दुनिया भर में एक बार फिर से आर्थिक मंदी (Recession) का खतरा मंडराने लगा है. एक के बाद एक कई अर्थशास्त्री (Economists) मान रहे हैं कि इस साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत तक दुनिया मंदी की चपेट में आ सकती है. अमेरिका (US), चीन (China) और ब्रिटेन (UK) समेत अन्य यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के सामने मंदी का खतरा अधिक गंभीर है. कई ऐसे फैक्टर हैं, जो मंदी आने के पूर्व संकेत दे रहे हैं. इन संकेतों को देखते हुए मंदी आने का इंतजार किए बिना यह जान लेना जरूरी है कि किन उपायों पर अमल कर इसके असर को कम किया जा सकता है. (Photo: Reuters)
2008 की तरह गिर रहे शेयर बाजार
सबसे पहले उन संकेतों की बात करते हैं, जो मंदी आने का इशारा कर रहे हैं. अमेरिका बाजार (US Share Market) लगातार गिरता जा रहा है. इस साल डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज करीब 13 फीसदी गिर चुका है. ऑल टाइम हाई से अमेरिकी बाजार अभी करीब 20 फीसदी नीचे हैं. कई नामचीन कंपनियों के शेयर के भाव भारी गिरावट का शिकार हुए हैं. लगातार आ रही यह गिरावट 2008 का वह मंजर याद दिला रहा है, जो तब मंदी के समय बाजार में देखने को मिला था.
महामारी का असर जाने से पहले युद्ध
दरअसल पूरी दुनिया 2019 से कोरोना महामारी की मार झेल रही है. अभी दुनिया इससे उबर भी नहीं पाई थी कि रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) का संकट पैदा हो गया. इस युद्ध के कारण दुनिया भर में कई जरूरी कमॉडिटीज की कमी का संकट उत्पन्न हो गया है. रूस और यूक्रेन दोनों ही गेहूं और जौ जैसे कई अनाजों के बड़े निर्यातकों में से है. युद्ध के चलते इनका निर्यात प्रभावित हुआ है. अभी हालात ऐसे हैं कि कई देशों के सामने फूड क्राइसिस की स्थिति है.
रिकॉर्ड मंहगाई के बीच बढ़ती ब्याज दरें
अभी पूरी दुनिया दशकों की सबसे ज्यादा महंगाई (Record High Inflation) झेल रही है. भारत के हालात देखें तो अप्रैल में सालों बाद थोक महंगाई 15 फीसदी के पार चली गई और नवंबर 1998 के बाद सबसे ज्यादा हो गई. खुदरा महंगाई पहले ही मई 2014 के बाद के सबसे उच्च स्तर पर है. अप्रैल में अमेरिका में खुदरा महंगाई कुछ कम होकर 8.3 फीसदी पर आई, लेकिन यह अभी भी कई दशकों के उच्च स्तर पर है. इससे पहले मार्च में अमेरिका में महंगाई की दर 8.5 फीसदी रही थी, जो बीते 41 साल में सबसे ज्यादा था. दूसरी ओर तमाम सेंट्रल बैंक ब्याज दरें बढ़ा रहे हैं. बेकाबू मंहगाई के बीच बढ़ती ब्याज दरों को एनालिस्ट मंदी के संकेत के रूप में देख रहे हैं. (Photo: Reuters)
इस स्थिति को अर्थशास्त्र में कहते हैं मंदी
जब किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी (GDP) में लगातार छह महीने यानी 2 तिमाही तक गिरावट आती है, तो इस दौर को अर्थशास्त्र में आर्थिक मंदी कहा जाता है. इसे ही मंदी की सर्वमान्य परिभाषा माना जाता है. अगर 2 तिमाही के दौरान किसी देश की जीडीपी में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आती है, तो उसे डिप्रेशन कहा जाता है. प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1930 के दशक में सबसे भयानक महामंदी आई थी, जिसे The Great Depression कहा जाता है. अभी तक रिकॉर्डेड हिस्ट्री में दुनिया ने एक ही बार डिप्रेशन का सामना किया है. वहीं अगर जीडीपी की ग्रोथ रेट (GDP Growth Rate) लगातार कम होती है तो यह इकोनॉमिक स्लोडाउन (Economic Slowdown) यानी आर्थिक सुस्ती का दौर कहलाता है. (Photo: Getty)
मंदी से बचने के लिए ये उपाय जरूरी
मंदी के खतरे से बचने के लिए सबसे पहले लोगों को अनावश्यक खर्चे कम करने चाहिए. खर्चों को कम कर एक इमरजेंसी फंड तैयार करना बेहद जरूरी है. इस बात का हिसाब निकालिए कि हर महीने आपको सर्वाइवल के लिए कम से कम कितने पैसे की जरूरत है. अब प्रयास ये होना चाहिए कि कम से कम छह महीने के खर्च लायक इमरजेंसी फंड आपके पास हो. क्रेडिट कार्ड, 'बाय नाउ, पे लेटर (BNPL)' कर्ज आदि लेने से ऐसे समय में बचना चाहिए. अचानक बीमारी की स्थिति से निपटने के लिए हेल्थ इंश्योरेंस रखना भी जरूरी तैयारी है. शेयर मार्केट और क्रिप्टो जैसे वोलेटाइज साधनों में निवेश करने से बचें. मंदी के समय को रियल एस्टेट में इन्वेस्टमेंट के लिहाज से बुरा माना जाता है. दूसरी ओर गोल्ड ऐसे बुरे समय के लिए बेहद अच्छा इन्वेस्टमेंट साबित होता है. आर्थिक संकट के समय में गोल्ड की वैल्यू बढ़ती है. (Photo: Reuters)