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Explainer: सब्जियों-फलों पर MSP का क्या होगा असर? केरल में तैयारी, कई राज्यों में मांग 

केरल सरकार ने अब सब्जियों एवं फलों के लिए भी न्यूनतम सम​र्थन मूल्य (MSP)  निश्चित करने का ऐलान किया है. कर्नाटक सरकार भी ऐसी मांग पर विचार कर रही है और पंजाब में भी ऐसी मांग हो रही है. महाराष्ट्र में भी समय-समय पर ऐसी मांग उठती रही है.

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सब्जियों की भी एमएसपी लागू करेगी केरल सरकार
सब्जियों की भी एमएसपी लागू करेगी केरल सरकार
स्टोरी हाइलाइट्स
  • केरल सरकार फलों-सब्जियों की MSP लागू करेगी
  • अभी देश में कहीं भी ऐसी व्यवस्था नहीं है
  • केंद्र सरकार 23 फसलों की MSP जारी करती है

केरल सरकार ने अब सब्जियों एवं फलों के लिए भी न्यूनतम सम​र्थन मूल्य (MSP)  निश्चित करने का ऐलान किया है. इससे किसानों को मदद मिलेगी और कृषि क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलेगा. आइए जानते हैं कि एमएसपी क्या होती है और क्या है यह पूरा मसला? 

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गौरतलब है कि कर्नाटक सरकार भी ऐसी मांग पर विचार कर रही है और पंजाब में भी ऐसी मांग हो रही है. महाराष्ट्र में भी समय-समय पर ऐसी मांग उठती रही है.पंजाब के किसान संगठनों ने हाल में राज्य सरकार से मांग की है ​कि सब्जियों एवं फलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया जाए. कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने भी इस मांग का समर्थन किया है. उन्होंने मांग की है कि पंजाब सरकार राज्य में पैदा होने वाली दालों, सब्जियों और तिलहन के लिए एमएसपी जारी करे. 

क्या कहा केरल सरकार ने 

केरल सरकार 16 सब्जियों एवं फलों के लिए एमएसपी लागू करेगी जो 1 नवंबर से लागू होगा. राज्य सरकार फलों-सब्जियों के उत्पादन की लागत के आधार पर एमएसपी का निर्धारण करेगी. यह इस साल के लिए लागत का करीब 120 फीसदी होगी, लेकिन आगे हर साल इसकी समीक्षा की जाएगी. 

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इनमें नाशपत्ती, खीरा, टमाटर, पत्तागोभी, गाजर, टमाटर, बीन्स, लहसुन, चुकंदर जैसी फल-सब्जियां हैं. कहा जा  रहा है कि इससे राज्य में फलों एव सब्जियों के उत्पादन में बढ़त होगी. 

महाराष्ट्र में भी समय-समय पर ऐसी मांग उठती रही है. महाराष्ट्र में खासकर अंगूर, टमाटर, प्याज जैसी फसलों के किसान काफी परेशान रहते हैं. कुछ साल पहले यह देखा गया था कि किसानों को अंगूर 10 रुपये किलो बेचना पड़ा, जबकि उनकी लागत 40 रुपये प्रति किलो तक आ रही थी. 

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क्या है न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

न्यूनतम समर्थन मूल्य वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर सरकार किसानों द्वारा बेचे जाने वाले अनाज की पूरी मात्रा खरीदने के लिये तैयार रहती है. यह एक तरह से ​कृषि उपजों के लिए आधार मूल्य का काम करता है और यह अपेक्षा की जाती है कि बाजार में भी फसलों का दाम किसान को इससे कम नहीं मिलेगा. इससे उम्मीद की जाती है कि किसान बिचौलियों के शोषण से बचेगा.

अभी केंद्र सरकार 23 फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है, लेकिन इनमें सब्जियां एवं फल नहीं होते. न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा सरकार द्वारा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की संस्तुति पर साल में दो बार रबी और खरीफ की फसल के लिए की जाती है. यह ऐलान फसलों की बुवाई से पहले किया जाता है. 

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हाल में कृषि बिल के विरोध में किसान आंदोलन हुए उनमें भी कृषि उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी देना किसानों की प्रमुख मांग थी. 

क्या होगा एमएसपी का फायदा 

ऐसा माना जा है ​कि सब्जियों और फलों की केरल में एमएसपी तय करने से वहां के किसान फल एवं सब्जियां उगाने को प्रेरित होंगे. वरिष्ठ पत्रकार और एग्रीकल्चर एक्सपर्ट हरवीर सिंह कहते हैं, 'इससे निश्चित रूप से केरल के किसानों को राहत मिलेगी. उन्हें यह भरोसा मिलेगा कि वे अपनी उपज का एक निश्चित मूल्य हासिल करेंगे. उनकी आमदनी बढ़ेगी जिससे वे सब्जियों-फलों के भंडारण पर भी ज्यादा पैसा खर्च कर पाएंगे. इससे उपभोक्ता पर बहुत असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह तो पहले से ही ज्यादा कीमत दे रहा है, जबकि किसानों को वाजिब कीमत नहीं मिलती.'  

भारत में कब शुरू हुई व्यवस्था 

किसी भी फसल की एमएसपी से किसानों में एक तरह से वाजिब कीमत मिलने का भरोसा पैदा होता है और वे इसे उगाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं. भारत में सबसे पहले साल 1966-67 में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की गई थी. तब देश में हरित क्रांति की शुरुआत हुई थी और अनाज की तंगी से जूझ रहे देश में कृ​षि उत्पादन बढ़ाना सबसे प्रमुख लक्ष्य था.

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केंद्र सरकार द्वारा फसलों की एमएसपी तय करने में मुख्य आधार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिश होती है. इसके अलावा सरकार राज्य सरकारों और संबंधित मंत्रालयों की राय भी जानती है. कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की स्थापना साल 1965 में की गई थी. 

 

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