बढ़ती महंगाई और आर्थिक मंदी की आशंका के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा है. मंगलवार को आए जीडीपी के आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं. ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2022 की तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की गति स्लो हुई और ये 4.4 फीसदी की दर से बढ़ी है. पिछली तिमाही के मुकाबले इस बार जीडीपी में गिरावट आई है. सितंबर 2022 की तिमाही में जीडीपी दर 6.3 फीसदी रही थी.
पिछली तिमाही का आंकड़ा
उच्च मुद्रास्फीति और कमजोर मांग का असर जीडीपी पर नजर आ रहा है, जिसकी वजह से दिसंबर तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था में 4.4 फीसदी की वृद्धि हुई है. जून-सितंबर तिमाही में अर्थव्यवस्था 6.3 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी. अप्रैल-जून तिमाही में ये 13.5 फीसदी रही थी. 2021-22 की समान तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था 11.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी.
NSO ने 2021-22 में भारत की आर्थिक वृद्धि को संशोधित कर 8.7 प्रतिशत से 9.1 प्रतिशत कर दिया है. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट की वजह से दिसंबर की तिमाही की जीडीपी में गिरावट आई है.
RBI का अनुमान
इस महीने की शुरुआत में आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा था कि 2023-24 में जीडीपी 6.4 फीसदी रहने की उम्मीद है. पहली तिमाही के लिए विकास दर 7.8 प्रतिशत आंकी गई है, जबकि दूसरी तिमाही में ये नंबर 6.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.8 प्रतिशत रह सकता है.
आईएमएफ ने भी भारत की आर्थिक विकास दर 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जबकि एशियाई विकास बैंक ने अर्थव्यवस्था के 7 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान लगाया है.
ग्लोबल चुनौतियां
ग्लोबल इकोनॉमी इस समय कई तरह की चुनौतियों से जूझ रही है. मंदी और महंगाई की समस्या बरकरार है. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध से दुनियाभर में आर्थिक तौर पर इसका असर पड़ा है. आपूर्ति चेन यानी की सप्लाई चेन में काफी दिक्कतें आई हैं. इस बीच महंगाई पर अपने चरम पर है. जनवरी के महीने में भारत में भी खुदरा महंगाई दर बढ़ी थी और ये रिजर्व बैंक के तय लक्ष्य 6 फीसदी के पार निकल गई थी.
क्या है GDP?
किसी देश की सीमा में एक निर्धारित समय के भीतर तैयार सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक या बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहते हैं. ह किसी देश के घरेलू उत्पादन का व्यापक मापक होता है और इससे किसी देश की अर्थव्यवस्था की सेहत पता चलती है. अधिकतर देशों में इसकी गणना सालाना होती है. लेकिन भारत में इसे हर तीन महीने यानी तिमाही में आंका जाता है. कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया.