एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) और स्पेक्ट्रम के मसले पर सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला इस बार टेलीकॉम कंपनियों के लिए आर या पार की बात होगी. अभी तक तो सिर्फ वोडाफोन-आइडिया ही ज्यादा परेशान दिख रही थी, लेकिन अब जियो और एयरटेल की मुसीबत भी बढ़ने वाली है.
सोमवार को जस्टिस अरुण मिश्रा ने एजीआर मसले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. जस्टिस मिश्रा 2 सितंबर को रिटायर हो रहे हैं, उससे पहले यह फैसला आ सकता है.
जियो-एयरटेल के लिए भी बढ़ सकती है मुसीबत
अभी तक तो सिर्फ वोडाफोन-आइडिया ही ज्यादा परेशान दिख रही थी, लेकिन अब जियो और एयरटेल की मुसीबत भी बढ़ने वाली है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले का दायरा बढ़ाने का निर्णय लिया है. अब इसमें पिछले 20 साल के पूरे एजीआर बकाये की बात होगी. गौरतलब है कि प्रभावित 15 टेलीकॉम कंपनियों में से पांच ने अभी तक सिर्फ 30,254 करोड़ रुपये की राशि चुकाई है, जबकि टेलीकॉम विभाग का कुल बकाया 1.69 लाख करोड़ रुपये का है.
इसे भी पढ़ें: 7 रुपये का शेयर 2 साल में 800 रुपये का, क्या पेनी स्टॉक में लगाना चाहिए पैसा?
स्पेक्ट्रम पर अहम फैसला
दूसरा बड़ा फैसला जिस पर कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है, वह यह है कि क्या टेलीकॉम कंपनियां अपना स्पेक्ट्रम अधिकार किसी दूसरी कंपनी को ट्रांसफर कर सकती हैं और इन्सॉलवेंसी और बैंकरप्शी कोड के तहत (IBC) इसे बेच सकती हैं. यह उन कंपनियों पर लागू होता है जो बंद हो चुकी हैं जैसे-रिलायंस कम्युनिकेशंस, एयरसेल, वीडियोकॉन टेलीकॉम. सुप्रीम कोर्ट बंद हो चुकी कंपनियों के रेजोल्युशन प्लान के तहत स्पेक्ट्रम बेचने के विचार के खिलाफ है, क्योंकि इसका पूरा पैसा कर्जदाता बैंकों के पास चला जाएगा और टेलीकॉम विभाग को एजीआर का बकाया नहीं मिलेगा.
क्या है कंपनियों का तर्क
दूरसंचार विभाग ने भी इसी आधार पर एयरसेल और आरकॉम के रेजोल्युशन प्लान का विरोध किया था. जबकि टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि दूरसंचार विभाग के लाइसेंस एग्रीमेंट के तहत उन्हें स्पेक्ट्रम ट्रांसफर करने का अधिकार है और विभाग की मंजूरी के बाद वे स्पेक्ट्रम बेच सकते हैं.
कंपनियों का कहना है कि उन्होंने स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल बैंकों से लोन लेन के लिए जमानत के रूप में किया है, यह उनके बहीखाते में एक एसेट के रूप में दर्ज था, इसलिए उनके पास इसे किसी को भी ट्रांसफर करने का अधिकार है, लेकिन दूरसंचार विभाग की मंजूरी के बाद.
सुप्रीम कोर्ट के फेसले का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगा जियो और एयरटेल के लिए एजीआर की देनदारी तय करना, उस स्पेक्ट्रम के लिए जो उन्हें बंद हो चुकी टेलीकॉम कंपनियों से मिला है. जियो ने साल 2016 में आरकॉम के साथ स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग और शेयरिंग का एग्रीमेंट किया था. एयरटेल को एयरसेल और वीडियोकॉन टेलीकॉम से स्पेक्ट्रम मिले थे.
कोर्ट का अभी तक यही स्पष्ट रुख है कि स्पेक्ट्रम की बिक्री से पहले एजीआर का बकाया निपटाया जाना चाहिए था और अगर बंद हो चुकी कंपनियां इसे देने की हालत में नहीं हैं तो एयरटेल और जियो को यह बकाया चुकाना चाहिए.
कितना था बकाया
एजीआर बकाये की बात करें तो एयरसेल ग्रुप पर 12,389 करोड़ रुपये, वीडियोकॉन टेलीकॉम पर 1,376 करोड़ रुपये और आरकॉम पर 25,199.27 करोड़ रुपये का बकाया था. आरकॉम ने इसमें से सिर्फ 3.96 करोड़ रुपये दिये हैं. दूसरी कंपनियों ने तो कुछ भी नहीं दिया है.
अब एयरटेल और टेलीकॉम की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने आईबीसी के तहत स्पेक्ट्रम की बिक्री को अवैध बता दिया, या वह स्पेक्ट्रम की बिक्री को मंजूर करता है लेकिन पहले एजीआर बकाये को चुकाने को कहता है तो उनका क्या होगा. दोनों हालात में बैंकों, एयरटेल और जियो के बीच लफड़ा होना तय है.
अभी तक तो दोनों मसलों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख टेलीकॉम कंपनियों के खिलाफ ही रहा है. अब कोर्ट इन कंपनियों को कोई राहत दे दे तो यह उनके लिए चमत्कार जैसा ही होगा.
क्या होगा आप पर असर
अब इन सबमें सबसे बड़ा मसला यह है कि इसका ग्राहकों पर क्या असर होगा. निश्चित रूप से इसका बोझ ग्राहकों पर भी आएगा. अभी तक तो सिर्फ वोडाफोन-आइडिया ही ज्यादा परेशान दिख रही थी, लेकिन अब जियो और एयरटेल की मुसीबत भी बढ़ने वाली है. अगर उन्हें एजीआर के बकाये की बड़ी रकम चुकानी पड़ी तो आने वाले दिनों में निश्चित रूप से टेलीकॉम चार्जेज और बढ़ेंगे. राहत की बात तभी होगी, जब सुप्रीम कोर्ट यह बकाया चुकाने के लिए काफी मोहलत देता है और कंपनियों को किस्तों में भुगतान की छूट दी जाती है. हालांकि यह तो तय है कि कंपनियां इसका बोझ कंज्यूमर पर डालेंगी.
इसे भी पढ़ें: चीनी माल का बहिष्कार करेंगे व्यापारी, दिसंबर 2021 तक चीन को देंगे 1 लाख करोड़ का झटका
क्या होता है AGR
एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा टेलीकॉम कंपनियों से लिया जाने वाला यूजेज और लाइसेंसिग फीस है. इसके दो हिस्से होते हैं- स्पेक्ट्रम यूजेज चार्ज और लाइसेंसिंग फीस, जो क्रमश 3-5 फीसदी और 8 फीसदी होता है.
क्या था विवाद
असल में दूरसंचार विभाग कहता है कि AGR की गणना किसी टेलीकॉम कंपनी को होने वाले संपूर्ण आय या रेवेन्यू के आधार पर होनी चाहिए, जिसमें डिपॉजिट इंट्रेस्ट और एसेट बिक्री जैसे गैर टेलीकॉम स्रोत से हुई आय भी शामिल हो. दूसरी तरफ, टेलीकॉम कंपनियों का कहना था कि AGR की गणना सिर्फ टेलीकॉम सेवाओं से होने वाली आय के आधार पर होनी चाहिए. लेकिन पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों के खिलाफ आदेश दिया था.
(www.businesstoday.in/ के इनपुट पर आधारित)