिन नए सात मंत्रियों को बीजेपी ने नीतीश सरकार में शामिल कराया है उन्हीं का जाति और क्षेत्र का गणित केवल विरोधी लालू-नीतीश ही नहीं बल्कि साथी नीतीश कुमार के माथे पर भी पसीना लाने वाला है.

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बिहार की अंदरूनी हकीकत

  • हर जाति के 34 फीसदी परिवार बिहार में महीने के 6000 रुपए कमाते हैं. यानी दिन के दो सौ रुपए ही कमाई है, यानी हर तीसरे में से एक परिवार बिहार का गरीब है. 
  • 30 फीसदी परिवार अब भी बिहार के हैं, जिनकी प्रतिदिन कमाई 333 रुपए ही है. 
  • बिहार के अब भी 50 लाख से ज्यादा बिहारी नागरिक बेहतर पढ़ाई और रोजीरोटी के लिए राज्य के बाहर रहते हैं.
  • बिहार में अब भी सबसे ज्यादा 16.73 फीसदी लोगों के लिए रोजगार का जरिया मजदूरी है. 

बिहार की इसी हकीकत के बीच सच जाति की सियासत है, जहां अबकी सात मंत्री नए अपने नीतीश सरकार में लाकर बीजेपी इक्कीस हुई तो चुनौती केवल लालू-तेजस्वी की राजनीति पर ही नहीं बल्कि खुद नीतीश कुमार के वोट तक पर है.

सात मंत्री, आठ महीना सबका लक्ष्य एक - रिजल्ट देना है.

आठ महीने में रिजल्ट देने की बात बिहार सरकार में मंत्री कृष्ण कुमार मंटू भी करते नजर आए. वह कुर्मी समाज से आते हैं, जिससे नीतीश कुमार भी हैं. मंटू ही नहीं सात मंत्री के साथ कई समीकरण बीजेपी ने साधना चाहा जैसे बीजेपी का कोर वोटर सवर्ण और वैश्य माना जाता है. बीजेपी ने सात मंत्रियों में 2 सवर्ण, तीन पिछड़े, दो अति पिछड़े को जगह दी है. सवाल है कि क्या ये नीतीश के कोर वोटर पर भी नजर का नतीजा है?

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बीजेपी के सबसे ज्यादा मंत्री मिथिलांचल और उत्तर बिहार से पांच इस बार शामिल हुए हैं. उत्तर बिहार से 73 विधानसभा सीट आती है, मिथिलांचल से 50 सीट. ये वो इलाका है जहां बीजेपी सबसे ज्यादा सीट जीतती है, और अहम बात ये है कि बिहार की सियासत में जब सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट होती है तो मिथिलांचल अहम भूमिका निभाता है.

बीजेपी की यहां पर बड़ी नजर है, तो क्या विधायक-मंत्री जेडीयू से ज्यादा होने के बाद बीजेपी अब अपना विस्तार नीतीश कुमार के वोटबैंक पर करना चाहती है? क्योंकि बीजेपी जानती है कि मुस्लिम और यादव वो वोट है जो खुलकर सीधे लालू-तेजस्वी के पास जाता है. 

बीजेपी के कुल 21 मंत्री हो गए लेकिन एक भी यादव मंत्री नहीं है. क्या इसलिए क्योंकि बीजेपी साफ है कि यादव वोट तो सीधे आरजेडी को जाता है तो क्यों नहीं दूसरे वर्ग पर ही फोकस किया जाए. तब बीजेपी के जाति साधती सियासत पर तेजस्वी यादव आरक्षण वाला दांव चलने लगते हैं.

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तेजस्वी यादव कहते हैं, "जैसे आदमखोर होता है ना वैसे ही 𝐁𝐉𝐏 आरक्षण खोर और आरक्षण चोर है 𝟏𝟕 महीनों के अल्प कार्यकाल में हमारे द्वारा जातिगत गणना के उपरांत दलितों-आदिवासियों और पिछड़ों-अतिपिछड़ों के लिए बढ़ाए गए 𝟔𝟓% आरक्षण को बीजेपी-एनडीए की केंद्र सरकार ने संविधान की नौवीं अनुसूची में नहीं डाला और केस में फंसा दिया.

