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महंगाई की मार...सरकार ने इस महीने लिए 5 ताबड़तोड़ फैसले, जानें कब तक मिलेगी राहत

अप्रैल 2022 में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) की दर 7.8 फीसदी रही, जो मई 2014 के बाद सबसे ज्यादा है. इसी तरह अप्रैल 2022 में थोक महंगाई (Wholesale Inflation) की दर बढ़कर 15.08 फीसदी पर पहुंच गई, जो दिसंबर 1998 के बाद सबसे ज्यादा है. अप्रैल महीने में रिकॉर्ड महंगाई के लिए फूड एंड फ्यूल इंफ्लेशन जिम्मेदार रहे.

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जल्द राहत की उम्मीद (Photo: Reuters)
जल्द राहत की उम्मीद (Photo: Reuters)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मई 2014 के बाद सबसे ज्यादा खुदरा महंगाई
  • थोक महंगाई दिसंबर 1998 के बाद के हाई पर
  • ताजा फैसलों से जल्द मिलेगी लोगों को राहत

दुनिया के कई अन्य देशों की तरह भारत भी इन दिनों महंगाई (Inflation) की मार से परेशान है. चाहे बात थोक महंगाई (WPI) की करें या आम लोगों की जेब पर सीधे डाका डालने वाली खुदरा महंगाई (CPI) की, दोनों ही अभी कई सालों के उच्च स्तर पर हैं. महंगाई वाले पुराने दिन लौट आने से न सिर्फ आम लोग परेशान हैं, बल्कि इसके चलते सरकार की भी नींद उड़ी हुई है. बीते कुछ दिनों में सरकार ने महंगाई को काबू करने के लिए जिस तरह से ताबड़तोड़ फैसले लिए हैं, उससे भी ये बात साफ होती है. आइए जानते हैं कि सरकार एक के बाद एक कड़े फैसले लेने पर क्यों मजबूर है और इन फैसलों से जनता को किस हद तक राहत मिल पाएगी.

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इन कारणों से रिकॉर्ड उच्च स्तर पर महंगाई

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2022 में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) की दर 7.8 फीसदी रही, जो मई 2014 के बाद सबसे ज्यादा है. इसी तरह अप्रैल 2022 में थोक महंगाई (Wholesale Inflation) की दर बढ़कर 15.08 फीसदी पर पहुंच गई, जो दिसंबर 1998 के बाद सबसे ज्यादा है. अप्रैल महीने में रिकॉर्ड महंगाई के लिए फूड एंड फ्यूल इंफ्लेशन जिम्मेदार रहे. फूड इंफ्लेशन की बात करें तो यह मार्च के 7.68 फीसदी की तुलना में उछलकर अप्रैल में 8.38 फीसदी पर पहुंच गई. दरअसल रूस और यूक्रेन के बीच 3 महीने से भी ज्यादा समय से जारी लड़ाई (Russia Ukraine War) और चीन में महामारी की नई लहर ने ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) को तबाह कर दिया है. इसके चलते खास तौर पर खाने-पीने की चीजों और डीजल-पेट्रोल के दाम बेतहाशा बढ़े हैं.

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खुदरा महंगाई में फूड एंड फ्यूल का इतना योगदान

