बिहार में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है और अक्टूबर-नवंबर में राज्य के करीब 13 करोड़ लोग एक बार फिर अगले पांच सालों के लिए नई सरकार चुनेंगे. 243 सीटों पर होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासी दांवपेंच जारी है.
राज्य की तीन प्रमुख पार्टियां, बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी पहले ही चुनाव मैदान में उतर चुकी हैं, जबकि कांग्रेस एक बार फिर अपना वजूद बचाने की कोशिश में है. कन्हैया कुमार को कृष्णा अल्लावरू की अगुवाई में आगे बढ़ाकर कांग्रेस सीटों की संख्या में मोलभाव करने की अपनी क्षमता को मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है.
सीमांचल में सबसे दिलचस्प लड़ाई
इन सबके बीच इस बार सबसे ज्यादा दिलचस्प लड़ाई सीमांचल में नजर आ रही है, जहां सबकी नजरें मुस्लिम वोटरों पर हैं. राज्य में सरकार बनाने की तमाम संभावनाओं में सीमांचल की ये 24 सीटें (पूर्णिया- 7, कटिहार- 7, किशनगंज- 4, अररिया - 6) बेहद अहम मानी जाती हैं. यहीं से तय होता है कि बिहार की गद्दी पर कौन बैठेगा. यही वजह है कि तमाम पार्टियों ने चुनाव अभियान का आगाज यहीं से किया है. कन्हैया कुमार भी आजकल सीमांचल की गलियों में नजर आ रहे हैं.
सीमांचल की अहमियत आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठबंधन टूटने के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 23 सितंबर 2022 को पूर्णिया जिले के रंगभूमि मैदान में ही 'जन भावना रैली' को संबोधित किया था, जहां उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए हुंकार भरी थी. शाह ने इस रैली में लोगों से बीजेपी को पूर्ण बहुमत देने की मांग की थी.
वहीं नीतीश कुमार के भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन तोड़ने और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ महागठबंधन बनाने के बाद तेजस्वी यादव ने भी पहली बड़ी रैली 25 फरवरी 2023 को पूर्णिया में ही की थी. इस 'एकजुटता रैली' में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, और महागठबंधन के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया था. अब एक बार फिर चुनाव आ रहा है तो सीमांचल राजनीति दलों का अखाड़ा बना चुका है, जहां तमाम तरह के राजनीतिक दांव-पेंच लगाए जा रहे हैं, ताकि इन 24 सीटों पर कब्जा किया जा सके.
2020 के चुनावी नतीजे
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में सीमांचल क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 6, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) को 5, कांग्रेस (INC) को 4, जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) को 4, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को 3, और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (CPI(ML)) को 1 सीट मिली थी. सीमांचल को भले ही बिहार का सबसे गरीब और पिछड़ा क्षेत्र माना जाता हो, लेकिन मुस्लिम बहुल इलाका होने के कारण यह वोटों के लिहाज से कई राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो इसे एक उपजाऊ राजनीतिक जमीन बनाता है.
इसकी वजह ये है कि सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया में विधानसभा की 24 सीटें हैं जिस पर ज्यादातर सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं. 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में करीब 17 फीसदी (16.87%) मुस्लिम हैं. बिहार की कुल मुस्लिम आबादी का 45 से 75 फीसदी हिस्सा (कहीं कम, कहीं ज्यादा) सिर्फ सीमांचल के चार जिलों में बसा है.
गरीबी, अशिक्षा का शिकार सीमांचल
सीमांचल के वोटों का मौजूदा गणित बताने से पहले आपको इस इलाके के बारे में थोड़ी जानकारी देते हैं. बिहार की औसत गरीबी दर जहां 33.74 फीसदी है, वहीं सिर्फ सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया में गरीबी दर का आंकड़ा 65 फीसदी के करीब है.
शिक्षा के मामले में भी यह राज्य का सबसे पिछड़ा इलाका माना जाता है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार की औसत साक्षरता दर (2011) 61.8% है, वहीं सीमांचल के चारों जिलों पूर्णिया – (51.08%) कटिहार – (52.24%), अररिया – (53.53%) किशनगंज – (57.04%) में सबसे कम सारक्षरता दर है.
