देश की GDP में गिरावट के कारण मंगलवार को रुपया 84.75 रुपये प्रति डॉलर के नए निचले स्तर पर पहुंच गया. वित्त वर्ष 2025 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर के दौरान देश की जीडपी 18 महीने के निचले स्तर 5.4 फीसदी की ग्रोथ से बढ़ी है. जबकि अनुमान 6 फीसदी से ज्यादा का था. ऐसे में डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट देखी जा रही है. सोमवार को रुपये में 21 पैसे की कमी आई थी.
मंगलवार को भारतीय रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर था. इसके पीछे बड़ा कारण अमेरिकी डॉलर में अपने प्रमुख समकक्षों के मुकाबले तेजी और एशियाई देश की धीमी विकास दर को लेकर चिंता थी. डॉलर के मुकाबले रुपया 84.7425 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, जो सोमवार को 84.7050 के अपने पिछले सर्वकालिक निचले स्तर पर था. सिर्फ भारतीय ही नहीं अन्य एशियाई देश जैसे चीनी युआन भी कमजोर रहा. यह एक साल में अपने सबसे निचले स्तर पर था. जबकि यूरो में कमजोरी के कारण डॉलर इंडेक्स 106.50 पर था.
दूसरी तिमाही में भारत की इतनी रही जीडीपी
देश का वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) जुलाई-सितंबर 2024 में सात तिमाहियों के निचले स्तर 5.4 प्रतिशत पर आ गया, जबकि अप्रैल-जून 2024 तिमाही में 6.7 प्रतिशत और जुलाई-सितंबर 2023 अवधि में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. अधिकांश विश्लेषकों ने अनुमान लगाया कि वित्त वर्ष 2025 की दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि 6.5-6.8 प्रतिशत के दायरे में रहेगी.
FII के शेयर बेचने का भी असर
वहीं पिछले दो महीने में विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भी भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली कर रहे हैं. अक्टूबर और नवंबर में इन्होंने 1.16 लाख करोड़ रुपये के स्थानीय शयेर बेच दिए हैं. FII के बाहर जाने की स्थिति में विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ जाती है, जिसस स्थानीय मुद्रा पर दबाव बढ़ता है.
ट्रंप ने दी थी चेतावनी
ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद, उन्होंने हाल ही में ब्रिक्स देशों को लेकर चेतावनी दी थी कि अगर डॉलर को रिप्लेस करने की कोशिश की गई तो वह इन देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगा देंगे. फॉरेक्स ट्रेडर्स का कहना है कि एशियाई करेंसी में आ रही गिरावट की यह भी ये वजह हो सकती है.
क्या आरबीआई करेगा ब्याज दर में कटौती?
रुपये में गिरावट की सीमा मोटे तौर पर एशियाई देशों के अनुरूप है, लेकिन बैंकरों और कॉरपोरेट्स के लिए यह आश्चर्य की बात है, क्योंकि पिछले कई महीनों से आरबीआई लगातार मुद्रा को प्रमुख स्तरों पर बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप कर रहा है. ऐसे में सभी की निगाहें RBI पर टिकी हुई हैं कि क्या केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करके स्थिति को कंट्रोल करने की कोशिश कर सकता है?