खुदरा महंगाई के बास्केट (CPI Basket) को देखें तो इसमें सबसे ज्यादा वेटेज फूड आइटम्स का है. अकेले फूड बास्केट (Food Basket) खुदरा महंगाई में 39.06 फीसदी योगदान देता है. इसी तरह फ्यूल एंड पावर बास्केट (Fuel & Power Basket) का वेटेज 13.15 फीसदी है. साफ है कि महज ये दो बास्केट खुदरा महंगाई में आधे से भी ज्यादा हिस्सा रखते हैं. अभी क्रूड ऑयल के दाम कई महीनों से लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बने हुए हैं. भारत पेट्रोलियम उत्पादों (Petroleum Products) के मामले में आयात पर निर्भर देश है. इस कारण जैसे ही ग्लोबल मार्केट में क्रूड (Crude Oil) ऊपर जाता है, भारत में डीजल-पेट्रोल के दाम (Diesel Petrol Prices) बढ़ने लग जाते हैं. रूस और यूक्रेन दोनों ही देश गेहूं समेत कई अनाजों के सबसे बड़े निर्यातकों में शामिल हैं. दोनों देशों के बीच जारी लड़ाई के चलते अनाजों के निर्यात का संतुलन बिगड़ा है और कई देशों में खाने-पीने की चीजों की कमी होने लग गई है. भारत में भी इन ग्लोबल फैक्टर्स ने फूड और फ्यूल दोनों बास्केट को ऊपर चढ़ाया है, जिसका असर साफ तौर पर खुदरा महंगाई के आंकड़ों में दिख रहा है. यही कारण है कि सरकार के हालिया फैसले सीधे इन्हीं दो बास्केट पर फोकस्ड हैं.

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गेहूं के निर्यात पर रोक (Wheat Export Ban): केंद्र सरकार ने वैश्विक बाजारों में गेहूं के बढ़े भाव का फायदा उठाने के लिए पहले इसके निर्यात पर फोकस किया. भारत ने अपने पारंपरिक बाजारों को छोड़ कई नए बाजारों में भी एंट्री ली. इसी बीच भयानक हीट वेव रबी फसलों की उपज पर संकट लेकर आ गया. दूसरी ओर नए बाजारों में निर्यात की राह खुलने से डिमांड बढ़ी, जिसके कारण घरेलू बाजार में भी गेहूं के दाम बढ़ने लगे. बदली परिस्थितियों में केंद्र सरकार ने 13 मई को अचानक से सारे प्राइवेट गेहूं निर्यात पर रोक लगाने का फैसला लिया. यह फैसला इस लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है कि हीट वेव के कारण 2022-23 में गेहूं की टोटल उपज का अनुमान 113.5 मिलियन टन से घटकर 105 मिलियन टन रह गया है.

डीजल-पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में कमी (Diesel Petrol Excise Duty Cut): महंगे क्रूड ऑयल के कारण सरकारी तेल कंपनियां लगातार डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़ा रही थीं. इस कारण देश के ज्यादातर हिस्सों में पेट्रोल के दाम 100 रुपये लीटर के पार निकल गए थे. यहां तक कि कई जगहों पर डीजल भी 100 रुपये लीटर के पार निकल गया था. रिकॉर्ड महंगाई के बीच डीजल-पेट्रोल के दाम इस तरह बढ़ जाने से आम लोगों पर सीधा असर हो रहा था. केंद्र सरकार ने लोगों को राहत देने के लिए इस महीने एक बार फिर से डीजल-पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी कम करने का निर्णय लिया. यह ऐलान भी अचानक रविवार (22 मई) को किया गया. सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में 8 रुपये और डीजल पर 6 रुपये की कटौती की. डीजल-पेट्रोल के दाम का व्यापक असर होता है और इससे लगभग हर चीजों के दाम प्रभावित होते हैं. एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद सामानों की ढुलाई की लागत में भी कमी आने की उम्मीद है.

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खाने के तेल पर ड्यूटी में कटौती (Duty Cut On Edible Oils): खुदरा महंगाई के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि फूड बास्केट को चढ़ाने में खाने के तेल की अधिक कीमतों का खासा योगदान है. इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने सबसे पहले पॉम ऑयल पर ड्यूटी को घटाकर अब तक के सबसे निचले स्तर पर ला दिया. सबसे पहले पिछले साल दिसंबर में इसे घटाकर 12.5 फीसदी किया गया. बाद में इसे और घटाकर फरवरी में 5.5 फीसदी कर दिया गया. इंडोनेशिया में पॉम ऑयल के निर्यात पर लगी रोक को हटाए जाने से भी भारत को राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि भारत सबसे ज्यादा इसी देश से पॉम ऑयल खरीदता है. इसके अलावा सरकार ने खाने के तेलों के दाम को काबू करने के लिए पॉम ऑयल के अलावा अन्य तेलों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की योजना तैयार की. इसे प्रभाव में लाने के लिए 24 मई को सरकार ने फिर से एक बड़ा फैसला लिया. सरकार ने क्रूड सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल के सालाना 20 लाख मीट्रिक टन के आयात पर कस्टम ड्यूटी और एंग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस को पूरी तरह से हटा दिया. इसके अलावा कुछ रॉ मटीरियल्स पर भी ड्यूटी में कमी की गई.

