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Bihar To London: लंदन स्टॉक एक्सचेंज पहुंची पहली भारतीय कंपनी, अनिल अग्रवाल की कहानी

सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने वाले बिजनेसमैन अनिल अग्रवाल पिछले कुछ समय से अपनी यात्रा की कहानी लोगों से साझा कर रहे हैं. ताजी कड़ी में उन्होंने बताया है कि कैसे उन्होंने अपनी कंपनी को लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट कराने का फैसला लिया.

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लंदन में ही रहते हैं अनिल अग्रवाल
लंदन में ही रहते हैं अनिल अग्रवाल
स्टोरी हाइलाइट्स
  • LSE में लिस्ट होने वाली वेदांता पहली भारतीय कंपनी
  • मेटल और माइनिंग सेक्टर में है वेदांता का बड़ा साम्राज्य

अपने दम पर कारोबारी साम्राज्य खड़ा करने वाले उद्यमियों का जिक्र हो तो वेदांता (Vedanta Ltd) के अनिल अग्रवाल (Anil Agawal) का नाम स्वाभाविक तौर पर सामने आ जाता है. साधारण परिवार में पैदा होने के बाद अनिल अग्रवाल ने अपनी मेहनत और लगन से माइनिंग व मेटल बिजनेस (Mining And Metal Business) का साम्राज्य खड़ा कर दिया. आने वाले समय में वह भारत को सेमीकंडक्टर (Semiconductor) के मामले में आत्मनिर्भर (Aatmanirbhar Bharat) बनाने में योगदान देने वाले हैं. क्या आपको पता है कि कैसे बिहार से शुरू हुआ एक सफर मुंबई आकर रुका नहीं, बल्कि लंदन तक पहुंच गया. इतना ही नहीं, इस सफर के दरम्यान कई शानदार मुकाम हासिल हुए और लंदन स्टॉक एक्सचेंज (London Stock Exchange) पर पहली भारतीय कंपनी की लिस्टिंग उनमें से एक है. आइए जानते हैं आज ये कहानी, खुद सफर के शिल्पकार यानी अनिल अग्रवाल की जुबानी...

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इस कारण लिया लंदन जाने का फैसला

सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने वाले बिजनेसमैन अनिल अग्रवाल पिछले कुछ समय से अपनी यात्रा की कहानी लोगों से साझा कर रहे हैं. फेसबुक पर ताजी कड़ी में वह लिखते हैं, 'आप में से बहुत लोग मुझे पहले ऐसे भारतीय के रूप में जानते हैं, जिसने सन 2003 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज में अपनी कंपनी लिस्ट करवाई. मेरे उस अनुभव को आप जरूर जानना चाहेंगे. इस कहानी में भी कई उतार चढ़ाव हैं. इस बार उसके शुरूआती दिनों की कुछ बात की जाए. मेटल बिजनेस शुरू करने के बाद, मैं भारत में उचित मूल्य पर व्यापार करना चाहता था, लेकिन उस समय यहां बड़े नाम वाले फैमिली बिजनेस बाजार पर राज कर रहे थे, इसलिए मेरी कंपनी की वैल्यूएशन कम थी. ग्लोबल कंपनियां लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट हो रही थीं और मैं उनमें से एक बनना चाहता था. सच बताऊं तो मैं उनमें सबसे बड़ी कंपनी बनाने का सपना ले कर चल रहा था, इसलिए मैंने लंदन आने का तय किया.'

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पत्नी ने इस बार भी दिया साथ

जब अनिल अग्रवाल ने लंदन जाने का फैसला अपनी पत्नी किरण को बताया तो उन्हें यकीन नहीं हुआ. अनिल अग्रवाल लिखते हैं, 'लेकिन जब मेरी पत्नी किरण को पता चला कि हम रातों-रात लंदन जाने की तैयारी में हैं, तो उसने सोचा कि मैं बहक गया हूं! वो हमारी बेटी प्रिया के स्कूल गई और वहां प्रिन्सिपल से बेटी के लिए केवल 6 महीने की छुट्टी मांगी क्योंकि उसे यकीन था कि हम इस से ज्यादा लंदन में टिकेंगे नहीं. फिर भी उसने बिना कोई शक जताए, हमेशा की तरह मेरे सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम की तरह, सब कुछ अरेंज किया. मैंने अपने लिए ज्यादा सामान पैक नहीं किया, लेकिन... मां के हाथ के बने परांठे और बाबूजी के शॉल को आशीर्वाद के रूप में साथ लेना नहीं भूला.'

लंदन जाने पर काम आई पिता से मिली सीख

आम लोगों की तरह इस बड़े कदम के बाद अनिलन अग्रवाल को भी घबराहट हुई थी. ऐसे में उन्हें अपना पुराना अनुभव और पिता से मिली सीख काम आई. इस बारे में वह बताते हैं, 'जब हम हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरे तो मैंने खुद को जैसे अलग दुनिया में पाया. अलग भाषा बोलने वाले विदेशी लोग, ठंडा, बारिश जैसा मौसम और ऊंची सफेद बिल्डिंग्स! मुझे उन लोगों की याद आ गई, जिन्होंने मुझे कहा था कि छोटी चिड़ियां बड़े आसमान में नहीं उड़ा करती! बहुत दिनों बाद मन में डर महसूस हुआ. उस समय, मैंने अपने बाबूजी के शॉल को अपने चारों ओर लपेट लिया और लगा कि उनका तेज, उनका आशीर्वाद मेरी रक्षा कर रहा है. उन्होंने मुझे सिखाया भी था कि हमारा ध्यान यात्रा पर केंद्रित  होना चाहिए ना कि उसके अंत पर. वे कहा करते थे, जब तक आप जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उसका आनंद लेते रहेंगे, तो आपको अपना मनचाहा रास्ता भी मिल जाएगा.'

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विदेश जाकर भी नहीं छूट पाया मुंबई से मोह

इससे पहले की कड़ियों में अनिल अग्रवाल बता चुके हैं कि कैसे इसी तरह एक दन अचानक वह बिहार से मुंबई की ट्रेन में सवार हो गए थे. मुंबई उस समय अनिल अग्रवाल के लिए अनजान जगह थी और उन्हें कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा था. हालांकि अनिल अग्रवाल खुद भी कहते हैं कि मुंबई सपने को सच करने वाला शहर है. लंदन पहुंचने के बाद भी मुंबई से अनिल अग्रवाल का नाता नहीं टूटा. वह कहते हैं, 'जब मैं लंदन पहुंचा तो मेरे पास बहुत कुछ नहीं था, लेकिन मेरे पास एक चीज थी- विश्वास और मेरे मार्गदर्शक पिता का आशीर्वाद. शायद इसलिए मैं यहां अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अपने जीवन के इस नए दौर का आनंद ले रहा था. कैब में बैठे हुए मैंने बाहर का नजारा देखा तो मुझे डबल डेकर बसें नजर आईं, वैसी ही जैसी बॉम्बे में हुआ करती थीं. बस, फिर क्या था... मेरे चेहरे पर बड़ी सी मुस्कुराहट खेल गई. मैं अब आशंका छोड़ चुका था. पहली बार बॉम्बे पहुंचने पर खाली हाथ शुरू की गई यात्रा को मैं सफल बना चुका था, तो वो काम दूसरी बार करने में डर कैसा!'

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