प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्ष 2014 में जब से प्रधानमंत्री बने हैं, तब से उन्होंने कई परंपराओं को बदला है. उनके इस कार्यकाल में बजट से जुड़ी कुछ परंपराएं भी बदली हैं, आइए जानते हैं ऐसी ही 5 परंपराओं के बारे में...
1. बदली बजट पेश करने की तारीख
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में वित्त मंत्री रहते हुए अरुण जेटली ने जब 2017 में आम बजट पेश किया, तो सबसे बड़ा बदलाव बजट को संसद में रखे जाने की तारीख में बदलाव करना रहा. अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही परंपरा को बदलते हुए मोदी सरकार ने फरवरी के आखिरी दिन पेश होने वाले आम बजट को फरवरी के पहले दिन पेश करना शुरू कर दिया. इसकी वजह बजट से जुड़ी सभी प्रक्रियाओं को एक अप्रैल पर नया वित्त वर्ष शुरू होने से पहले पूरा करना है. ताकि सरकार एक अप्रैल से ही नए वित्त वर्ष के हिसाब से काम करना शुरू कर दे और बजट को बेहतर तरीके से लागू किया जा सके. अन्यथा पहले इस प्रक्रिया को पूरा होने में मई-जून तक का वक्त लगता था.
2. खत्म हुआ अलग रेल बजट
वर्ष 2016 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जब बजट पेश किया तो इससे जुड़ी एक और बड़ी परंपरा बदली. इस साल रेल बजट को आम बजट के एक हिस्से के रूप में पेश किया गया. इससे पहले 1924 से रेल बजट को हमेशा अलग से पेश किया जाता था. इसे संसद में आम बजट से पहले रखा जाता था.
3. ब्रीफकेस बदला बही खाते में
देश के पहले वित्त मंत्री आर.सी.के.एस. चेट्टी ने जब 1947 में आजादी के बाद का पहला बजट पेश किया था, तब वह बजट दस्तावेजों को चमड़े के एक ब्रीफकेस में लेकर पहुंचे थे. तब से देश के हर वित्त मंत्री ने इस परंपरा का पालन किया. लेकिन मौजूदा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस परंपरा का भारतीयकरण कर दिया. 5 जुलाई 2019 को वह लाल कपड़े के एक बस्ते में बजट दस्तावेजों को लेकर संसद भवन पहुंचीं, जो असल में भारतीय बही-खातों का ही स्वरूप है. आखिर देश का बजट-देश का बही खाता है.
4. जब प्रिंट नहीं हुआ आम बजट
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट प्रक्रिया से जुड़े एक और बड़े बदलाव की साक्षी बनी वर्ष 2021 में. कोविड महामारी के बीच पेश हुआ ये आम बजट ‘डिजिटल इंडिया’ की मिसाल बन गया. कोविड प्रोटोकॉल के चलते इस साल आम बजट प्रिंट ही नहीं कराया गया, बल्कि सांसदों को इसकी डिजिटल प्रतियां उपलब्ध कराई गईं. मोदी सरकार इससे पहले मीडिया और अन्य मंत्रालयों के लिए छपने वाली बजट प्रतियों की संख्या को पहले ही कम कर चुकी थी.
5. खत्म हुई 5 वर्षीय योजनाएं
मोदी सरकार ने वर्ष 2015 में योजना आयोग को खत्म करके, नीति आयोग का गठन किया. इसी के साथ देश में बनने वाली पंचवर्षीय योजनाएं भी खत्म हो गई. प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से चली आ रही पंचवर्षीय योजनाओं से जुड़ी घोषणाएं देश के आम बजट का एक बड़ा हिस्सा होती थीं, लेकिन 2017 से इनका समापन हो गया, क्योंकि आखिरी पंचवर्षीय योजना का समय 2012 से 2017 तक ही था.
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