एनएसई (NSE) की पूर्व सीईओ का एक अज्ञात योगी (Faceless Yogi) के साथ विवादित कनेक्शन मामले में सेबी (SEBI) का फैसला आने के बाद कई एजेंसियां जांच कर रही हैं. मामला इतना व्यापक है कि अब जांच एजेंसियां भी अपना दायरा बढ़ा रही हैं. इस बारे में जांच अधिकारियों का कहना है कि एनएसई को-लोकेशन मामले (NSE Co-Location Case) में इस तरह का अरेंजमेंट किया गया था, जिसे क्रिकेट के सट्टे (Cricket Betting) की तरह चलाया जा रहा था.
ये था घोटाले का मोडस ओपेरांडी
एनएसई को-लोकेशन मामला करीब 1 दशक पुराना है. साल 2012 से 2014 के दौरान हुए इस घोटाले में कुछ फेवरेट ब्रोकर्स को बाकियों की तुलना में सर्वर का समय से पहले एक्सेस प्रोवाइड कराया गया था. ऐसे में तरजीही ब्रोकर्स बाकी कंपटीटर्स की तुलना में पहले ही सेकेंडरी सर्वर में लॉगइन कर लेते थे, जिससे उन्हें महत्वपूर्ण डेटा का एक्सेस पब्लिक के पास जाने से पहले ही मिल जाता था. ऐसे में जिन ब्रोकर्स को यह सुविधा दी गई, वे बाकी सभी से पहले ऑर्डर प्लेस कर मुनाफा बटोर ले रहे थे.
क्या है को-लोकेशन फैसिलिटी
को-लोकेशन घोटाले के बारे में जानने से पहले ये समझ लेना जरूरी है कि आखिर ये है क्या सिस्टम. स्टॉक एक्सचेंज में को-लोकेशन नाम की फैसिलिटी (Co-Location Facility) मुहैया कराई जाती है. यह दरअसल स्टॉक एक्सचेंज के सर्वर के ठीक बगल का स्पेस होता है. यहां हाई फ्रीक्वेंसी और एल्गो ट्रेडर्स (High Frequency & Algo Traders) अपना सिस्टम लगा पाते हैं. चूंकि को-लोकेशन फैसिलिटी एक्सचेंज के सर्वर के बेहद पास होती हैं, वहां मौजूद ट्रेडर्स की लैटेंसी बेहतर हो जाती है. ऑर्डर करने के बाद उसे एक्सीक्यूट होने में लगने वाले समय को लैटेंसी कहते हैं. लैटेंसी सुधर जाने से को-लोकेशन फैसिलिटी में मौजूद ट्रेडर्स को बाकियों की तुलना में एडवांटेज मिल जाता है. एनएसई पर हुए स्कैम में पाया गया था कि ओपीजी सिक्योरिटीज (OPG Securities) नामक ब्रोकर को गलत तरीके से एक्सेस दिया गया था.
एनएसई की फाउंडिंग मेंबर है चित्रा
चित्रा रामकृष्णा (Chitra Ramkrishna) एनएसई से शुरुआत से जुड़ी रही हैं. वह उन 5 लोगों में से एक हैं, जिन्हें एनएसई का फाउंडेशन तैयार करने के लिए चुना गया था. चित्रा अप्रैल 2013 में एनएसई की एमडी एंड सीईओ (MD & CEO) बन गईं और दिसंबर 2016 तक इस पद पर बनी रहीं. एनएसई की सबसे बड़ी अधिकारी बनने से पहले उनकी हैसियत नंबर 2 की थी. सेबी के हालिया आदेश में यह साफ कहा गया है कि एनएसई में लीडरशिप रोल में होने के बाद भी चित्रा किसी अज्ञात योगी के इशारे पर सारे फैसले ले रही थी. चूंकि जब को-लोकेशन स्कैम शुरू हुआ, चित्रा नंबर 2 की हैसियत में थीं और तत्काल बाद टॉप पर पहुंच गई, जांच एजेंसियों को शक है कि कहीं इस कांड का सूत्रधार भी अज्ञात योगी ही तो नहीं.
जांच एजेंसियों के सामने ये रोडब्लॉक
हालांकि जांच एजेंसियों के सामने कम मुश्किलें नहीं हैं. एनएसई ने चित्रा समेत अन्य टॉप अधिकारियों के लैपटॉप, कम्प्यूटर हार्डवेयर आदि को ई-वेस्ट के नाम पर काफी पहले डिस्ट्रॉय कर दिया था. इस कारण बहुत सारे ईमेल्स जांच एजेंसियों के हाथ ही नहीं लग पाए हैं. अब ऐसे डेटा को रिकवर करने का नए सिरे से प्रयास किया जा रहा है. अगर ये डेटा जांच एजेंसियों के हाथ लग गए तो कई नई जानकारियां सामने आ सकती हैं. चित्रा ने इस बारे में पूछे जाने पर सारी गलती एनएसई के माथे पर डाल दिया. चित्रा का कहना है कि एनएसई ने उसके जाने के बाद इन्हें डिस्ट्रॉय करने का फैसला किया और इसके बारे में एक्सचेंज ही बेहतर बता सकता है.