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सुप्रीम कोर्ट ने LIC आईपीओ पर रोक लगाने से इनकार किया

एलआईसी आईपीओ 04 मई को खुला था और 09 मई को बंद हुआ था. आज 12 मई को एलआईसी के शेयर अलॉट होने वाले हैं. इसके बाद अगले सप्ताह सरकारी बीमा कंपनी के शेयर बीएसई और एनएसई पर लिस्ट हो जाएंगे.

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आईपीओ पर नहीं लगी रोक
आईपीओ पर नहीं लगी रोक
स्टोरी हाइलाइट्स
  • LIC से जुड़ा है लोगों का अधिकार
  • सरकार ने किया याचिका का विरोध
  • पॉलिसी होल्डर्स से मिला बंपर रिस्पांस

सरकारी कंपनी LIC IPO की राह में अब एक नई मुश्किल खड़ी हो गई है. बीएसई (BSE) और एनएसई (NSE) पर एलआईसी के शेयरों की लिस्टिंग (LIC Share Listing) से पहले आईपीओ का विरोध कर रहे पॉलिसी होल्डर्स (Policy Holders) सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंच गए हैं. ये पॉलिसी होल्डर्स एलआईसी आईपीओ पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एलआईसी आईपीओ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है.

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एलआईसी के साथ जुड़ा है लोगों का अधिकार

एनजीओ People First ने पॉलिसी होल्डर्स की ओर से सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एक याचिका दायर की थी, जिसे सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए उसे गुरुवार को सुनवाई के लिए लिस्ट किया था. आज जब उच्चतम न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई तो पॉलिसी होल्डर्स की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने बहस की शुरुआत की. उन्होंने कहा कि सरकार ने जिस तरह से मनी बिल (Money Bill) लाकर एलआईसी आईपीओ लाने का वैधानिक रास्ता तैयार किया, इसके ऊपर भी विचार किए जाने की जरूरत है. उन्होंने कहा, 'एलआईसी के साथ लोगों के अधिकार जुड़े हुए हैं, ऐसे में आईपीओ लाने के लिए मनी बिल के जरिए रास्ता नहीं तैयार किया जा सकता है.'

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सरकार के बजट को बैलेंस करने में खर्च होगा पैसा

सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने भी बहस में हिस्सा लेते हुए एलआईसी आईपीओ के विरोध में दलीलें दीं. उन्होंने कहा कि पॉलिसी होल्डर्स से तथाकथित नॉन पार्टिसिपेटिंग सरप्लस के नाम पर 523 लाख करोड़ रुपये डायवर्ट किए जा रहे हैं. उन्होंने कहा, 'कंपनी का मालिकाना हक बदल रहा है और यह नए हाथों में जा रही है. इसे शेयर होल्डर्स को बेचा जा रहा है. इससे जो पैसा मिलेगा, वह पॉलिसी होल्डर्स के पास नहीं जाएगा. सारा पैसा भारत सरकार के बजट को बैलेंस करने में खर्च होगा.'

आईपीओ के पैसे पर पॉलिसी होल्डर्स का हक

इंदिरा जयसिंह ने कहा कि अगर सरकार एलआईसी को बेचना ही चाहती है तो इसके लिए डी-म्यूचुअलाइजेशन की प्रक्रिया को अपनाना चाहिए था. अगर किसी म्यूचुअल बेनेफिट वाली कंपनी को लीगली ज्वाइंट स्टॉक कंपनी में बदला जा रहा है तो इससे मिलने वाले पैसों पर पॉलिसी होल्डर्स का हक है. वैधानिक सवाल ये उठता है कि कंपनी का मालिक कौन है? वे ये नहीं कह सकते कि उन्होंने 2 फीसदी या 3 फीसदी शेयर पॉलिसी होल्डर्स को दिया है.

सरकार ने किया याचिका का विरोध

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने भारत सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि एलआईसी आईपीओ पर रोक नहीं लगाई जा सकती है. उन्होंने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इस मामले में कोई नोटिस नहीं दिया जा सकता है. उन्होंने, 'कृपया नियमों को देखिए. ये देखें कि इंश्योरेंस बिजनेस के सरप्लस को किस तरह से इस्तेमाल किया जाता है.'

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जयसिंह ने इसके जवाब में पूछा, 'पिछले 75 साल से क्या प्रैक्टिस रही है?' उन्होंने आगे जोड़ा, 'सरकार एलआईसी के पॉलिसी होल्डर्स के लिए ट्रस्टी की भूमिका में है. हमारे अधिकारों को इस तरह से नहीं कुचला जा सकता है. यह कहना वैलिड नहीं है कि हमने याचिका दायर करने में देरी की है.'

पॉलिसी होल्डर्स से मिला बंपर रिस्पांस

वैसे गौर करने वाली बात ये है कि इस आईपीओ को सभी कैटेगरी में इन्वेस्टर्स से बढ़िया रिस्पॉन्स मिला है. आईपीओ को सबसे ज्यादा सब्सक्रिप्शन पॉलिसी होल्डर्स की कैटेगरी में ही मिला. इस कैटेगरी में आईपीओ को 6.05 गुना सब्सक्राइब किया गया. इसी तरह एलआईसी के कर्मचारियों (LIC Employees) के लिए रिजर्व रखे गए हिस्से को 4.36 गुना सब्सक्राइब किया गया. रिटेल इन्वेस्टर्स (Retail Investors) का हिस्सा भी 1.97 गुना सब्सक्राइब किया गया. इनके अलावा QIB के लिए रखे गए हिस्से को 2.83 गुना और NII के हिस्से को 2.91 गुना सब्सक्राइब किया गया. कुल मिलाकर एलआईसी आईपीओ को 2.93 गुना सब्सक्रिप्शन मिला.

LIC IPO 04 मई को खुला था और 09 मई को बंद हुआ. देश में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी आईपीओ के लिए रविवार के लिए भी बिडिंग खुली रही. इस आईपीओ के माध्यम से सरकार ने LIC की 3.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बेची है और इसका आकार करीब 21,000 करोड़ रुपये का है. ये देश का अब तक का सबसे बड़ा आईपीओ है.

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