अत्यधिक आबादी, शिक्षा के कमजोर बुनियादी ढांचे, आर्थिक पिछड़ापन, बाढ़ जैसी आपदाएं कुछ ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से इस क्षेत्र के लोग आजादी के अमृतकाल के इस दौर में भी सामान्य जीवन जीने के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं. आपको ये लोग सड़कों, गलियों और खेतों में कठिनाइयों से जूझते हुए दिख जाएंगे.
सीमांचल में वोटों का गणित?
अब अगर सीमांचल की मौजूदा राजनीति और वोटों के गणित की बात करें तो ये सच है कि पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए ने इस इलाके में थोड़ी मजबूत स्थिति बनाई थी, लेकिन इस बार यहां चुनौती थ्री डाइमेंशनल (त्रिकोणीय) हो चुकी हैं. इलाके की मुस्लिम बहुल आबादी पर हर पार्टी नजरें गड़ाए हुए है और वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुटी है.
पहले इस इलाके में मुख्य तौर पर दो ध्रुव थे एक एनडीए ( जेडीयू+बीजेपी) और दूसरा महागठबंधन (आरजेडी+कांग्रेस+लेफ्ट) लेकिन जिस तरह से बीते चुनाव में AIMIM ने इस इलाके में महागठबंधन को चौंका दिया था (जिससे बीजेपी को फायदा मिला था) उसी तरह इस बार सीमांचल में एक नई ताकत का उभार हुआ है, जिसका नाम पप्पू यादव है.
बीते साल हुए लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव ने इस इलाके में अपनी उस ताकत का एहसास भी पटना में बैठे नेताओं को करा दिया था. लाख कोशिशों के बाद भी पप्पू यादव आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव की वजह से कांग्रेस से टिकट नहीं ले पाए थे और निर्दलीय चुनाव में उतरकर आरजेडी की बीमा भारती और एनडीए के कद्दावर नेता संतोष कुशवाहा को 20 हजार वोटों के अंतर से हरा दिया था. पप्पू यादव ने लोकसभा चुनाव में आरजेडी और कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में भी सेंध लगाई थी.
पप्पू यादव की इस जीत ने कांग्रेस में अनधिकृत रूप से उनके कद को बढ़ाने में भी बड़ी भूमिका निभाई है. पप्पू यादव सीमांचल में कितने मजबूत हैं उसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि पूर्णिया के रुपौली विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी बीमा भारती को हार का मुंह देखना पड़ा था और इसके लिए पप्पू यादव को ही जिम्मेदार ठहराया गया था.
पप्पू यादव आरजेडी के लिए बने सिर दर्द
पप्पू यादव का प्रभाव न सिर्फ पूर्णिया के सातों विधानसभा सीटों पर है बल्कि अररिया, किशनगंज और कटिहार में भी लोग उन्हें पसंद करते है, जिससे वो वोटों को किसी उम्मीदवार के पक्ष में डाइवर्ट करने की क्षमता रखते हैं. पूर्णिया के आदिवासी समुदाय में भी पप्पू यादव की अच्छी पकड़ मानी जाती है और लोकसभा चुनाव में उन्हें उनका समर्थन भी मिला था.
कुछ अगड़ी जातियों को छोड़ दें तो पूर्णिया के तमाम सीटों पर पप्पू यादव की पकड़ है और मुस्लिम के साथ-साथ ओबीसी और पिछड़े भी उन्हें पसंद करते हैं क्योंकि किसी भी मुसीबत में पप्पू यादव वहां खड़े नजर आते हैं.
यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी ने अनधिकृत रूप से पप्पू यादव को सीमांचल में कांग्रेस के पक्ष में वोटों की गोलबंदी करने का काम सौंपा है, क्योंकि बिहार के अन्य क्षेत्रों के मुकाबले सीमांचल में कांग्रेस की स्थिति अच्छी है. कांग्रेस के पास इस इलाके में विधानसभा की चार और लोकसभा की एक सीट किशनगंज (मोहम्मद जावेद) है.