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चीनी के निर्यात पर रोक (Sugar Export Ban): इसी मंगलवार को भारत सरकार ने महंगाई को काबू करने के लिए एक और बड़े फैसले का ऐलान किया. देश में चीनी का पर्याप्त भंडार सुनिश्चित करने के लिए छह साल में पहली बार इसके निर्यात पर रोक लगाई गई. इस फैसले के बाद भारत से चीनी का निर्यात 01 जून से बंद हो जाएगा. नए फैसले के बाद अब चालू सीजन में चीनी के निर्यात का आंकड़ा 100 LMT के आस-पास रह जाएगा. ऐसा होने पर घरेलू इस्तेमाल के लिए 60-65 LMT चीनी बचे रहने के अनुमान हैं. भारत में चीनी की औसत मासिक खपत करीब 24 LMT है. इस तरह देखें तो सरकार चालू सीजन समाप्त होने तक कम से कम 2-3 महीने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक में रखना चाहती है. इस फैसले से चीनी के दाम पर लगाम लगेगी और घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता बनी रहेगी.

रेपो रेट में बढ़ोतरी (Repo Rate Hike): रिजर्व बैंक ने इस महीने की शुरुआत में अचानक से एमपीसी की आपात बैठक की. बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बताया कि एमपीसी ने रेपो रेट को 0.40 फीसदी बढ़ाने का निर्णय लिया है. इसके बाद रेपो रेट बढ़ गया और इसकी दर 4.40 फीसदी हो गई. करीब 4 साल बाद पहले रेपो रेट को बढ़ाया गया और 2 साल में पहली बार इसमें कोई बदलाव किया गया. कोरोना महामारी को देखते हुए सेंट्रल बैंक ने रेपो रेट को लगातार घटाया था औ यह रिकॉर्ड 4 फीसदी के निचले स्तर पर था. जून में एमपीसी की होने वाली बैठक में भी रेपो रेट को और बढ़ाने के संकेत साफ हैं. रेपो रेट बढ़ने से मार्केट में अनावश्यक डिमांड पर ब्रेक लगता है, जो अंतत: महंगाई को कम करने में अहम साबित होता है.

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इतनी कम हो सकती है खुदरा महंगाई

अब सवाल उठता है कि जब रेपो रेट बढ़ाने से महंगाई काबू हो सकती है, तो सरकार इसके बाद भी बजट पर बोझ डालकर क्यों अपने राजस्व के स्रोत को कम कर रही है? दरअसल रेपो रेट बढ़ाने से हर तरह के ब्याज महंगे हो जाते हैं. कैपिटल कॉस्ट बढ़ने से डिमांड तो काबू होती है, लेकिन यह ग्रोथ रेट पर उल्टा असर डालता है. सरकार चाहती है कि महंगाई भी काबू में रहे और ग्रोथ रेट पर भी बुरा असर नहीं पड़े. ऐसा तभी संभव है कि महंगाई को काबू करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने के बजाय अन्य उपाय किए जाएं. इसी कारण सरकार ताबड़तोड़ फैसले ले रही है. केंद्र सरकार चाहती है कि अगले एक महीने में खुदरा महंगाई की दर उसके प्रयासों से 0.60-0.70 फीसदी तक नीचे आ जाए. अगर ऐसा होता है तो रिजर्व बैंक के ऊपर रेपो रेट को ज्यादा बढ़ाने का प्रेशर नहीं होगा.

 

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