रिकॉर्ड उच्च स्तर पर बनी महंगाई (Record High Inflation) को काबू करने के लिए अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) ने बुधवार को ब्याज दरें (Interest Rate Hike) 0.75 फीसदी बढ़ाने का ऐलान कर दिया. यह करीब तीन दशक में अमेरिका में ब्याज दरों में सबसे बड़ी बढ़ोतरी है. अब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़कर 1.50-1.75 फीसदी हो गई हैं. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने (US Interest Rate Hike) से भारत समेत दुनिया की लगभग सारी अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ता है.
इस कारण बढ़ रहीं ब्याज दरें
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर जानने से पहले आपको बता दें कि अमेरिका में अभी खुदरा महंगाई (US Retail Inflation) की दर 8.6 फीसदी है, जो करीब 40 साल में सबसे ज्यादा है. फेडरल रिजर्व इसे गिराकर 2 फीसदी के दायरे में लाना चाहता है. इसी कारण फेडरल रिजर्व आक्रामक तरीके से ब्याज दरों को बढ़ा रहा है, ताकि इकोनॉमी से लिक्विडिटी कम हो और डिमांड पर लगाम लगे. हालांकि इसके साथ ही ब्याज दरें तेजी से बढ़ने से इकोनॉमी के ऊपर मंदी का खतरा भी अधिक गंभीर होता जाएगा.
RBI के ऊपर आएगा प्रेशर
अमेरिका में फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें बढ़ाने के बाद रिजर्व बैंक (RBI) के ऊपर भी इसका प्रेशर बना था. रिजर्व बैंक ने अप्रैल की एमपीसी (RBI MPC) के बाद महंगाई को खास फैक्टर नहीं बताया था. उसके बाद जैसे ही फेडरल रिजर्व ने आक्रामक रुख अपनाया, रिजर्व बैंक ने मई में आनन-फानन में एमपीसी की बैठक की और ब्याज दरें (RBI Repo Rate Hike) बढ़ाने की शुरुआत कर दी. उसके बाद जून महीने की नियमित बैठक में रिजर्व बैंक ने दोबारा रेपो रेट को बढ़ाया. भारत में अभी खुदरा महंगाई की दर 7.04 फीसदी है और रिजर्व बैंक इसे 6 फीसदी से नीचे लाना चाहता है. इसके लिए दो बार में रेपो रेट को 0.90 फीसदी बढ़ाकर 4.90 फीसदी किया जा चुका है. फेडरल के ताजा हाइक के बाद रिजर्व बैंक के ऊपर भी बड़ी बढ़ोतरी का दबाव रहेगा.
बढ़ेगी FPI की बिकवाली
इसके अलावा अमेरिका में तेजी से ब्याज दर बढ़ने से भारत में इन्वेस्टमेंट पर भी असर होगा. अमेरिका जितनी तेजी से ब्याज दरें बढ़ाएगा, भारत और वहां की दरों में गैप कम होता जाएगा. ऐसा होने पर पहला असर ये होता है कि विदेशी निवेशक (FPI) उभरते बाजारों से तेजी से बाहर निकलने लगते हैं. भारतीय बाजार पहले से ही एफपीआई की भारी बिकवाली का सामना कर रहा है. पिछले कुछ महीनों की बिकवाली में एफपीआई भारतीय बाजार से 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की निकासी कर चुके हैं. आने वाले समय में इसमें और तेजी देखने को मिल सकती है.
रुपये में गिरावट का रिस्क
अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का एक और असर भारतीय करेंसी (Indian Currency) पर होगा. रुपया (INR) पहले ही काफी गिर चुका है और इतिहास में पहली बार डॉलर (USD) के मुकाबले 78 से भी नीचे आया है. जनवरी में डॉलर के मुकाबले रुपये का भाव 74.25 यूनिट था, जो बुधवार को 78.17 यूनिट तक गिर गया. एफपीआई के बिकवाल होने से डॉलर को सपोर्ट मिलता है. रेट हाइक से एफपीआई की बिकवाली बढ़ने की आशंका है, जो अंतत: डॉलर को मजबूत करेगी. इससे रुपये के ऊपर और गिरने का खतरा तेज होगा.