
अमेरिका में जो बाइडेन ने बुधवार को 46वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली. इसी के साथ अमेरिका में बाइडेन युग की शुरुआत हो गई. इस सत्ता परिवर्तन पर दुनिया भर की नजर थी. ऐसी उम्मीद की जा रही है जो बाइडेन के आने से अमेरिका में आर्थिक नीतियों के मामले में स्थायित्व का एक दौर आएगा और इसका फायदा पूरी दुनिया काे होगा. उनके आने से खासकर भारत-अमेरिका के बीच कारोबारी रिश्ते और मजबूत होने की उम्मीद की जा रही है.
व्यापार के मामले में इससे भारत-अमेरिका रिश्तों में भारी बदलाव हो सकता है. अमेरिका उन कुछ देशों में से है जिनके साथ भारत का व्यापार घाटा नहीं बल्कि अधिशेष यानी ट्रेड सरप्लस है. इसका मतलब यह है कि अमेरिका से भारत में सामान के आयात के मुकाबले भारत वहां निर्यात ज्यादा करता है.
क्या हैं चुनौतियां
हालांकि यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि व्यापारिक रिश्तों में तत्काल कोई बड़ा बदलाव आ जाएगा या अमेरिका भारत को तुरंत कोई बड़ी रियायत दे देगा. इसकी वजह यह है कि कोविड से निपटने में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हालत पहले ही काफी खराब है और वहां बेरोजगारी काफी बढ़ी है.
ऐसा माना जा रहा है बाइडेन ऐसी स्थायी और अनुकूल नीतियां बनाएंगे जो वैश्विक व्यापार के लिए फायदेमंद होगा और इसका लाभ भारत को भी मिलेगा. गौरतलब है कि ट्रंप ने व्यापारिक मामलों को काफी अस्थायी तरीके से डील किया था. वे हार्ले डेविसन पर इम्पोर्ट ड्यूटी जैसे मामलों को लेकर काफी अड़ियल रवैया अपनाते रहे. राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट की अपनी संरक्षणवादी नीतियों की वजह से एच-1 वीजा में लगातार कटौती की थी. इसका सबसे ज्यादा भारतीय प्रोफेशनल्स को नुकसान हुआ था.
ऐसा माना जा रहा है कि बाइडेन कोविड के बाद अमेरिकी की इकोनॉमी को बेहतर तरीके से संभाल पाएंगे और इसका फायदा पूरी दुनिया की इकोनॉमी को होगा. भारत को उम्मीद है कि वीजा मानकों में नरमी और व्यापार नीतियों में नरमी होगी.
हालांकि अभी यह भी देखना होगा कि बाइडेन अपनी नीतियों को किस तरह से आगे बढ़ा पाते हैं कि क्योंकि सीनेट में डेमोक्रेट का बहुत मामूली बहुमत है. अमेरिका में भारी बेरोजगारी को देखते हुए इस बात के लिए दबाव बढ़ सकता है कि वीजा मामले में अभी नरमी न बरती जाए.
अंतरराष्ट्रीय रिश्ते सुधरने का फायदा
ट्रंप के कार्यकाल के दौरान खासकर ईरान और चीन से अमेरिका के रिश्ते काफी बिगड़ गये थे. चीन से अमेरिका के बीच कई साल तक जारी ट्रेड वॉर की वजह से दुनिया की अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ था और भारत पर भी इसका विपरीत असर पड़ा था. अब उम्मीद है कि जो बाइडेन इस मामले में किसी तरह का अड़ियल रवैया न अपना कर स्थायी नीतियां लागू करने की कोशिश करेंगे.
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तेल एवं नवीकरणीय ऊर्जा में बेहतरी की उम्मीद
इसी तरह अगर बाइडेन ने ईरान के साथ रिश्ते बेहतर किये और उस पर लगे प्रतिबंधों में नरमी बरती तो भारत के लिए कच्चा तेल सस्ता हो सकता है, हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल कीमतों में तेजी को देखते हुए यह काफी राहत वाली बात होगी.
बाइडेन ने आते ही पेरिस जलवायु समझौते पर आगे बढ़ने काे मंजूरी दे दी है. इसका भी भारत को फायदा मिलेगा, क्योंकि रीन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में फंडिंग और टेक्नोलॉजी शेयरिंग के नए अवसर हासिल होंगे.
फार्मा इंडस्ट्री को फायदा
बाइडेन ने अपने इलेक्शन मैनिफेस्टो में कहा था कि वे हेल्थकेयर पर खर्च बढ़ाएंगे और अफोर्डेबल केयर एक्ट यानी ओबामाकेयर का विस्तार करेंगे. इन दोनों कदमों का भारत के दवा उद्योग को काफी फायदा हो सकता है. भारत से बड़े पैमाने पर अमेरिका को जेनरिक दवाओं की आपूर्ति की जाती है.
शेयर बाजार पर क्या होगा असर
अमेरिका में चुनाव नतीजे आने के बाद से ही शेयर बाजार मजबूत होने लगा है, इससे भारतीय शेयर बाजारों को कुछ नुकसान हो सकता है कि क्योंकि अब दुनिया से जो बड़े पैमाने पर पैसा भारतीय शेयर बाजार में आ रहा था उसमें कमी आ जाएगी और वह अमेरिकी बाजारों की ओर रुख करेगा.
क्या हैं अनसुलझे मसले
भारत-अमेरिका के बीच कई अनुसुलझे मसले हैं. अमेरिका ने भारत को अपने जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रीफरेंस (GSP) के फायदों से बाहर कर दिया है और भारत फिर से यह फायदे चाहता है. दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) जैसी बड़ी ट्रेड डील करने की कोशिश वर्षों से हो रही है लेकिन इसमें लगातार अड़चनें आती रही है, अब कोशिश इस बात की होगी कि बड़ी न सही कम से कम तत्काल के लिए एक छोटी ट्रेड डील कर ली जाए.
अमेरिका भारत पर कई तरह के लेबर और एनवायरमेंट मानक लागू करने का दबाव बना रहा है जिसे मानना भारत के लिए संभव नहीं है. बाइडेन ने यह साफ कहा है कि वह तब तक किसी एफटीए पर आगे नहीं बढ़ेंगे, जब तक अमेरिकी कामगारों की प्रतिस्पर्धात्मकता की बहाली नहीं हो जाती.
भारत अब चीन को पछाड़कर दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र बनना चाहता है.भारत-अमेरिका रिश्ते सुधरने से यह संभव हो सकेगा और यह आत्मनिर्भर भारत के लिहाज से भी फायदेमंद रहेगा.
अमेरिका के साथ बेहतरीन व्यापार
पिछले 20 साल में भारत का लगातार अमेरिका के साथ ट्रेड सरप्लस बना हुआ है. साल 2001-02 में यह ट्रेड सरप्लस 5.2 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 38 हजार करोड़ रुपये) था जो बढ़कर साल 2019-20 में 17.3 अरब डॉलर (करीब 1.27 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच गया है. साल 2017-18 में यह सबसे ज्यादा 21.2 अरब डॉलर था.
दुनिया से अमेरिका को होने वाले सर्विसेज निर्यात में भारत का हिस्सा करीब 5 फीसदी है. साल 2019 में अमेरिका का भारत से सर्विसेज का आयात 29.7 अरब डॉलर का रहा. पिछले 15 साल में इसमें करीब 14 फीसदी की सालाना दर से बढ़त हुई है. यही नहीं, पिछले दो दशकों में भारत में अमेरिका प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का पांचवां सबसे बड़ा स्रोत रहा है.