आज इस मुकाम पर जीडीपी
ब्रिटिश हुकूमत से आजाद होने के बाद देश को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना राजनेताओं के लिए सबसे जरूरी और बड़ा काम था. 15 अगस्त 1947 (Independence Day) में जब भारत स्वतंत्र हुआ, देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) महज 2.7 लाख करोड़ रुपये था. यह आंकड़ा दुनिया की कुल GDP का सिर्फ 3 फीसदी था. लेकिन, भारत ने सभी चुनौतियों को स्वीकर किया. वित्त वर्ष 2021-22 में जीडीपी 236 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा पर पहुंच गई. हालांकि, इस बीच सूखा, आर्थिक मंदी और कोरोना महामारी समेत कई विपदाओं का सामना देश को करना पड़ा, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधी चोट की.
देश ने देखा सबसे भयानक सूखा
1960 का दशक आजाद भारत के लिए बेहद खराब रहा था. दरअसल, यह ऐसा दशक था, जब देश को इतिहास के सबसे भयानक सूखे से गुजरना पड़ा था. जिसके चलते खाद्यान्न और अनाज (Food) की आपूर्ति बुरी तरह बाधित हो गई थी और भारत की निर्भरता मदद के लिए पश्चिमी देशों पर बढ़ गई थी. इस अकाल की वजह से लाखों जानें गई थीं. ये वो दौर था जब हरित क्रांति (Green Revolution) अस्तित्व में आई. इस विकराल समस्या से भारत न सिर्फ उबरा, बल्कि आज दुनिया को खाद्यान्न मुहैया कराने में भी सक्षम है. बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने भी इस बात को पूरे जोर-शोर से दुनिया को बताया था.
राजकोषीय घाटा बना बड़ी मुसीबत
भारतीय अर्थव्यवस्था ने सूखे के बाद एक और बड़ी समस्या का सामना तब किया, जब सरकार का राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ने लगा और देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया. यह 1980-81 में सकल घरेलू उत्पाद के 9 फीसदी से बढ़कर 1985-86 में 10.4 फीसदी हो गया. इसके बाद ये और बढ़ता गया और 1990-91 में 12.7 फीसदी हो गया. भारत का विदेशी कर्ज करीब दोगुना हो चुका था. देश का विदेशी मुद्रा भंडार एक अरब डॉलर से भी कम रह गया था. तब आईएमएफ (IMF) से और कर्ज लेने के लिए 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था. लेकिन आज देश का विदेशी मुद्रा भंडार 597.978 अरब डॉलर है.
आर्थिक मंदी ने तोड़ी थी कमर
2008-09 के दौरान भारत ने बड़ी आर्थिक मंदी (Financial Crisis) का सामना किया था. वैश्विक स्तर पर आई इस मंदी (Recession) ने दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था (Economy) को बुरी तरह हिलाकर रख दिया था. इस दौरान करोड़ों लोगों का रोजगार (Job's) छिन गया था और उन्हों दो जून की रोटी के लिए भी परेशान होना पड़ा था. भारत में भी इसका असर दिखाई दिया था, लेकिन दूसरे बड़े देशों की तुलना में ये कम था. लेकिन, इस मंदी की मार के बाद देश उठा और तेज रफ्तार पकड़ी. आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था (Fastest Growing Economy) बन चुका है.
नोटबंदी ने मचाई बड़ी खलबली
8 नवंबर 2016, वो तारीख जब रात के आठ बजे देश के प्रधानमंत्री ने नोटबंदी (Demonetisation) शब्द का जिक्र किया और एक झटके में देश की करीब 86 फीसदी करेंसी (Currency) पर राज कर रहे 500 और 1000 रुपये के नोट पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इस ऐलान के बाद ऐसी हलचल मची कि वैश्विक स्तर पर भारत सुर्खियों में आ गया. विपक्ष विरोध के लिए, तो जनता अपने नोट बदलवाने या फिर एटीएम और बैंकों से नोट निकालने के लिए लाइन में लगी नजर आई. हालांकि, कुछ समय बाद सब सामान्य हो गया और जनता ने सरकार के ऐलान को स्वीकार कर लिया, नए नोट चलन में आ गए. हालांकि, भारत से पहले 1982 में म्यांमार, 1984 में नाइजीरिया, 1990 में जायरे, 1991 में सोवियत यूनियन और 2010 में उत्तर कोरिया में नोटबंदी हुई थी, लेकिन वहां पर हालात बेहद बिगड़े थे.
कोरोना के प्रकोप का बुरा असर
साल 2020 में पूरी दुनिया समेत भारत ने कोरोना वायरस (Corona Virus) के प्रकोप का सामना किया. इस महामारी की चपेट में आने से लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई, जबकि इसने अर्थव्यवस्था (Economy) की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया. संक्रमण को रोकने के लिए सरकार ने लॉकडाउन (Lockdown) लगाया, जिससे भारत का आर्थिक पहिया रुक सा गया. कोरोना की एक के बाद एक तीन लहरों ने इकोनॉमी के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया. लेकिन, देश कोरोना की मार से भी उबर गया और सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनकर उभरा. भारत की मिसाल विश्व बैंक (World Bank), आईएमएफ (IMF) समेत अन्य देशों ने भी दी.