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लैब में बने हीरों के आगे पस्त हुए असली डायमंड, कारोबार में आई 10% की गिरावट

Real Diamond Vs Lab Grown Diamond : लैब ग्रोन डायमंड को लैबोरेटरी में बनाया जाता है और ये महज 1 से 4 सप्ताह में तैयार हो जाते हैं. ऐसे डायमंड्स की बनावट, चमक, कलर, कटिंग, डिजाइन एकदम प्राकृतिक हीरे जैसी होती है और इसकी बिक्री भी बाकायदा सर्टिफिकेट के साथ की जाती है.

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लैब ग्रोन डायमंड की डिमांड में आ रही तेजी
लैब ग्रोन डायमंड की डिमांड में आ रही तेजी

असली हीरों के कारोबार को लैब ग्रोन डायमंड (LGD) ने कड़ी टक्कर देना शुरू कर दिया है. लैब में बनाए गए इन कृत्रिम हीरों की डिमांड बढ़ने से असली हीरों के कारोबार (Real Diamond Business) में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. डायमंड उद्योग की मानें तो अप्रैल के बाद एक्सपोर्ट में भी इतनी ही यानी 10% की कमी आई है. हालांकि इस गिरावट में लैब ग्रोन डायमंड का अगर बड़ा रोल है तो बाकी योगदान अमेरिका, यूरोप और चीन में जारी आर्थिक सुस्ती का माहौल और रूस पर लगे प्रतिबंध से रफ डायमंड की सप्लाई में आई कमी का भी है. 

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LGD की कीमत बनी गेम चेंजर
लैब ग्रोन डायमंड (Lab Grown Diamonds) की बढ़ती लोकप्रियता की वजह है इसकी कीमत. दरअसल, असली हीरे जैसा दिखने वाला ये लैब में बना हीरा कीमत के मामले में रियल डायमंड के 10% के बराबर भी नहीं है. अगर कोई असली हीरा 10 लाख में मिल रहा है तो LGD महज 40 से 60 हजार रुपये में मिल जाता है. इसकी वजह से हीरा पहनने का शौक रखने वालों के लिए इन्हें खरीदना बेहद आसान हो गया है. इसके साथ ही कई लोग चोरी हो जाने या खो जाने के डर से भी महंगा हीरा खरीदने की जगह हुबहू असली जैसा दिखने वाला लैब ग्रोन डायमंड खरीद रहे हैं. 

लैब ग्रोन डायमंड को लैबोरेटरी में बनाया जाता है और ये महज 1 से 4 सप्ताह में तैयार हो जाते हैं. ऐसे डायमंड्स की बनावट, चमक, कलर, कटिंग, डिजाइन एकदम प्राकृतिक हीरे जैसी होती है और इसकी बिक्री भी बाकायदा सर्टिफिकेट के साथ की जाती है. 

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शादियों में भी बढ़ा LGD का चलन
नए दौर में युवाओं में लैब ग्रोन डायमंड की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है. अब एंगेजमेंट रिंग के लिए भी असल डायमंड के मुकाबले LGD को तरजीह मिलने लगी है. लेकिन ये कारोबार भारत के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है. लैब ग्रोन डायमंड का ग्लोबल मार्केट 22 अरब डॉलर का है. भारत के लिए अपनी कारीगरी और वैल्यू एडिशन से इस बाजार पर कब्जा जमाने का बेहतरीन मौका है. इसमें मददगार साबित हो रही है डबल डिजिट की घरेलू खपत और ग्लोबल खपत.

हालांकि जिन कीमतों के दम पर ये मार्केट बढ़ रहा है उसके लिए फिलहाल रियल डायमंड की कीमतों (Real Diamond Price) में आई कमी भी चुनौती बन सकती है. लेकिन जानकारों का मानना है कि क्रिसमस तक ये बाजार फिर से तेजी पकड़ सकता है जिसका फायदा आखिरकार लैब ग्रोन डायमंड को ही मिलेगा. 

भारत से ज्यादा विदेशों में मांग
भारतीयों के लिए सोना-चांदी-हीरों से बने जवाहरातों का मू्ल्य बेहद खास है. भारतीय ज्वैलरी भी खरीदते हैं तो उसके साथ जुड़ा निवेश उनको फैसला करने में मदद करता है. ऐसे में भारतीयों के लिए लैब में बना डायमंड बजट के लिहाज से भले ही मुफीद हो, लेकिन निवेश के मामले में ये ज्यादा आकर्षक नहीं होता. भारत की जिस नौकरीपेशा आबादी के बीच लैब ग्रोन हीरों का बड़ा मार्केट तैयार हो रहा है वो भी अब वैल्यू पर फोकस कर रहे हैं. वहीं जैसे ही बात अमेरिका जैसे विकसित देशों की होती है तो एकदम से सारे समीकरण बदल जाते हैं.

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इन देशों में Lab Grown Diamonds की ब्रांडिंग ही इसको पर्यावरण के हिसाब से सुरक्षित बताकर की गई है. वहां के खरीदारों के ज्यादा जागरूक होने से लैब ग्रोन डायमंड अमेरिका-यूरोप में अपनी पैठ बना रहा है. इन मुल्कों में लोगों के लिए पैसों से पहले पर्यावरण की सुरक्षा का ख्याल रहता है जो LGD की बढ़ोतरी में मददगार साबित हो रहा है. लेकिन अभी तो जिस तरह से महंगाई और आर्थिक सुस्ती का माहौल देखने को मिल रहा है, उसे देखते हुए लोगों को लैब वाले हीरे का ऑप्शन फायदेमंद नजर आ रहा है.

 

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