लोकसभा चुनाव में आरजेडी को पूर्णिया और अररिया जैसे मुस्लिम बहुल इलाके में भी काफी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था, जिसे पहले लालू की पार्टी का कोर वोटर्स माना जाता था. अररिया में बीजेपी के प्रदीप सिंह ने आरजेडी के शाहनवाज को हराया था.
सीमांचल में इस बार सबसे बड़ी चुनौती आरजेडी के लिए ही नजर आ रही है. पूर्णिया में पार्टी की सबसे बड़ी नेता बीमा भारती लगातार दो चुनाव हार चुकी हैं और यादुका हत्याकांड में उनके पति और बेटे की भूमिका ने लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता को रसातल में पहुंचा दिया है. उन्हें मौजूदा विधायक शंकर सिंह से कड़ी टक्कर मिली है, जो इस वक्त जेडीयू के पाले में हैं.
आरजेडी के लिए मुश्किलें खड़ी करने में पप्पू यादव ने कोई कमी नहीं की है. एक तरफ जहां पप्पू यादव ने कई इलाकों के मुस्लिम वोटरों पर अपनी पकड़ बना ली है, वहीं इलाके के यादव समुदाय पर भी उनका अच्छा खासा प्रभाव नजर आ रहा है, जो आरजेडी के लिए बिल्कुल अच्छी खबर नहीं है.
सीट बचाने की जुगत में बीजेपी
अब अगर बात बीजेपी की करें तो 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार एनडीए के पाले से ही चुनाव लड़े थे, जिस वजह से सीमांचल में बीजेपी को 6 सीटों पर जीत मिली थी. हालांकि नीतीश कुमार फिर से पाला बदलकर इस बार भी एनडीए के खेमे से ही चुनाव मैदान में जा रहे हैं, लेकिन वक्फ बिल को लेकर जो नाराजगी बिहार के मुस्लिमों में बीते दिनों दिखी है उससे जेडीयू को सीमांचल में झटका लग सकता है. बीते दिनों कई मुस्लिम संगठनों ने वक्फ बिल पर मोदी सरकार का साथ देने के लिए नीतीश की इफ्तार पार्टी में जाने से इनकार कर दिया था.
बीजेपी ने चला एयरपोर्ट का दांव
ऐसे में सीमांचल में बीजेपी को भी जेडीयू के साथ सीटों का नुकसान हो सकता है, शायद यही वजह है कि आननफानन में बिहार और केंद्र सरकार ने मिलकर पूर्णिया में अगले तीन महीने में एयरपोर्ट शुरू करने का ऐलान कर दिया है, जो उस इलाके की बहुप्रतीक्षित मांग थी.
दस साल पुराने पीएम मोदी के इस वादे के पूरा नहीं होने से लोकसभा चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार संतोष कुशवाहा को नुकसान उठाना पड़ा था. चूंकि सीमांचल के हजारों मुस्लिम परिवार के लोग खाड़ी देशों में काम करते हैं, इसलिए एयरपोर्ट वहां विकास का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है जिसे अब तैयार कराया जा रहा है.
2020 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दरभंगा एयरपोर्ट को ऑपरेशनल किया गया था, जिसका चुनाव में बीजेपी को जबरदस्त फायदा हुआ था और उसे मिथिला क्षेत्र की ज्यादातर सीटों पर जीत मिली थी. अब बीजेपी फिर से उसी फॉर्मूले को यहां अपना रही है.
हालांकि बीजेपी ने अगर इस बार पूर्णिया सदर और कुछ अन्य सीटों पर उम्मीदवार नहीं बदले तो इसका भी नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है, क्योंकि पूर्णिया सदर विधायक विजय खेमका सहित कई ऐसे विधायक हैं, जिसके खिलाफ जबरदस्त एंटी इनकंबेंसी है. सवर्ण के साथ ही ओबीसी वोटर्स भी कई विधायकों से नाराज हैं.