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तीन अक्षर का मेरा नाम, उल्टा-सीधा एक समान!

आज दिन भर देखें तो नीतीश कुमार मंत्रिमंडल विस्तार पर बधाई के सिवाए कुछ नहीं बोले. जेडीयू के नेताओं ने भी कोई बडी प्रतिक्रिया नहीं दी. सिवाए इसके कि जल्द ही नीतीश कुमार के नाम का एलान पार्टी करे, और तब सवाल है कि क्या सीट बंटवारे को लेकर अगर बातचीत नहीं बनी तो फिर अंतरात्मा की आवाज सुनकर पलटने वाले नीतीश कुमार फिर महागठबंधन का लाडला बन सकते हैं?

तीन अक्षर का मेरा नाम उल्टा सीधा एक समान जवाब है- लाडला और बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार से ज्यादा लाडला कौन होगा, जो लेफ्ट टू राइट होते हैं तो NDA सरकार के मुख्यमंत्री बनते हैं. राइट टू लेफ्ट होते हैं तो महागठबंधन सरकार के सीएम बनते हैं, लेकिन क्या अब 8 महीने बाद भी नीतीश लाडले सीएम होंगे? ये शंका जेडीयू के मन में तो चल ही रही है.

नतीजा, नीतीश के बेटे निशांत जिनकी सियासी एंट्री के चर्चे चल रहे हैं वो बयान देकर चर्चा में आ गए कि एनडीए नीतीश के नाम का एलान करे और इस बार सीटें ज्यादा मिलें. निशांत कुमार के बयान को हल्के में नहीं लिया जा सकता है, क्योंकि जेडीयू के बड़े नेता केसी त्यागी सीधे इसे पार्टी का बयान कहते हैं. 

बीजेपी के तमाम नेता नीतीश कुमार के नेतृत्व की बात तो करते हैं, लेकिन जब प्रधानमंत्री के भागलपुर दौरे में चर्चा के बावजूद बात सिर्फ लाडला तक ही रह गई और अब बीजेपी के कोटे से सात नए मंत्री सोशल-रीजनल इंजीनियरिंग साधते आए तो चर्चा ये भी चल पड़ी कि आगे नीतीश क्या करेंगे. 2020 में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, कम सीटें जीते लेकिन मुख्यमंत्री बने.

2022 में नीतीश ने फिर से बीजेपी से नाता तोड़ लिया और लालू प्रसाद यादव के साथ चले गए. लोकसभा चुनाव से पहले 2023 में इंडिया गठबंधन के गठन में अहम भूमिका निभाई, BJP को हराने के लिए तमाम क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के साथ एक मंच पर लाए, लेकिन इंडिया गठबंधन का संयोजक नहीं बनाए जाने पर इंडिया गठबंधन छोड़ दिया और फिर NDA में शामिल हो गए. यानी नीतीश कुमार अपने सम्मान से समझौता नहीं करेंगे, चाहे फिर उन्हें पाला क्यों ना बदलना पड़े.

अब एक साल से नीतीश कुमार दिल्ली से पटना तक ये दोहराते आ रहे हैं कि अब पलटी नहीं मारेंगे. कई बार बोले हैं, कि हम नहीं छोडेंगे एनडीए. नीतीश कुमार का गठबंधन के साथ मजबूत जोड़ बार-बार बताने के बीच लालू यादव और उनकी पार्टी ऑफर वाला दांव चलती रहती है. ऐसे में अगर बिना सीएम फेस घोषित किए बीजेपी चुनाव लड़ना चाहेगी तो क्या नीतीश फिर दरवाजा खोल देंगे? फिलहाल तो सारे ऑफर को नीतीश ठुकराते हैं लेकिन ये बयान आता है, जहां कहा जाता है कि हर हालात के लिए तैयार हैं, चाहे चुनाव जल्दी ही क्यों ना हो जाए.

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