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​अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मोदी सरकार दे सकती है एक और राहत पैकेज 

कोरोना संकट की वजह से अर्थव्यवस्था की हालत खराब है. जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 24 फीसदी की गिरावट आई है, इसकी वजह से अभी और कदम उठाना सरकार के लिए मजबूरी है. इस बार वित्त मंत्रालय एक बार फिर अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ाने पर जोर दे सकता है.

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सरकार दे सकती है एक और राहत पैकेज
सरकार दे सकती है एक और राहत पैकेज
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अर्थव्यवस्था पटरी पर लाने की चुनौती
  • अनलॉक में दुरुस्त नहीं हो पाई इकोनॉमी
  • एक और राहत पैकेज लाना है जरूरी

केंद्र सरकार ने संकेत दिया है कि अर्थव्यवस्था को सही गति देने के लिए एक और राहत पैकेज दिया जा सकता है. सरकार के एक वरिष्ठ सूत्र ने आजतक को बताया कि एक और राहत पैकेज के विकल्प को अभी बंद नहीं किया गया है. 

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गौरतलब है कि पीएम नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत पैकेज को विपक्षी दल और कई अर्थशास्त्री अप्रभावी बता रहे हैं, इसके बावजूद सरकार एक और राहत पैकेज देने का संकेत दे रही है.  

मांग बढ़ाने पर जोर 

सूत्रों के मुताबिक, इस बार वित्त मंत्रालय एक बार फिर अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ाने पर जोर दे सकता है. इस सोमवार को ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ाने के लिए चार प्रमुख ऐलान किये थे. 

इनमें सरकारी कर्मचारियों को एलटीसी कैश वाउचर और फेस्टिवल एडवांस देने, राज्यों को 50 साल तक बिना ब्याज के कर्ज और केंद्र सरकार द्वारा 25 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त पूंजीगत व्यय. वित्त मंत्री ने बताया कि इन कदमों से अर्थव्यवस्था में करीब 73,000 करोड़ रुपये की मांग पैदा होगी. 

देखें: आजतक LIVE TV 

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क्यों जरूरी है राहत पैकेज 

कोरोना संकट की वजह से अर्थव्यवस्था की हालत खराब है. जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 24 फीसदी की गिरावट आई है, इसकी वजह से अभी और कदम उठाना सरकार के लिए मजबूरी है. 

वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पिछले महीने तक सरकार कोई नया पैकेज देने की इच्छुक नहीं दिख रही थी. लेकिन अनलॉक सभी राज्यों में एकरूपता के साथ लागू नहीं हो पाया है और सामान एवं लोगों की आवाजाही पर अभी भी कई तरह के अंकुश जारी हैं. इसकी वजह से अब सरकार को लग रहा है कि राहत पैकेज अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा प्रभावी हो सकता है. 

क्या हैं आशंकाएं 

हालांकि यह राहत पैकेज किस स्तर का हो यानी कितना हो, इसको लेकर कई तरह की आशंकाएं भी हैं. सरकार अपने राजकोषीय लक्ष्य से बहुत छेड़छाड़ नहीं करना चाहती. घाटे का लक्ष्य पहले से ही दूर होता जा रहा है. 

 

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