वस्तु एवं सेवा कर (GST) काउंसिल की 41वीं बैठक 27 अगस्त को संपन्न हुई. मुआवजे की राज्यों की मांग पर केंद्र ने कर्ज लेने का विकल्प पेश कर दिया है. राज्यों से कर्ज लेकर समस्या दूर करने को कहा जा रहा है. यह जीएसटी के इतिहास का सबसे बड़ा संकट बनता दिख रहा है.
वित्त मंत्री ने बताया कि पांच घंटे तक चली बैठक में राज्यों को 2 विकल्प दिए गए हैं. पहला, रिजर्व बैंक की सलाह से राज्यों को एक विशेष विंडो दिया जाए ताकि वे वाजिब ब्याज दर पर 97,000 करोड़ रुपये रकम उधार हासिल कर पाएं. दूसरा, राज्य एक विशेष विंडो के द्वारा समूचे जीएसटी कम्पेनसेशन की कमी के बराबर यानी 2.35 लाख करोड़ रुपये का उधार ले सकें.
इन दोनों विकल्पों पर अब राज्य 7 दिनों के भीतर अपनी राय देंगे. यानी सात दिन के बाद एक फिर संक्षिप्त बैठक होगी. यह कहा गया कि राज्य बाजार से उधार लें और इसे बाद में किस तरह से चुकाया जाए, इस पर जीएसटी काउंसिल विचार करेगी. असल में केंद्र यह उम्मीद लगाए बैठे है कि अगले पांच साल में हालात जब काफी सुधर जाएंगे तो राजस्व के मोर्चे पर भी सरकार मजबूत हो जाएगी, तब कोई रास्ता निकाल लिया जाएगा.
यह ऐसे ही है कि जैसे कोई व्यक्ति यह सोचकर मोटा कर्ज ले कि अगले वर्षों में उसकी सैलरी जब बढ़ जाएगी तो वह आसानी से कर्ज चुका देगा. लेकिन अगर कोई आर्थिक संकट आया या मंदी कई साल तक जारी रही तो क्या होगा, इसके बारे में सरकार कुछ नहीं सोच रही.
क्या यह जीएसटी की भावना के खिलाफ नहीं है?
सरकार के इस प्रस्ताव को लेकर राज्यों, खासकर विपक्ष शासित राज्यों से कड़ी प्रतिक्रिया भी आनी शुरू हो गई है. कांग्रेस शासित राज्यों ने केंद्र सरकार के प्रस्ताव के बाद कहा कि केंद्र सरकार 'आम सहमित आधारित निर्णय प्रक्रिया से दूर हट रही है और अपनी मर्जी थोप रही है.'
यही नहीं, कर्नाटक और बिहार की बीजेपी की सरकारों का भी यह मानना है कि इस मामले में और सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए. कांग्रेस नेता वी नारायण सामी ने एक अखबार को बताया कि इस बैठक में कर्नाटक के वित्त मंत्री ने केंद्र सरकार से कहा कि उसे खुद उधार लेकर राज्यों को मुआवजा देना चाहिए.
पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने कहा, 'हम पर केंद्र अपना निर्णय थोप रहा है. हमार यह मानना है कि केंद्र सरकार को अपने समेकित निधि से एक-तिहाई हिस्सा देना चाहिए और बाकी हिस्सा राज्य छठे या सातवें साल में उधार ले सकते हैं. हमारे सामने सिर्फ एक विकल्प रखा गया है और वह भी संतोषजनक नहीं है.
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने भी इसे जीएसटी समझौते की भावना के खिलाफ बताया है. बिजनेस पोर्टल ब्लूमबर्ग से गर्ग ने कहा, 'केंद्र सरकार को उधार लेकर राज्यों को जीएसटी राजस्व में कमी का भुगतान करना चाहिए. यह साल 2016-17 में किए गए वायदे के अनुरूप ही होगा.'
गहरे संकट में जीएसटी
इंडिया टुडे हिंदी के संपादक अंशुमान तिवारी ने कहा, 'केंद्र ने लगभग ये साफ कह दिया कि वह 2.35 लाख करोड़ रुपये का मुआवजा नहीं दे पाएगी, जबकि जीएसटी समझौते में कहा गया था कि नुकसान की भरपाई की जाएगी. राज्यों को जीएसटी के लिए मनाने का आधार ही यही था.'
उन्होंने आगे कहा, 'जीएसटी के दौर की यह पहली बड़ी मंदी है. इसमें जीएसटी के अस्तित्व को लेकर गहरा सवाल खड़ा हुआ है. जीएसटी का कलेक्शन उम्मीद से बहुत कम हुआ है. अनुपालन में भी ढील होने लगी है. अब मुआवजे का संकट आ गया है. क्या जीएसटी मंदी के बाद अस्तित्व में रह पाएगा? मंदी जितनी गहराएगी, राज्यों का राजस्व जितना कम होगा, उतना ही इसके अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े होंगे. कुछ राज्यों ने तो कहना भी शुरू कर दिया है कि इससे अच्छी पुरानी व्यवस्था थी.
दिल्ली सरकार ने बताया धोखा
जीएसटी काउंसिल की बैठक में शामिल होने के बाद दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि जीएसटी लागू करते वक्त भरोसा दिया गया था कि राज्यों के नुकसान की भरपाई की जाएगी, लेकिन अब केंद्र सरकार अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से भाग रही है. मनीष सिसोदिया ने आजादी के बाद राज्यों के साथ केंद्र का सबसे बड़ा धोखा बताते हुए मुआवजा की व्यवस्था करने की मांग की. उन्होंने कहा कि दिल्ली को कर्ज लेने का अधिकार नहीं है. केंद्र खुद आरबीआई से कर्ज लेकर राज्यों का मुआवजा दे.
राज्य क्यों लेना चाहेंगे कर्ज
गौरतलब है कि कोरोना संकट की वजह से राज्यों की वित्तीय हालत वैसे भी काफी खराब है. हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि केंद्र और राज्य सरकारों का कर्ज, जीडीपी के 91 फीसदी तक पहुंच गया था. ऐसे में राज्य और कर्ज क्यों लेना चाहेंगे, भले ही उन्हें इसे चुकाने में सहूलियत मिले. इसीलिए कई राज्य सरकारों की यह मांग है कि केंद्र खुद कर्ज लेकर यह मुआवजा चुकाए.